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सर्जिकल स्ट्राइक: सैन्य कार्रवाई पर ओछी राजनीति क्यों

रक्षा से जुड़े बहुत से मामले सार्वजनिक रूप से खोले नहीं जा सकते।

सर्जिकल स्ट्राइक: सैन्य कार्रवाई पर ओछी राजनीति क्यों
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नई दिल्ली. सर्जिकल स्ट्राइक का फैसला राजनीतिक है और बीजेपी उसका लाभ लेगी। जनता जानती है कि किसे र्शेय देना चाहिए। जब हमले होते हैं तो सरकार को आलोचना सुनती पड़ती है। जब पलटवार होगा तो वह उसका लाभ भी सरकार ही लेगी। सेना ने जब सर्जिकल स्ट्राइक की घोषणा की तो एकबारगी देश के सभी राजनीतिक दलों ने उसका स्वागत किया था। इस स्वागत के पीछे मजबूरी और अनिच्छा नजर आ रही थी। यह बात अगले दो-तीन दिन में जाहिर हो गई। पहले अरविंद केजरीवाल ने लपेटकर सवाल फेंका फिर कांग्रेस के संजय निरुपम ने सीधे-सीधे कहा कि सब फर्जी है। असली है तो प्रमाण दो। पी. चिदंबरम, मनीष तिवारी और रणदीप सुरजेवाला बोले कि स्ट्राइक तो कांग्रेस शासन में हुई थीं। हमने कभी र्शेय नहीं लिया। कांग्रेस सरकार ने कभी हल्ला नहीं मचाया पर धमाका राहुल गांधी ने किया। उन्होंने नरेंद्र मोदी पर '˜खून की दलाली' का आरोप जड़ दिया।
सर्जिकल स्ट्राइक की घोषणा होते ही उत्तर प्रदेश के कुछ शहरों में पोस्टर लगे। भाजपा का कहना है कि यह सेना को दिया गया सर्मथन था, जो देश के किसी भी नागरिक का हक है पर सच यह है कि पार्टी विधानसभा चुनाव में इसका लाभ उठाना चाहेगी। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों के लिए यह स्थिति असहनीय है। वे बीजेपी के लिए स्पेस नहीं छोड़ना चाहते। बीजेपी के दावों में छिद्र खोजना विपक्ष की जिम्मेदारी भी है पर ऐसा करते वक्त उन्हें ध्यान देना होगा कि सीधे सेना की आलोचना न करें। करें भी तो उसका तार्किक आधार हो। क्या वे कहना चाहते हैं कि सर्जिकल स्ट्राइक हुई ही नहीं? क्या सेना का डीजीएमओ सरकार के दबाव में गलत बयान दे रहा है? जाने-अनजाने राजनीतिक दल पाकिस्तानी पाले में जाकर खड़े हो गए। अब वे सफाई दे रहे हैं कि हम सेना की आलोचना नहीं कर रहे हैं। बीजेपी जो फायदा उठाने की कोशिश कर रही है, उसका विरोध कर रहे हैं। भारतीय राजनीति में युद्ध की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 1962 की लड़ाई से नेहरू की लोकप्रियता में कमी आई थी, जबकि 1965 और 1971 की लड़ाइयों ने लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी का नाम ऊंचा किया था पर क्या कांग्रेस ने इन दोनों लड़ाइयों का राजनीतिक दोहन नहीं किया? और क्या करगिल युद्ध के दौरान भी अटल सरकार के खिलाफ ऐसा ही रवैया नहीं अपनाया जैसा आज है? इस बार सेना की कार्रवाई के बाद 29 सितंबर को हुई सर्वदलीय बैठक में विपक्षी दलों ने एक स्वर से इस ऑपरेशन का सर्मथन किया था। सोनिया गांधी ने न केवल सेना को बधाई दी, बल्कि यह भी कहा कि इस मामले में हम सरकार के साथ खड़े हैं।
इन बातों से सरकार का रंग चोखा साबित होता जा रहा था। अब राहुल गांधी ने स्टैंड लिया है, इसलिए उम्मीद नहीं कि वे पीछे हटेंगे। पर इतना स्पष्ट है कि भारतीय मुहावरों का इस्तेमाल करने के मामले में वे कच्चे हैं। यह दोष राहुल का ही नहीं कांग्रेस के नई पीढ़ी के ज्यादातर नेताओं का है। हाल में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने संसद के अपने भाषण में कश्मीर में 'रायशुमारी' का सर्मथन किया। उनका यह आशय नहीं था, पर जाहिर था कि वे देशी मुहावरों से अपरिचित हैं। सर्जिकल स्ट्राइक का फैसला राजनीतिक है और भाजपा उसका लाभ लेगी पर उसका तरीका सही होना चाहिए। जनता जानती है कि किसे र्शेय देना चाहिए और किसे नहीं। पठानकोट और उरी पर हमले होते हैं, तो सरकार को आलोचना सुननी पड़ती है। हमला भी होगा तो उसकी आलोचना होगी, तो जब पलटवार होगा तो वह उसका लाभ भी लेगी। लोगों को यह भी समझना चाहिए कि रक्षा से जुड़े बहुत से मामले सार्वजनिक रूप से खोले नहीं जा सकते। उसे देशहित में गुप्त रखना जरूरी होता है।
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