Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

आलोक पुराणिक का लेख : अर्थव्यवस्था में उम्मीद की किरण

अर्थव्यवस्था के अंधेरे में खेतों से जैसे उजाला फूटता दिखता है, उजाला भले ही क्षीण हो। जीएसटी के आंकड़े जो अगस्त में आए हैं, वो भी बताते हैं कि हालात धीमे-धीमे ही सही कुछ सुधार पर हैं। अगस्त 2020 में कुल जीएसटी वसूली 86,449 करोड़ रुपये की रही। अगस्त 2029 के जीएसटी आंकड़े के मुकाबले यह आंकड़ा 11,753 करोड़ रुपये कम रहा। अगस्त में वाहनों की बिक्री के समाचार जुलाई के मुकाबले बेहतर रहे हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था
X
रिपोर्ट: भारतीय अर्थव्यवस्था

आलोक पुराणिक

संकट अभूतपूर्व है, ऐसा अभूतपूर्व कि इतिहास में इस संकट के समकक्ष दूसरा संकट तलाशना मुश्किल है। पर उम्मीद की किरणें तो कभी नहीं थमतीं, इन्हें गहनतम संकट में भी तलाशा जा सकता है। लाॅकडाउन के क्या असर रहा, अर्थव्यवस्था पर, इसके आंकड़े सामने आ चुके हैं। अप्रैल-जून 2020 तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद में 23.9 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। मोटे तौर पर माना जाए कि अर्थव्यवस्था एक चौथाई सिकुड़ गई है। अप्रैल-जून 2020 तिमाही में भवन निर्माण क्षेत्र में 50.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।इसका मतलब यह हुआ कि कंस्ट्रक्शन गतिविधियां ठप पड़ गई हैं।

कंस्ट्रक्शन गतिविधियों के ठप पड़ने का आशय यह होता है कि खेती-किसानी छोड़कर आने वाले बंदों के लिए सबसे सहज उपलब्ध रोजगार अवसर ठप हो गया है। कंस्ट्रक्शन क्षेत्र को आम तौर पर ऐसे क्षेत्र के तौर पर चिन्हित किया जाता है, जो मजदूरी का सबसे सहज मौका उपलब्ध कराता है। कंस्ट्रक्शन का ठप पड़ना अर्थव्यवस्था के लिए बुरी खबर है। शुक्रवार 4 सितंबर को आई वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में लॉकडाउन को कड़ाई से लागू किए जाने के कारण जून तिमाही में अर्थव्यवस्था में बड़ी गिरावट आई है। लेकिन इसके बाद गतिविधियां बढ़ने से देश की अर्थव्यवस्था तेजी से पटरी पर लौट रही है। मंत्रालय ने अगस्त की मासिक आर्थिक समीक्षा में कहा कि देश की अर्थव्यवस्था पहली तिमाही में गिरने के बाद अब तेजी से ऊपर की तरफ जा रही है।

रिपोर्ट में कहा गया कि इन उन्नत देशों के सापेक्ष, भारत की जीडीपी में 23.9 प्रतिशत की गिरावट आई, जो थोड़ी अधिक है। हालांकि रिपोर्ट में कहा गया कि कड़े लॉकडाउन की वजह से कोरोना वायरस के कारण होने वाली मृत्यु की दर भारत में सबसे कम रही है। इसके अलावा, रिपोर्ट में कहा गया कि देश वी-आकार की तरह तेजी से वापसी कर रहा है, जो वाहन बिक्री, ट्रैक्टर बिक्री, उर्वरक बिक्री, रेलवे माल ढुलाई, इस्पात की खपत और उत्पादन, सीमेंट उत्पादन, बिजली की खपत, ई-वे बिल, जीएसटी राजस्व संग्रह, राजमार्गों पर दैनिक टोल संग्रह, खुदरा वित्तीय लेनदेन, विनिर्माण पीएमआई, मुख्य उद्योगों के प्रदर्शन, पूंजी प्रवाह तथा निर्यात जैसे संकेतकों से भी पता चल रहा है। वी आकार की रिकवरी से आशय ऐसी रिकवरी से है, जो तेजी से वापस सुधार का संकेत करती है।

पर बुरी खबरें और भी हैं, महालेखा नियंत्रक द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार अप्रैल-जुलाई 2020 की अवधि में राजकोषीय घाटा इतना हुआ कि 2020-21 के पूरे साल के तय सीमा से भी ऊपर निकल गया। मोटे तौर पर यूं समझा जा सकता है कि 2020-21 के पूरे वित्तीय वर्ष में अगर 100 रुपये के राजकोषीय घाटे का लक्ष्य रखा गया था तो अप्रैल-जुलाई की अवधि में ही घाटा 103 रुपये हो चुका है। मेक इन इंडिया कार्यक्रम जिस सेक्टर मेन्यूफेक्चरिंग-विनिर्माण सेक्टर के हवाले है, उसमें अप्रैल-जून 2020 तिमाही में 39.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज आई है। अप्रैल-जून 2020 तिमाही में खनन क्षेत्र में 23.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। अप्रैल-जून 2020 तिमाही में सेवा क्षेत्र में 47 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

