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डॉलर की मजबूती के आगे रुपया लुढ़का, जानिए पूरा गणित

रुपये की कीमत घटने के कुछ कारण स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। अमेरिका व चीन के बीच चल रहे व्यापार युद्ध के कारण रुपये की कीमत लगातार घटती जा रही है।

डॉलर की मजबूती के आगे रुपया लुढ़का, जानिए पूरा गणित

16 अगस्त को डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत अब तक के सबसे निम्न स्तर पर पहुंचने से एक डॉलर 70.40 रुपये का हो गया है। 17 अगस्त को भी डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत 70 के ऊपर ही रही। रुपये की कीमत में यह तेज गिरावट आम आदमी से लेकर अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का कारण बनती दिखाई दे सकती है, लेकिन नीति आयोग का कहना है कि रुपये के मूल्य में गिरावट के लिए वैश्विक आर्थिक घटक जिम्मेदार हैं और रुपया जल्द ही अपने सामान्य स्तर पर लौट आएगा।

इससे देश में महंगाई बढ़ने और विकास दर घटने की आशंका बढ़ गई है। रुपये में लगातार गिरावट से 2018.19 में देश का कच्चे तेल का आयात बिल 26 अरब डॉलर बढ़कर 114 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। रुपये की कीमत घटने के कुछ कारण स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। अमेरिका व चीन के बीच चल रहे व्यापार युद्ध के कारण रुपये की कीमत लगातार घटती जा रही है।

अब 13 अगस्त को तुर्की के स्टील के खिलाफ अमेरिका के द्वारा शुल्क बढ़ाए जाने से तुर्की मुद्रा लीरा सहित दुनिया के उभरते हुए देशों की मुद्राओं की कीमत भी तेजी से घट गई है। कच्चे तेल के तेजी से बढ़ते हुए आयात बिल और विभिन्न वस्तुओं के तेजी से बढ़ते हुए आयात के कारण देश में डॉलर की मांग बढ़ गई है। निर्यात के धीमी गति से बढ़ने और नए निवेश की कमी के कारण भी देश में डॉलर की आवक कम हो गई है।

इन सभी कारणों से डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत तेजी से गिरी है। चूंकि डॉलर में निवेश दुनिया में सबसे सुरक्षित निवेश माना जा रहा है। अत: दुनिया के निवेशक बड़े पैमाने पर डॉलर की खरीदी कर रहे हैं। डॉलर की मजबूती के कारण देश का सर्राफा बाजार भी मंदी की गिरफ्त में है। देश के विदेशी मुद्रा कोष का स्तर भी घटकर करीब 400 अरब डॉलर का रह गया है।

विदेशी मुद्रा कोष में कुछ कमी और रुपये की कीमत में गिरावट के बाद भी भारतीय अर्थव्यवस्था कम जोखिम वाली अर्थव्यवस्था बनी हुई है। भारत के लिए अच्छा आधार यह है कि भारत की डॉलर पर ऋण निर्भरता कम है। साथ ही आर्थिक मामलों में भारत की जो रेटिंग सुधरी हुई है उससे भी अर्थव्यवस्था की मुश्किलें कम हैं।

इन दिनों डॉलर की मजबूती और वैश्विक व्यापार युद्ध संबंधी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिदिन पैदा हो रही आर्थिक चिंताओं से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार में जोखिम लेने से परहेज कर रहे हैं। अमेरिकी डॉलर में लगातार आ रही मजबूती और अमेरिका में 10 साल के सरकारी बांड पर प्राप्ति 3 प्रतिशत की ऊंचाई पर पहुंच गई है।

ऐसे में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारत सहित तेजी से उभरते बाजारों में निवेश नहीं लगा रहे हैं तथा वर्तमान निवेश को तेजी से निकालते हुए दिखाई दे रहे हैं। परिणास्वरूप विदेशी मुद्रा भंडार घटने की प्रवृत्ति दिखा रहा है। जहां देश में विदेशी निवेश घटा है, वहीं देश का निर्यात अपेक्षित गति से नहीं बढ़ने के कारण विदेशी मुद्रा की आमदनी कम हुई है।

