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सुशील राजेश का लेख : 'पीक' के डरावने अनुमान

कोरोना से जुड़े सरकार के विशेषज्ञ समूह ने एक प्रस्तुति के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कुछ मुख्यमंत्रियों को आगाह किया है कि ‘पीक’ बेहद डरावना साबित हो सकता है। उप्र सबसे ज्यादा करीब 1.25 लाख रोज़ाना संक्रमित मरीजों के साथ सूची में शीर्ष पर होगा, जबकि महाराष्ट्र एक लाख से कुछ कम मरीजों के साथ दूसरे स्थान पर होगा। राजधानी दिल्ली के आंकड़े भी 60,000 से अधिक हो सकते हैं। भयावह तथ्य यह है कि आॅक्सीजन की आपूर्ति, वेंटिलेटर और आईसीयू बिस्तरों की स्थिति जरूरत के मुताबिक कम उपलब्ध होंगे।

सुशील राजेश का लेख : पीक के डरावने अनुमान
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सुशील राजेश

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मध्य में कोरोना वायरस के सक्रिय मरीजों का 'पीक' 40-48 लाख का हो सकता है। यह हकीकत 14-18 मई के दौरान सामने आ सकती है। भारत 4 लाख संक्रमित मरीज रोज़ाना का आंकड़ा पार कर चुका है और सक्रिय मरीज भी 32 लाख से ज्यादा हैं। विशेषज्ञ इसे भी 'चरम काल' मान रहे हैं। नीति आयोग के सदस्य तथा कोरोना संबंधी टास्क फोर्स के प्रमुख डाॅ. वी.के.पाॅल की अध्यक्षता में अधिकार प्राप्त अफसरों की एक बैठक बीते दिनों हुई थी, जिसका निष्कर्ष था कि संक्रमित मरीजों की संख्या 5-6 लाख रोज़ाना तक बढ़ सकती है। इन विशेषज्ञों ने स्वास्थ्य मंत्रालय समेत अन्य संबंधित मंत्रालयों और अधिकारियों को आगाह किया था कि असाधारण कदम उठाए जाएं, ताकि इतने मरीजों को ऑक्सीजन और अन्य दवाइयां और सुविधाएं मुहैया कराई जा सकें। यह रपट प्रधानमंत्री मोदी को भी दी गई। कुछ विशेषज्ञों की गणना यह है कि जब कोविड 'पीक' पर होगा, तो भारत में 7-8 लाख संक्रमित मरीज हर रोज़ दर्ज किए जा सकते हैं। ये सभी विशेषज्ञ और वैज्ञानिक अपने-अपने विषयों के प्रख्यात विद्वान माने जाते हैं। मौजूदा संक्रमण को देखते हुए ये आंकड़े और अनुमान चौंकाते नहीं, बल्कि डरावने जरूर लगते हैं। देश में संक्रमण का कुल आंकड़ा 1.92 करोड़ को लांघ चुका है।

यदि कोविड के 'पीक' की स्थिति ऐसी होगी, तो हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कल्पना की जा सकती है। अस्पताल, बिस्तर, ऑक्सीजन, औषधियां और उचित इलाज को लेकर हमारी व्यवस्था पर बोझ बढ़ेगा ही। यदि मई में 'पीक' की स्थिति आती है, तो आम आदमी और संक्रमित मरीज के हालात क्या होंगे इन त्रासदियों को सोचकर ही रूह कांपने लगती है। इस बीच यह जानकारी भी साझा की गई है कि कोरोना से जुड़े सरकार के विशेषज्ञ समूह ने एक प्रस्तुति के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कुछ मुख्यमंत्रियों को आगाह किया है कि 'पीक' बेहद डरावना साबित हो सकता है। उप्र सबसे ज्यादा करीब 1.25 लाख रोज़ाना संक्रमित मरीजों के साथ सूची में शीर्ष पर होगा, जबकि महाराष्ट्र एक लाख से कुछ कम मरीजों के साथ दूसरे स्थान पर होगा।

