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महिला सशक्तिकरण की ओर बढ़ते कदम

सुमित्रा महाजन राजग सरकार में कई अहम पदों पर काम कर चुकी हैं। वे स्पीकर पैनल में भी रह चुकी हैं।

महिला सशक्तिकरण की ओर बढ़ते कदम

नई दिल्‍ली. मृदुभाषी सुमित्रा महाजन का 16वीं लोकसभा का अध्यक्ष बनाना देश का महिला सशक्तिकरण की ओर बढ़े एक कदम के रूप में देखा जा सकता है। उनका निर्विरोध चुनाव यह दर्शाता हैकि सभी विपक्षी दलों में उनके प्रति एक सम्मान व आदर का भाव है। सुमित्रा लोकसभा की दूसरी महिला अध्यक्ष हैं। इससे पहले 15वीं लोकसभा में मीरा कुमार पहली महिला अध्यक्ष निर्वाचित हुई थीं। सुमित्रा महाजन लगातार आठवीं बार मध्य प्रदेश के इंदौर से सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की ओर से सांसद चुन कर आई हैं। इस बार के लोकसभा चुनाव में वह 4 लाख 66 हजार से ज्यादा वोटों से विजयी रही थीं।

वह एक ही लोकसभा सीट से लगातार आठ बार जीतने वाली पहली महिला सांसद हैं। वे पूर्व में राजग सरकार में कई अहम पदों पर काम कर चुकी हैं। वे स्पीकर पैनल में भी रह चुकी हैं। लिहाजा सार्वजनिक जीवन में काम काज का उनके पास लंबा अनुभव है। इंदौर नगर निगम में पार्षद के तौर पर 1982 में राजनीति में पदार्पण करने वाली महाजन ने 1989 में कांग्रेस के दिग्गज प्रकाशचंद सेठी को एक लाख से अधिक मतों से हराकर पहली बार संसद में प्रवेश किया था। वे कॉरपोरेशन से उठकर यहां तक पहुंची हैं। उनके सामने लोकसभा में बहस की परंपरा को पुनर्स्थापित करने की चुनौती होगी। क्योंकि आज लोकतंत्र का मंदिर चर्चाके लिए कम बल्कि हंगामे और शोरगुल के लिए ज्यादा जाना जाने लगा है।

15वीं लोकसभा में हंगामे का रिकॉर्ड बन गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआईवाली राजग सरकार में महिलाओं को अच्छा खासा नेतृत्व मिला है। प्रधानमंत्री ने कैबिनेट में छह महिला सांसदों को जगह दी है, एक को राज्य मंत्री का दर्जामिला है। इस प्रकार से देखा जाए तो उनके पूरे मंत्रिमंडल में करीब 25 फीसदी हिस्सेदारी महिलाओं की है। उन्होंने देश को पहली महिला विदेश मंत्री भी दी है। वर्तमान में विदेश सचिव एक महिला ही हैं। इस पहल को देश में महिलाओं के सशक्तिकरण के प्रति प्रधानमंत्री की सजगता के रूप में देखा जा सकता है।

उच्च पदों पर महिलाओं को बैठाने से देश की अन्य महिलाओं में भी आत्मविश्वास आता है। साथ ही उनके प्रति पुरानी धारणाएं भी टूटती हैं। आज जिस प्रकार से उनके खिलाफ हिंसा हो रही है, उनकी आवाज दबाई जा रही है, हक छिने जा रहे हैं, वैसी स्थिति में महिलाओं के सशक्तिकरण की खासी जरूरत है। भारत खुद के लोकतांत्रिक देश होने पर गर्व करता है और हमारा समाज नारी को शक्ति के रूप में पूजता है, परंतु जब उनको हक देने और आगे बढ़ाने की बात आती है तो हमारी सोच का दायरा क्यों सीमित हो जाता है?

सच तो यह है कि महिलाओं को अवसर ही नहीं दिया जाता है, परंतु उन्हें जब-जब अवसर मिला, खुद को साबित किया है। हम 21वीं सदी में हैं, परंतु समाज में अभी भी कई स्तरों पर पुरुषवादी मानसिकता हावी है। इस स्थिति को बदलने के लिए समाज को अपनी नीयत बदलनी होगी। उन्हें नेतृत्व देना होगा, इसके बिना महिला सशक्तिकरण की बात बेमानी होगी। मोदी सरकार ने एक अच्छी शुरुआत की है।

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