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Sikh Riots Case : क्यों 2733 सिखों की मौत के ''इंसाफ'' में लग गए 34 साल

सिख दंगे केस के इंसाफ में 34 साल लग गए। न्याय की आस में उम्मीद भरी नजरों से अदालत की चौखट पर टकटकी लगाए बैठे पीड़ितों को आखिर निराश नहीं होना पड़ा।

Sikh Riots Case : क्यों 2733 सिखों की मौत के

सिख दंगे केस के इंसाफ में 34 साल लग गए। न्याय की आस में उम्मीद भरी नजरों से अदालत की चौखट पर टकटकी लगाए बैठे पीड़ितों को आखिर निराश नहीं होना पड़ा। दिल्ली हाईकोर्ट ने कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को 1984 सिख दंगों के एक केस में दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। सज्जन को आपराधिक साजिश और दंगा भड़काने का दोषी पाया गया। निचली अदालत ने 30 अप्रैल 2013 को उन्हें बरी कर दिया था। हालांकि सज्जन के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का कानूनी विकल्प है।

सिख दंगों के चार और अन्य केस में सज्जन कुमार आरोपित है, इसलिए अब आगे मुश्किलें कम नहीं होने वाली हैं। प्रधानमंत्री रहते हुए इंदिरा गांधी की उनके सिख अंगरक्षकों ने 1984 में 31 अक्टूबर को हत्या कर दी थी।

इस हत्या के बाद सिख दंगे हुए थे। सरकारी आंकड़े के मुताबिक इन दंगों में देशभर में लगभग 3,350 लोगों की हत्या की गई थी, इनमें सबसे अधिक दिल्ली में 2,733 सिख मारे गए थे।

सीबीआई ने पांच केस में सज्जन कुमार को आरोपित बनाया। इस दंगे के लिए कटघरे में खड़ा किए जाने पर कांग्रेस ने बयान दिया था कि ‘जब बड़ा पेड़ हिलता है तो धरती हिलती है'।

यह बयान उस दूषित मनोवृत्ति को दर्शाता है, जो भारतीय राजनीति में दशकों से व्याप्त है। ‘सामूहिक नरसंहार' भारतीय राजनीति के स्याह चेहरे को उजागर करता है।

सज्जन को सजा सुनाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी हमारी राजनीति, हमारी कानून व्यवस्था और जांच प्रणाली पर तगड़ा चोट करती है। अदालत ने कहा कि ‘आजादी के बाद यह सबसे बड़ा सामूहिक नरसंहार है।

सामूहिक हत्या की ये पहली वारदात नहीं थी और अफसोस की ये आखिरी भी नहीं थी। भारत विभाजन के समय सामूहिक हत्याएं हुई थीं, उसके बाद 1984 में हजारों निर्दोष सिखों की सामूहिक हत्या की गई।

सिख दंगे की ही तरह 1993 में मुंबई में, 2002 में गुजरात में, 2008 में ओडिशा के कंघमाल में, 2013 में यूपी के मुजफ्फरनगर में हत्या की घटनाएं हुईं। इन सभी सामूहिक अपराध की घटनाओं में ये समानता है कि सभी दंगों में अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया गया और

कानूनी एजेंसियों के सहयोग से राजनेताओं द्वारा हमले कराए गए। सिख दंगा के पीड़ित कई दशक से लोग न्याय का इंतज़ार कर रहे थे। ये जांच एजेसिंयों की नाकामी है कि जांच में इतनी देरी हुई।

मानवता के ख़िलाफ़ अपराध और नरसंहार हमारे घरेलू क़ानून का हिस्सा नहीं हैं। इन कमियों को ख़त्म करने की जल्द से जल्द ज़रूरत है'। दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि सिख दंगों में जो अपराधी थे, उन्हें राजनीतिक संरक्षण दिया गया और वे जांच तथा सजा से बचने में सफल रहे।

ऐसे अपराधियों को न्याय के कटघरे में लाना हमारी न्याय व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती है। अदालत की इस तल्ख टिप्पणी के बाद हमारी राजनीति, हमारी कानून व्यवस्था और हमारी जांच एजेंसियों में व्यापक स्तर पर सुधार की जरूरत है।

लेकिन सजा के बाद कांग्रेस जिस तरह की आरोप की राजनीति करती दिखी, वह न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि वह सुधरने को तैयार दिखाई नहीं पड़ती है। गलतियों से सबक लेते हुए सामूहिक नरसंहार की राजनीति बंद होनी चाहिए,

पुलिस व जांच तंत्र को भी सत्ता के प्रभाव से बाहर निकल कर जांच करना चाहिए, ताकि आम लोगों की हमारे तंत्र पर भरोसा बना रहे। अदालत के इस फैसले से अन्य दंगों के दोषियों को भी सजा मिलने की आस जगी है और सिख दंगों के अन्य केसों में भी जल्द फैसला होने व पीड़ितों को इंसाफ मिलने की उम्मीद बढ़ी है।

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