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डॉ. विशेष गुप्ता का लेख: ताकि बच्चे न हों उपेक्षित

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड़-19 का मुख्य निशाना हालांकि बच्चे नहीं हैं, लेकिन उसमें बच्चे ही ज्यादा प्रभावित होंगे।

डॉ. विशेष गुप्ता का लेख: ताकि बच्चे न हों  उपेक्षित
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कोरोना संक्रमण की रोकथाम के लिए लगाए गए लाॅकड़ाउन में महिलाओं और वरिष्ठ जनों के मुकाबले बच्चे ज्यादा प्रभावित हो रहे है। वह इसलिए क्योंकि स्कूल बंद हैं, खेल के मैदान पर जाने से रोक हैे और बच्चे घरों में कैद हैं। उनके लिए इंटरनेट अथवा सोशल मीडिया का ही सहारा है। उस पर आॅनलाइन शिक्षा का बोझ भी है। इस बंदी के दौरान साइबर स्पेस के प्रयोग से बच्चों के लिए काफी खतरे भी पैदा हो गए हैं। बच्चों की सुरक्षा, संरक्षण और उनके अधिकारों को लेकर हाल ही में कई रिपोर्टस आई हैं। पहली रिपोर्ट इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन फंड की है जो भारत में बाल यौन उत्पीड़न नाम से 100 शहरों में अध्य्यन करके तैयार की गई है। यह रिपोर्ट बताती है कि लाॅकडाउन के काल में इंटरनेट पर चाइल्ड पोर्नोग्राफी की मांग 100 फीसदी तक बढ़ गई है। इस रिपोर्ट में लाॅकड़ाउन में पोर्नोग्राफी की बढ़ती मांग को देखते हुए बच्चों के खिलाफ यौनाचार और दुष्कर्म की घटनाओं में इजाफे का अंदेशा जताया है।

दूसरी रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र संघ ने जारी की है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड़-19 का मुख्य निशाना हालांकि बच्चे नहीं हैं, लेकिन उसमें बच्चे ही ज्यादा प्रभावित होंगे। तीसरी रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटानियो गुटेरेस की ओर से आई है। उसमें कोरोना के काल में बच्चों के अधिकार, सम्मान और भविष्य को सुरक्षित करने के लिए भारत सहित सभी देशों को तत्काल प्रभावी कदम उठाने की अपील की है। इसके अलावा राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने लाॅकडाउन के दौरान चाइल्ड पोर्नोग्राफी के मामलों में वृद्धि होने पर चिंता व्यक्त करते हुए गूगल, फेसबुक और ट्विटर को नोटिस भेजकर जवाब मांगा हैे। राष्ट्रीय बाल आयोग ने ही प्रदेश के सभी सचिवों और शिक्षा विभाग को पत्र भेजकर लाॅकडाउन में स्कूली बच्चों के लिए उपलब्ध करवाई जा रही आॅनलाइन शिक्षा से जुड़े डिजिटल प्लेटफार्म की निगरानी के लिए तंत्र विकसित करने को कहा हैे। कहने की जरुरत नहीं कि कोरोना के विस्तार के चलते देश में इस समय संपूर्ण लाॅकडाउन है। लाॅकडाउन को दो माह बीत चुके हंै। इस समय करोड़ों बच्चे अपने मां-बाप के बहुत नजदीक हैं। पढ़ाई का नुकसान न हो इसलिए स्कूलों ने भी इस बीच आॅनलाइन पढ़ाई के लिए पाठ्यक्रम भी बच्चों के घरों पर भेजना शुरु कर दिया है। बच्चों ने आभासी गैजेट्स के सहारे अभ्यास भी शुरु कर दिया है। इससे बच्चों के तनाव में रहने की खबरें भी आने लगी हैं। पंजाब में इसी लाॅकडा़उन में दो स्कूली बच्चे आॅनलाइन पबजी गेम खेलते खेलते मृत्यु की भेट चढ़ गए। अभी हाल ही में नोएडा के एक नाबालिग की मानसिक तनाव से मृत्यु इसलिए हो गई क्योंकि सोशल मीडिया पर उसके वीडियो को एक भी लाइक नहीं मिला। ये घटनाएं बताती हैं कि पूर्णबंदी का यह कालखंड़ सामान्य जीवन के काल से अलग है। इस समय परिवार को बच्चों के संग पारिवारिक दायित्वों के साथ में स्कूल के शिक्षक और दोस्त जैसी भूमिकाएं भी निभानी पड़ रही हैं। ऊपर से लंबे लाॅकड़ाउन से बढ़ता तनाव, उत्तेजना, चिंता व निराशा जैसी मनावैज्ञानिक व्याधियां परिवारजनों को तनाव में डाल रहीं हैं। इन सब का नकारात्मक प्रभाव बच्चों पर भी पड़ रहा है। बच्चे भी धीरे-धीरे भरे पूरे परिवार में एकल हो चले हैं। उनकी रात की नींद भी काफी कम हो गई है। यही बजह है कि बच्चों को आॅनलाइन गेम्स का सहारा लेना पड़ रहा है। यह बात शर्तिया है कि हमें इन बच्चों के इतना नजदीक आने का फिर मौका शायद न मिले। इसलिए इस समय बच्चों को साइबर दुनिया की खामियों को समझाने का यही सुनहरा मौका है। दरअसल पुरानी पीढ़ियों ने वर्तमान पीढ़ी को जितना अधिक सामाजिक-सांस्कृतिक रुप से सिखाने की कोशिश की, उन पीड़ियों के बच्चों का जीवन उतना ही सुरक्षित, सफल व समृद्ध बना है। सच यह भी है कि प्रत्यक्ष रुप से दैहिक सामाजीकरण का अभाव और सोशल मीडिया, कंप्यूटर व इंटरनेट के यांत्रिक क्रियाओं की प्रचुरता ने बच्चों के बचपन को द्वन्दात्मक बना रहा हंं।

इस समय अभिभावकों की जिम्मेदारी है कि बच्चों के बचपन एवं उनके वात्सल्य को सुरक्षित करने के लिए मोबाइल की जगह आपसी संवाद को बढ़ाए। आज के दौर में जब परिवार के हर सदस्य की अस्मिता एक अलग यूनिट के रुप में विकसित हो रही हो, ऐसे में आज मां-बाप की बच्चों के प्रति जिम्मेदारी और ज्यादा बढ़ गई है। हम जानते हैं आज के साइबर समाज में इन गैजेटस के प्रयोग को रोकना थोड़ा कठिन है। मगर इस समय लाॅकड़ाउन और बाहरी दुनिया से दूरी के समय में यह अच्छा मौका है कि मां-बाप बच्चों की इस आभासी पढ़ाई के साथ आपसी संवाद की गर्माहट को तेज करें। उसके बाद आपको महसूस होगा कि बच्चों की आभासी दुनिया का आपसी दुनियावी संबधों से समन्वय स्थापित होता जाएगा, उसी के अनुपात में ये आभासी गैजेट्स बच्चों को कम नुकसान पहुंचा पाएंगे। इसलिए आज की आभासी दुनिया से जुड़ी इन रिपोर्टस ने हमें बच्चों की साइबर दुनिया की ओर निगाह रखने और बच्चों से अपने आत्मीय संबधों को पुनः स्थापित करने का एक अच्छा मौका दिया है जिसका हमें समय रहते लाभ उठाने की महती आवश्यकता है।

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