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कहानी : बाबूजी का अंतिम भाषण

कई बार वर्षों साथ रहकर भी किसी रिश्ते की परतें बगैर खुली ही रह जाती हैं

कहानी : बाबूजी का अंतिम भाषण
स्वयं प्रकाश
कई बार वर्षों साथ रहकर भी किसी रिश्ते की परतें बगैर खुली ही रह जाती हैं। ऐसे में जरूरत पड़ती है कुछ ऐसे शब्दों की जो उस रिश्ते की नई छवि सामने लाएं। पिता-पुत्री के मार्मिक रिश्ते को बयां करती इस कहानी में जीवन की दुश्वारियां, सामाजिक विडंबनाओं के साथ ही प्यार का मीठा अहसास भी है।
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मुझे अब तक याद है वह नीला कोट, जो मैं फर्स्ट ईयर में पहना करता था और जिसे देखकर मेरे क्लास की एक सुंदर सी लड़की और उसकी सहेलियां हमेशा हंसा करती थीं। वह पुराना कोट मेरे पिताजी रेलवे के एक टीटी से मांग लाए थे और मोहल्ले के एक दर्जी ने दस रुपए में उसे काट-छांटकर मेरे पहनने लायक बना दिया था। वे हमारी गुरबत के दिन थे। गरीबी में कई ऊल-जलूल चीजें होती हैं, जिन पर साधन-संपन्न लोग हंस सकते हैं।
लड़की के हंसने पर मुझे गुस्सा नहीं आता था, कौतुक होता था क्योंकि उससे और उम्मीद भी क्या की जा सकती थी? लेकिन फिर भी लड़की में कुछ ऐसा था, जो इस हृदयहीन व्यवहार के बावजूद मुझे सलोना लगता था। वह शायद उसकी आत्मा का भोलापन होगा।
मैंने उसे बार-बार ध्यान से देखा था और बार-बार सोचा था कि एक न एक दिन मैं उसे प्रभावित कर लूंगा और तब मुमकिन है, वह मेरे जैसे किसी भी लड़के की किसी भी बात का मजाक न उड़ाए।लड़की और उसकी मंडली मुझे दिखा-दिखाकर लॉलीपॉप खाया करती थी और पास से गुजरते हुए मुझे ‘बाबूजी’ कहकर चिढ़ाया करती थी। ईमानदारी की बात बताऊं, मैं भी मुस्करा पड़ता था। तब यह भी कम सुखद नहीं था कि उस जैसी सुंदर और संपन्न लड़की मेरी उपेक्षा नहीं कर पा रही है। क्यों था ऐसा? मुझमें क्या कशिश थी जो लड़की मुझे अपने हाल पर नहीं छोड़ पाती थी?
धीरे-धीरे लड़की ने मुझे सारे कॉलेज की सारी लड़कियों के लिए ही नहीं, सारे लड़कों के लिए भी उपहास का सुलब पात्र बना दिया था। लड़के मुझे बाबूजी कहने लगे थे और अपरिचित लड़कियां तक आ-आकर मेरा कोट छू-छूकर देखती थीं, ‘बाबूजी, इत्ता अच्छा कोट कहां से लाए?’ कोट मैं इसलिए भी पहने रहता था कि उसमें मेरी गली-फटी और चिथड़ी कमीजें छिप जाएं। फिर भी उस एक दिन जब मैं सिर्फ झेंप के कारण कोट पहनकर कॉलेज नहीं आया, जबकि सर्दी बहुत थी, तो मेरा कोट नहीं पहनकर आना भी कॉलेज में चर्चा का विषय बन गया था। ‘बाबूजी, आज कोट कहां छोड़ आए?’