देश में तेजी से बढ़ते हुए विदेश व्यापार घाटे के कारण भी डॉलर की जरूरत बढ़ी है। निसंदेह डॉलर मजबूत होने से कच्चे तेल का आयात बिल बढ़ता जा रहा है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भी रुपये के मूल्य में गिरावट का प्रमुख कारण है। चूंकि अमेरिका ने भारत, चीन सहित सभी देशों को ईरान से कच्चे तेल का आयात 4 नवंबर तक बंद करने के लिए कहा है।

ऐसे में अभी से ईरान से भारत आने वाले कच्चे तेल की मात्रा में कमी आ गई है। ईरान यूरोपीय बैंकों के माध्यम से यूरोपीय देशों की मुद्रा यूरो में भुगतान स्वीकार करता है। डॉलर की तुलना में यूरो में भुगतान भारत के लिए लाभप्रद है। ईरान से किया जाने वाला कच्चे तेल का आयात सस्ते परिवहन के कारण भारत के लिए फायदेमंद है। ईरान से कच्चे तेल का आयात बंद किए जाने से कच्चे तेल की खरीदी से संबंधित नई चिंताएं सामने होंगी।

निसंदेह भारत के सामने कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमत संबंधी चिंता बनी हुई है। ऐसे में डॉलर के मूल्य में बेतहाशा मजबूती के बीच रुपये की कीमत में गिरावट को रोकने और विदेशी मुद्रा कोष का स्तर बनाए रखने के लिए कई कदम जरूरी हैं। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को भारत की ओर लुभाने तथा डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत संभालने के लिए जरूरी है कि सरकार आयात नियंत्रित करने और निर्यात बढ़ाने के लिए रणनीतिक रूप से आगे बढ़े।

वैश्विक संरक्षणवाद की नई चुनौतियों के बीच सरकार को निर्यात प्रोत्साहन के लिए कारगर कदम उठाने होंगे। देश से निर्यात बढ़ाने के लिए कम से कम कुछ ऐसे देशों के बाजार भी जोड़े जाने होंगे, जहां गिरावट अधिक नहीं है। निश्चित रूप से डॉलर की मजबूती के बीच निर्यात बढ़ने की संभावनाओं को साकार किए जाने की रणनीति बनाई जानी होगी।

यद्यपि इस समय प्रति डॉलर की कीमत 70 रुपये के ऊपर है और उभरते बाजारों की अन्य मुद्राओं के साथ रुपया भी बीते कुछ दिनों में उथलपुथल का शिकार हुआ है। ऐसे में अर्थ विशेषज्ञों का यह कहना है कि जब तक विदेशी मुद्रा बाजार में कोई विशेष परिवर्तन नहीं होता है तब तक रुपये में एक खास हद तक कमजोरी भारत के लिए निर्यात के दृष्टिकोण से एक अवसर बन सकता है।

रुपया अन्य समकक्ष राष्ट्रों की तुलना में अधिक कमजोर नहीं हुआ है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा दर्ज 36 कारोबारी साझेदार देशों का सूचकांक भी उन देशों की मुद्रा की कीमत घटने का स्पष्ट संकेत दे रहा है। ऐसे में सरकार के द्वारा एक समग्र प्रयास किया जाना चाहिए ताकि भारत का निर्यात अधिक प्रतिस्पर्धी हो सके।

जरूरी है कि निर्यातकों को आसानी से कर रिफंड मिल सके तथा निर्यात कारोबार संबंधी लालफीताशाही समाप्त की जा सके। साथ ही नए निर्यात संबंधी समर्थक कारोबारी सौदों के प्रति स्पष्ट प्रतिबद्घता जताई जानी चाहिए। अर्थविशेषज्ञों का मत है कि निकट भविष्य में डॉलर की तुलना में रुपया 72 के स्तर को पार कर सकता है।

रुपए की कीमत में और किसी बड़ी गिरावट के बचने के लिए हाल ही में प्रकाशित बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच की रिपोर्ट पर ध्यान दिया जाना होगा।

इसमें कहा गया है कि भारत में तेजी से बढ़ रही विकास दर के साथ-साथ अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए और रुपये की कीमत एवं विदेशी मुद्रा कोष का उपयुक्त स्तर बनाए रखने हेतु रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा प्रवासी भारतीय बांड जारी करने की रणनीति बनाई जानी चाहिए।

निश्चित रूप से ऐसे प्रभावी कदमों से रुपये की घटती हुई कीमत पर रोक लगाई जा सकेगी। साथ ही अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाए रखा जा सकेगा।

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