पर एक कहावत है-लाइफ गोज आन। जिंदगी चलती है, चलती ही जाती है। विकट से विकट महामारी, संकट के बावजूद जिंदगी रुकती नहीं है। रुक सकती भी नहीं। इसलिए कुछ ऐसे आंकड़े भी अर्थव्यवस्था से आ रहे हैं, जो उम्मीद बंधाते हैं। अप्रैल-जून 2020 तिमाही में कृषि क्षेत्र में विकास दर 3.4 प्रतिशत रही। गौरतलब है कि अप्रैल-जून 2019 की तिमाही में यानी अब से एक साल पहले कृषि क्षेत्र में विकास दर 3 प्रतिशत रही थी। यानी भारत के कृषि क्षेत्र ने कोरोना को जैसे मुंह चिढ़ाया है कि ज्यादा परिणाम देकर दिखाएंगे। यह अनायास नहीं है कि इतनी विकट महामारी में भी ऐसी खबरें नहीं दिखीं, जिनमें कहीं खाद्यान्न के संकट लेकर चिंता व्यक्त की गई हो। कुल मिलाकर खेती समूची अर्थव्यवस्था की संकट मोचक के तौर पर उभरी है। अर्थव्यवस्था के अंधेरे में खेतों से जैसे उजाला फूटता दिखता है, उजाला भले ही क्षीण हो। जीएसटी के आंकड़ें जो अगस्त में आए हैं, वो भी बताते हैं कि हालात धीमे-धीमे ही सही कुछ सुधार पर हैं। अगस्त 2020 में कुल जीएसटी वसूली 86,449 करोड़ रुपये की रही। अगस्त 2029 के जीएसटी आंकड़े के मुकाबले यह आंकड़ा 11,753 करोड़ रुपये कम रहा। पर देखने की बात यह है कि मार्च 2020 के बाद का वक्त विकट संकटों का रहा है। अगस्त में वाहनों की बिक्री के समाचार जुलाई के मुकाबले बेहतर रहे हैं। ट्रेक्टरों की बिक्री अभूतपूर्व रुप से शानदार हो रही है। देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था कोरोना के आर्थिक प्रभावों से उतनी त्रस्त दिखाई नहीं पड़ रही है, जितनी शहरी अर्थव्यवस्था परेशानहाल दिख रही है। कुल मिलाकर भारतीय अर्थव्यवस्था समेत पूरी दुनिया की तमाम अर्थव्यस्थाएं अभूतपूर्व संकटों का सामना कर रही हैं।

संकट इस कदर अभूतपूर्व है कि तमाम राहतों की खबरें भी राहत देती नहीं दिखती हैं। कुल मिलाकर भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत उस बंदे जैसी है जिसे कोई ट्रक बुरी तरह कुचलकर भाग गया हो। ट्रक से कुचलकर बंदे का सिर, पैर, हाथ, पेट, सब कुछ घायल हो, डाक्टर सिर जैसे संवेदनशील हिस्से को फिट कर दें फिर हाथ, पैरों पर संकट हों, तो मरीज के घरवाले डाक्टरों पर बिफरेंगे ही। ऐसी ही सूरत भारत के नीति निर्माताओं की हो गई है। 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज के बावजूद सरकार को आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है, यह स्वाभाविक है। अर्थव्यवस्था दुष्चक्र में है। कई धंधों में मांग ध्वस्त हो गई है। उन धंधों के कारोबारियों का धंधा ठप हो गया है, वो अपने मजदूरों को वेतन नहीं दे पा रहे हैं। ऐसी सूरत में सरकार की जिम्मेदारी होती है, वह खर्च करके अर्थव्यवस्था को मजबूती दे।

सरकार आधारभूत ढांचे पर खर्च करके, मनरेगा के जरिये खर्च करके अर्थव्यवस्था में मांग बढ़ा सकती है। दरअसल इस समय सरकार से ही उम्मीदें हैं और खासकर केंद्र सरकार से। राज्य सरकारों की हालत खस्ता है। कई राज्य सरकारें अपने कर्मियों को भी पूरा वेतन दे पाने की स्थिति में नहीं है। यह अभूतपूर्व है। संसाधनों के लेकर छिड़े युद्ध में जीएसटी मुआवजे को लेकर तमाम राज्यों और केंद्र सरकार में अलग तनाव चल रहा है। कुल मिलाकर अभूतपूर्व संकट का इलाज भी अभूतपूर्व उपायों से किये जाने की जरुरत है। केंद्र सरकार अपने खर्च बढ़ाए। संसाधन जुटाने के लिए विनिवेश कार्यक्रम को तेजी से आगे बढ़ाया जाना चाहिए। अर्थव्यवस्था की हालत चाहे जैसी हो, शेयर बाजार स्वस्थ और प्रसन्न दिखाई दे रहा है। ऐसी अवस्था विनिवेश के जरिये संसाधन संग्रह के लिए अनुकूल है। केंद्र सरकार मौके का इस्तेमाल कर सकती है। कुल मिलाकर चुनौतियां बड़ी हैं, पर सवाल यह है कि उनसे भिड़ने के अलावा हमारे पास कोई और चारा है क्या। नहीं, उनसे भिड़कर उनका सामना करके ही कोई राह निकालनी पड़ेगी। उम्मीद रखने के अलावा कोई और चारा ही नहीं है।

Next Story