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चुनावी स्वाइन फ्लू, पढ़ें मजेदार व्यंग्य

अशोक गौतम | UPDATED Feb 5 2019 1:36PM IST
चुनावी स्वाइन फ्लू, पढ़ें मजेदार व्यंग्य

बुरे दिनों के लिए जिस तरह मेरे जैसा महास्वार्थी दोस्तों में कुछ कम स्वार्थी दोस्तों को चुनता है, चुनाव के वक्त वोट डालते हुए मेरे जैसा विवेकहीन मतदाता तक भ्रष्ट समाज सेवकों में से कुछ कम भ्रष्ट समाज सेवक को चुनता है, वैसे ही सड़े टमाटरों की सजी टोकरी में से कुछ कम सड़े टमाटर छांट-छांटकर सब्जी वाले की टोकरी में डाल अपने को गौरवान्िवत महसूस रहा था कि एकाएक पीछे से किसी ने ज्यों मेरे कंधे पर बसंती सी थाप सी दी तो मैंने वैसे ही सड़े टमाटरों में से कुछ सड़े टमाटर छांटने जारी रखते कि इससे पहले दूसरा ग्राहक मेरे द्वारा छांटे जाने वाले टमाटरों पर हाथ साफ न कर दे, और झुके झुके पूछ लिया, कैसे हो।

वह मेरे सामने आता दोनों हाथ जोड़े ससादर बोला, भाई साहब! मान गए आपकी शिष्टाचारी को! आपमें और कुछ बचा हो या न पर साली ये शिष्टाचारी अभी भी कूट-कूटकर ही नहीं, ठूंस-ठूंसकर बची है। कहां से सप्लाई करवाते हो ये शिष्टाचारी। अब तक मेरे हिसाब से जितने मैंने कुछ सड़े टमाटर लेने थे उतने टोकरी में से मैं छांट चुका था सो अपनी पीठ सीधी करते सीधा खड़े होने की कोशिश की तो देखा सामने एक अपरिचित साहब, वाह! चेहरे पर क्या तेज! बंदा बसंत से पहले ही चमचमाया हुआ। हो सकता है अबके बजट का असर हो।

्आप कौन साहब। मैं उससे भी बात करता रहा और टेढ़ी नजर सब्जी वाले की तराजू पर भी नजर गड़ाए रहा। क्या है न कि इनदिनों जितना भी एहतियात बरतो, बोलने वाले और तोलने वाले अपनी सी कर ही जाते हैं। आप सबको रोक सकते हैं पर मर्जी का बोलने वालों और मर्जी का तोलने वालों को बिल्कुल नहीं। इन दिनों जो मन में आया बोलना, जो मन में आया तोलना रिवाज सा हो गया हो। आपने मुझे भाई साहब कहा और वह भी झुके हुए भी नमस्कार करके। उस भद्र में अभद्र से लगने वाले ने अजीब सी हंसी हंसते मुझसे पूछा। असल में जिनको हंसने की आदत नहीं होती या जिनको हंसना नहीं आता, वे हसंते हुए भी अजीब से लगते हैं। 

 पर मैं स्वाइनफ्लू हूं। आपके शहर में अभी उतरा ही हूं, उसने अपना संक्षिप्त पर सारगर्भित परिचय दिया। कोई बात नहीं! हमारे शहर में तो हर रोज कोई न कोई उतरता चढ़ता ही रहता है। यहां का आकर्षण है ही ऐसा। वेलकम टु सिटी स्वाइनफलू! पर तुम इस वक्त। देखो बंधु, हमारे यहां हर आने वाले का एक नियत मौसम होता है, फिर सोचा टूरिस्ट हो घूमने आया है तो कुछ देकर ही जाएगा। मतलब, वह मेरा मुंह ताकने लगा।

 जैसे दीपावली को राम आते हैं, मार्च अप्रैल में होली आती है। जनवरी फरवरी में बजट आता है। मई जून में सूखा आता है। बरसात के दिनों में बाढ़ आती है, आदि-आदि। मतलब, उसने फिर चिंतक होते पूछा तो मैंने कहा, यहां हर ऋतु इसीलिए है कि हर बीमारी ऋतु के हिसाब से आए तो अच्छा तो नहीं, पर कुछ अच्छा सा लगता है। अब तुम ही कहो कि जो जुकाम सर्दियों की जगह गर्मियों में आने लगे तो भली चंगी नाकों तक को कैसा फील होगा। अगर मई जून में बर्फ आने लग जाए तो रजाइयां, कंबल बुरे नहीं लगेंगे क्या, मैंने उससे पूछा तो वह चुप रहा। बस, उदास हताश सा मेरा हसंता हुआ चेहरा देखता रहा तो मैंने कहा, बंधु!

लाचारी में तो हम बारहों महीने रहते ही हैं पर जो बीमारी मौसम के हिसाब से आए तो उसको झेलने, हाथों हाथ लेने को मन करता है। पर जो तुम बारहों महीने ही हमारे बीच हमारे होकर रहने लग जाओगे तो तुम्हारी कद्र कम नहीं होगी तो क्या होगा। अब वे दिन गए जब अतिथि बिन बताए आता सुहाता था। अब तो वह बीसियों अपने आने के व्हाट्सएप करने के बाद भी आता अच्छा नहीं लगता, मैंने कहा तो उसने मेरे पावं छुए और तुरंत वहां से ऑटो में बैठ कहीं को हो लिया। पता नहीं, कहां गया होगा। अपने देश में बीमारियों को जगह की कमी थोड़े ही है, भाई साहब! और कहीं नहीं तो कम से कम अस्पताल में तो मजे से रह ही सकती हैं बिना किसी इलाज परहेज के।


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