नीचे कक्षाओं में खिलखिलाहटें मची थीं और कॉलेज की छत पर मैं बगल में हाथ घुसेड़े धूप में खड़ा था और... रो रहा था। घर पर कुछ नहीं कह सकता था। किसी और से भी नहीं। पता नहीं कितनी देर चुप हो-होकर फिर रोता रहा। कक्षाएं छूटने से पहले नीचे जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। मैं अपने दु:ख में निपट अकेला था। फिर सब चले गए। कोई मुझे ढूंढ़ने या सांत्वना देने नहीं आया। मैं रेल की पटरियों के बारे में सोचता रहा। तभी एक रूसी उपन्यास की एक पंक्ति मेरे दिमाग में कौंधी, ‘मास्को डज नॉट बिलीव इन टीयर्स!’ ...और इस स्मरण स्फुल्लिंग ने मेरा सब कुछ बदल दिया।
मैंने दो ट्यूशनें शुरू कर दीं और सुबह अखबार बांटना। ट्यूशनों से चालीस रुपए महीने मिलेंगे और अखबार से बीस रुपए महीना। तीन महीनों में एक सौ अस्सी रुपए हो जाएंगे और मैं नया कोट बनवा लूंगा। नहीं तो कमीज तो जरूर ही। लेकिन ट्यूशन के एक सौ बीस रुपए कभी नहीं मिले थे। लड़कियों की हंसी बदस्तूर जारी थी। गरीब आदमी का मेहनताना बगैर किसी दिक्कत खाया जा सकता है।
तब तक लड़की यह भी नहीं जानती थी कि मैं फुटबॉल भी खेलता हूं। उन्हीं सर्दियों की बात है, हमारे कॉलेज की टीम का एक तगड़ी टीम के साथ फुटबॉल मैच हुआ था। हाफ टाइम तक हमारी टीम दो गोल खा चुकी थी। अंत तक आते-आते एक गोल उतर गया था पर हमारी हार निश्चित थी। मैं एक एवजी खिलाड़ी के रूप में बाहर बैठा बार-बार प्रार्थना कर रहा था कि एक बार बस पांच मिनट के लिए मुझे उतरने दें। आखिर हताशा के आलम में मुझे सिर्फ पांच मिनट पहले उतारा गया था। उन पांच मिनटों में मैंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था और खेल के आखिरी लम्हों में दनादन दो गोल ठोंककर न सिर्फ मैंने अपनी टीम को जितवा दिया था बल्कि एक तरह से कॉलेज का हीरो ही बन गया था। भले ही एक दिन के लिए।

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लड़कों ने मुझे कंधों पर उठा लिया था और ‘बाबूजी जिंदाबाद’ के नारे लगाने लगे थे। जो शब्द उपहास के लिए गढ़ा गया था, सम्मान और प्यार का प्रतीक बन गया था। उन अद्भुत, दुर्लभ और रोमांचक क्षणों में मेरी निगाहें सिर्फ लड़की को ढूंढ़ रही थीं।
लड़की भी उत्साह से उछल रही थी लेकिन मुझसे निगाहें मिलते ही खामोश हो गई थी और उसने निगाहें झुका ली थीं, मानो अब तक के तमाम दुर्व्यवहार के लिए क्षमा मांग रही हो। मैं तभी कहना चाहता था कोई बात नहीं... लेकिन कैसे कहता?
मुझे भी तब कहां मालूम था कि अभी मेरी फिटमारी जिंदगी में ऐसे और भी अनेक दुर्लभ और रोमांचक क्षण आएंगे, जब लड़की एकांत में मुझे मुबारकबाद देगी...या जब वह मुझे अपने डैडी से मिलवाने घर ले जाएगी, जहां मैं अपने सामान्य कपड़ों और किरमिच के जूतों की शर्म में उलझा सिर्फ हकलाता रह जाऊंगा...या जहां मैं बार-बार बुलाया अथवा साथ ले जाया जाऊंगा, जहां मुझे तरह-तरह की चीजें खिलाई-पिलाई जाएंगी और जहां एक दिन चांदनी में छत पर टहलते हुए मुझसे भोर की एक गजल स्वर सुनने के तुरंत बाद लड़की मेरा चेहरा पकड़कर मुझे चूम लेगी और आंखों में सारे हयात की रोशनी समेटकर फुसफुसाएगी ‘आई लव यू बाबूजी।’
उस साल गर्मियों में एक बड़ा अजीब सा हादसा हुआ था। कॉलेज बंद हो गए थे और छुट्टियों में ही लड़की के डैडी का तबादला हो गया था। लड़की दो दिन तक उस शहर में मेरे घर का पता लगाने की कोशिश करती रही थी और अंत में अपनी एक सहेली को मेरे नाम एक छोटी सी चिट्ठी देकर चली गई। दो महीने बाद कॉलेज खुलने पर ही वह चिट्ठी मुझे मिल सकी थी।
तब मैंने लड़की को एक पत्र लिखा था। लिखा था कि मैं परिस्थितिवश कॉलेज की पढ़ाई जारी नहीं रख पा रहा हूं और एक प्राइवेट कंपनी में डिस्पैचर की नौकरी शुरू कर रहा हूं।