राजधानी दिल्ली के आंकड़े भी 60,000 से अधिक हो सकते हैं। भयावह तथ्य यह है कि आॅक्सीजन की आपूर्ति, वेंटिलेटर और आईसीयू बिस्तरों की स्थिति जरूरत के मुताबिक कम उपलब्ध होंगे। अभी हमारी राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता का लक्ष्य शेष है। बीते साल के लाॅकडाउन में हमने 30-35 हजार वेंटिलेटर जरूर बना लिए थे लेकिन ये काफी नहीं हैं। हमें इससे कहीं अधिक की आवश्यकता है। अब अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, फ्रांस, आयरलैंड, रोमानिया और मध्य-पूर्व के देश भारत को वेंटिलेटर और मेडिकल उपकरण आदि की आपूर्ति कर रहे हैं। ऑक्सीजन जेनरेटर प्लांट, सिलेंडर और कंसंट्रेटर भी भेजे जा रहे हैं। करीब 40 देश हमारी मदद को आगे आए हैं। मदद स्वीकार करने के लिए केंद्र सरकार ने अपने 2004 के नियमों में बदलाव किया है। यह सवाल स्वाभाविक है क्योंकि दिसंबर, 2004 में मनमोहन सरकार ने एक प्रस्ताव पारित किया था कि भारत किसी भी देश से 'मदद' स्वीकार नहीं करेगा, क्योंकि उसमें आत्मनिर्भर बनने की शक्ति और प्रतिभा है। केंद्र सरकार के सूत्रों का भी दावा है कि विदेशों से जो मदद आ रही है, वह भारत सरकार खरीद रही है। देशों के अतिरिक्त बहुराष्ट्रीय कंपनियों में गूगल, माइक्रोसाॅफ्ट आदि के प्रबंधनों ने आर्थिक मदद की भी घोषणा की है। चीन भी 800 वेंटिलेटर भेज रहा है। घोर महामारी के दौर मंे भी भारत अकेला नहीं है, यह साबित हो चुका है। भारत सरीखे व्यापक बाज़ार को कोई भी देश नजरअंदाज नहीं कर सकता। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ ने भी बड़ी घोषणाएं की हैं। शुरू में भारत ने भी कई देशों को दवाओं व टीके से मदद की।

इतनी व्यापक, वैश्विक सहायता के बावजूद एक बेहद महत्वपूर्ण अभाव सालता रहा है कि यदि विश्लेषणों के मुताबिक संक्रमण के आंकड़े 7-8 लाख रोज़ाना तक पहुंच गए, तो अस्पतालों और कोविड केयर केंद्रों में इतने डाॅक्टर, नर्सें और पेरामेडिकल स्टाफ कहां से आएगा? ये संसाधन और टीके तो कोई भी देश भेजने में सक्षम नहीं है। उनकी अपनी विवशताएं हैं, क्योंकि कोरोना उन देशों में भी गहरे डंक मार चुका है। डाॅक्टरों और नर्सों का कोई विकल्प भी नहीं है। अभी प्रख्यात चिकित्सकों के एक सार्वजनिक संवाद के जरिए एक और भयावह आकलन सामने आया है कि अब कुछ ही दिनों के अंतराल में अस्पतालों के आईसीयू में कोरोना मरीजों की अप्रत्याशित मौत के सिलसिले शुरू होने वाले हैं। आईसीयू में मरीज अपेक्षाकृत सुरक्षित महसूस करता है, क्योंकि वह चिकित्सा की सबसे सघन व्यवस्था है। गौरतलब है कि आईसीयू में नर्स ही मरीज की सबसे ज्यादा देखभाल करती हैं और हमारे पास डाॅक्टरों के साथ-साथ नर्सों की भी किल्लत है। प्रख्यात डाॅ. देवी प्रसाद के मुताबिक, फिलहाल हमें 80,000 आईसीयू बिस्तरों की रोज़ाना जरूरत है। भारत में करीब 75,000 से लेकर 90,000 ऐसे बिस्तर माने जाते हैं, जो सभी भरे पड़े हैं। यानी उन पर कोविड या अन्य मरीज हैं। इन संभावनाओं के मद्देनजर कमोबेश 5 लाख आईसीयू बिस्तरों की जरूरत पड़ेगी। कोविड मरीज को बिस्तर ही स्वस्थ नहीं करते, बल्कि डाॅक्टर और नर्सें बेहद अनिवार्य हैं। हालांकि डाॅ. प्रसाद ने आकलन दिया है कि संभावित स्थितियों का आकलन करते हुए कमोबेश 2 लाख नर्सों और 1.5 लाख डाॅक्टरों की नियुक्ति करना अपरिहार्य है। इतना बड़ा कार्य-बल एकदम कहां से मिलेगा?

इसके सुझाव भी प्रख्यात चिकित्सकों ने दिए हैं। उनका बुनियादी तर्क है कि आईसीयू में पीपीई किट पहन कर कोई युवा ही सेवाएं दे सकता है, लिहाजा उन नौजवानों को भर्ती किया जा सकता है,जिन्होंने डाॅक्टरी और नर्सिंग की बुनियादी शिक्षा और ट्रेनिंग प्राप्त कर ली हो। उन्हें कोविड आईसीयू में एक साल की नौकरी करने का अनुबंध दिया जाए और बाद में उनकी डिग्री और डिप्लोमा उन्हें प्रदान कर दिया जाए। जिन युवाओं ने विदेश की यूनिवर्सिटी से डाॅक्टरी की है और अभी पीजी की परीक्षा पास नहीं की है, सरकार ऐसे युवाओं को भी नियुक्त कर सकती है, क्योंकि पांच साल के अध्ययन के दौरान ऐसे छात्रों ने बुनियादी ट्रेनिंग तो हासिल कर ली है। ये प्रयास कितने सफल होंगे, यह सरकार की कोशिशों के बाद ही स्पष्ट होगा।

फिलहाल 'पीक' के लिए मोर्चा तैयार करना चाहिए। डाॅ. वली, डाॅ. कौशल कांत और डाॅ. रवि मलिक सरीखे प्रख्यात चिकित्सक तो तीसरी और चौथी लहर के प्रति अभी से सचेत करने लगे हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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