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अमेठी से राहुल के लिए कड़ा संदेश, गुजरात में कांग्रेस की साख दांव पर

उत्तर प्रदेश के नगर निकाय चुनावों के नतीजे भाजपा और कांग्रेस के लिए एक साथ कई संदेश लेकर आए हैं।

अमेठी से राहुल के लिए कड़ा संदेश, गुजरात में कांग्रेस की साख दांव पर

उत्तर प्रदेश के नगर निकाय चुनावों के नतीजे एक साथ कई संदेश लेकर आए हैं। इसमें जहां भाजपा को शानदार सफलता मिली है, वहीं बसपा की वापसी हुई है। कांग्रेस और सपा की भारी पराजय हुई है। इस नतीजे का गुजरात चुनाव पर भी असर पड़ तय है। उत्तर प्रदेश के 16 नगर निगमों में से 14 पर भाजपा की जीत दिखाती है कि मतदाताओं में पार्टी का जादू बरकरार है।

जीएसटी को लेकर मोदी सरकार की विपक्ष द्वारा आलोचना के बावजूद शहरी क्षेत्रों में भाजपा की पकड़ मजबूत बनी हुई है। जीएसटी के बाद माना जा रहा था कि व्यापारी समुदाय भाजपा से नाराज है, लेकिन नगर निकाय चुनाव में यह अंदेशा निर्मूल ही साबित हुई। गोरखपुर अस्पताल में बच्चे की मौत कांड के चलते भी उम्मीद की जा रही थी कि चुनाव में भाजपा को खामियाजा भुगतना पड़ सकता है, लेकिन यहां भी आशंका निर्मूल ही साबित हुई।

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उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने 198 नगर पालिका, 438 नगर पंचायत, 652 निकाय और 11995 वार्डों पर चुनाव करवाए थे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने आठ महीने के कार्यकाल में ही अपनी पार्टी भाजपा के सिंबल पर निकाय चुनाव कराने का साहसिक फैसला किया। अब संतोषजनक परिणाम के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश के हित में कठोर फैसले करने का संबल मिलेगा।

इस चुनाव को यूपी में 2019 से पहले मिनी जनादेश के तौर पर देखा जा रहा था। इसमें निश्चित ही भाजपा के लिए सुकून देने वाली बात है। यहां भाजपा अपने सभी गढ़-लखनऊ, बनारस, गोरखपुर, अयोध्या, मथुरा पर कब्जा करने में कामयाब रही। 2012 में हुए पिछले नगर निकाय चुनाव में भी 12 में से 10 नगर निगमों पर भाजपा को ही सफलता मिली थी। तब यूपी में 12 नगर निगम ही थे। अब चार और बढ़ गए हैं।

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कुल 16 हो गए हैं। पहली बार नगर निगम बने अयोध्या में भाजपा ने ही खाता खोला है। इस चुनाव में सबसे अधिक धक्का कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी काे लगा है। वे अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी को भी नहीं बचा पाए हैं। यह उनके लिए कड़ा संकेत है। कांग्रेस के पास बहाना है कि वह पार्टी सिंबल पर चुनाव नहीं लड़ी, लेकिन सच्चाई यही है कि राहुल के खाते में एक और चुनावी विफलता जुड़ गई है।

गुजरात में जिस जोश-खरोश के साथ राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस चुनाव लड़ रही है और वहां सत्ता की उम्मीद पाली हुई है, उत्तर प्रदेश के नतीजे कांग्रेस व राहुल की उम्मीद पर पानी फेर सकते हैं। उत्तर प्रदेश के परिणाम का असर गुजरात विधानसभा चुनावों में भाजपा लहर के रूप में देखा जा सकता है, वहां मतदाता कांग्रेस को खारिज कर सकते हैं। खास बात है कि राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बनने जा रहे हैं।

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ऐसे में एक और चुनावी विफलता राहुल और कांग्रेस दोनों को परेशान कर सकती है। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने राहुल पर करारा तंज कसा है कि जो वार्ड के चुनाव नहीं जीत सकते हैं, वो गुजरात में क्या जीतेंगे? उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ ने भी राहुल पर तंज कसा कि जो लोग इसे गुजरात से जोड़कर देखते थे, उनकी आंखें खोलने वाला रहा।

गुजरात के बारे में बड़ी-बड़ी बातें करने वालों का खाता नहीं खुला। फिलहाल कांग्रेस बैकफुट पर दिखाई दे रही है। अब जबकि जल्द ही राहुल कांग्रेस की कमान संभालेंगे, तो उन्हें देखना होगा कि केवल मोदी सरकार पर आरोप लगाने भर से कांग्रेस को चुनावी सफलता नहीं मिलेगी। लाखों करोड़ के घोटालों व कुशासन का दाग झेल रही कांग्रेस को मतदाताओं का विश्वास हासिल करने के लिए जमीनी स्तर पर अभी बहुत कुछ करना होगा।

केवल नारों से बात नहीं बनेगी। उत्तर प्रदेश को देखकर तो यही लग रहा है कि राहुल गांधी कितने भी हाथ-पैर मार लें, चुनावों में सफलता अभी कांग्रेस के लिए बहुत दूर है, अमेठी से उन्हें कड़ा संदेश मिला है, यूपी में बसपा के लिए जरूर उम्मीद जगी है और भाजपा की जीत यात्रा गुजरात पहुंच सकती है।

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