पढ़ाई स्वयंपाठी छात्र के रूप में जारी रखने की कोशिश करूंगा। इस पत्र का कोई उत्तर नहीं आया था। बाद में भी जो दो-चार लिखे, उनका भी नहीं, और मैंने सोचा वह मुझे क्यों लिखेगी? मैं उसके लायक हूं ही कहां?फिर कोई सात साल बाद दिल्ली में अचानक एक शादी में हमारी मुलाकात हो गई। इस बीच काफी कुछ घटित हो चुका था। मेरी कंपनी जिस कंपनी के लिए छोटी-मोटी चीजें बनाती थी, जापान की एक प्रसिद्ध फर्म ने उसका अधिग्रहण कर लिया। मेरे पास बड़ी-बड़ी डिग्रियां नहीं थीं। पर उन्हें डिग्रियों की जरूरत भी नहीं थी। उन्हें चाहिए थे मेहनती, वफादार और कम पैसे तथा सुविधाओं में टिककर काम करने वाले आदमी।
ये और बात है कि उनका कम पैसा हमारी सरकारी नौकरियों के ज्यादा पैसे से भी ज्यादा होता था। मैं छोटा-मोटा अफसर बन गया, फटाफट तरक्कियां मिलती गर्इं और कुछ ही सालों में मेरी खासी अच्छी हैसियत बन गई। उधर लड़की के डैडी सेवानिवृत्त हो गए। हालांकि वह एक ऊंचे पद से सेवानिवृत्त हुए थे, पर सेवानिवृत्ति के बाद वह एक मामूली आदमी ही बचे थे। सरकारी नौकरी में तो तभी तक कद्र होती है, जब तक आदमी ओहदे पर होता है। खैर...तो मैंने लड़की से पूछा कि उसने मेरी चिट्ठियों का जवाब क्यों नहीं
दिया। तब मुझे पता चला कि उसे मेरी एक भी चिट्ठी नहीं मिली थी, क्योंकि दो महीनों में दूसरी बार उसके डैडी का तबादला हो गया था।अगले महीने इस बात को पच्चीस साल हो जाएंगे। इन पच्चीस सालों में फिर न मैंने लड़की को कोई चिट्ठी लिखी, न लड़की ने मुझे। दौरे पर गया तो फोन कर लिया और वह मायके गई तो मैं दूसरे ही दिन उसे लिवाने पहुंच गया।
हां बेटी! यह मेरी और तुम्हारी मम्मी की जिंदगी की ही सच्ची कहानी है।आज तुम्हें अपने हाथ से यह चिट्ठी मैं सिर्फ इसलिए नहीं लिख रहा
कि यहां जापान में बैठे-बैठे मुझे तुम्हारी बहुत याद आ रही है, बल्कि इसलिए कि मैं तुम्हें समझाना चाहता हूं कि जिस तरह बीसवीं शताब्दी में उपनिवेशवाद खत्म हो गया, इक्कीसवीं शताब्दी में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विश्वव्यापी साम्राज्य भी खत्म हो सकता है। ऐसा हुआ तो देखते-देखते मेरी कंपनी जैसी विशाल और विराट कंपनियां ताश के मकान की तरह भरभराकर गिर जाएंगी और नष्ट हो जाएंगी। आने वाली शताब्दी एशिया और अफ्रीका के नौजवानों की होगी। तुम लोगों की इंतिहा उपभोग और बेकाबू प्रदूषण से स•यता ऊब चुकी है। आने वाली शताब्दी सूचना और संचार की नहीं, सच की, सादगी की, सरलता की और साहस की शताब्दी होगी। वैसे ये चारों एक ही चीज के अलग-अलग नाम हैं।
ढीला-ढाला सा लाल कोट पहनकर तुम्हारा जो दाढ़ी वाला क्लास फेलो शायद मुकुल नाम है उसका, हां मुकुल घर आता है और मुझे क्रांति की अवश्यकता के बारे में कन्विंस करने की कोशिश करता रहता है, सच पूछो तो मुझे अच्छा लगता है। तुम तो हम लोगों के सामने बेचारे का मजाक ही उड़ाती रहती हो। जानती हो तुम ऐसा क्यों करती हो? क्योंकि तुम्हारी मम्मी मुकुल को उसी तरह संदेह भरी आंखों से घूरती हैं, जैसे कभी उनकी मम्मी मुझे घूरा करती थीं, जबकि शायद मन से तुम उसे बहुत चाहती हो।
सुख-सुविधा और समृद्धि की अंधी दौड़ में बहुत सी कोमल और नाजुक चीजें दुनिया से छूट गई हैं।
दुनिया ने शायद अपनी लापरवाही में उन्हें छूट जाने दिया है। किसी का मजाक उड़ाना कितना अमानवीय है, मैं जानता हूं। तुम्हारी मम्मी तुम्हारी बहुत चिंता करती हैं, वरना भूली तो वह भी नहीं होंगी कि उन्होंने कभी एक ऐसे आदमी को चुना था और मन से प्यार किया था, जिसका कोट उतरन का था और जिसे सारा कॉलेज बाबूजी कहकर पुकारता था।कल तुम्हारी सालगिरह है। मेरी तरफ से खूब प्यार और शुभकामनाएं। तुमने अपने पापा का भाषण कभी नहीं सुना होगा। तुम चाहो तो इस पत्र को ‘बाबूजी का अंतिम भाषण’ भी कह सकती हो। तो चलो, इस जन्मदिन पर पापा की तरफ से यही उपहार सही।
डू यू लाइक इट...?
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