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व्यंग्य : स्माइली स्टिकर

जब से सैकड़ों भाव-भंगिमाओं वाले स्माइली हमारी जिंदगी में आए हैं, हम स्टिकर टाइप बनते जा रहे हैं

व्यंग्य : स्माइली स्टिकर
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जब से सैकड़ों भाव-भंगिमाओं वाले स्माइली हमारी जिंदगी में आए हैं, हम स्टिकर टाइप बनते जा रहे हैं। हंसना, रोना, क्रोध, गुस्सा आदि का जिम्मा स्माइली पर डाल इस कदर भाव शून्य हो लिए हैं कि एक्सप्रेशन देने की बात पर स्माइली की तरफ ताकने लगते हैं, स्माइली हमारा मंतव्य समझ जाते हैं कि अभी हम खुश हैं, दुखी हैं, सहमत हैं, विरोध में हैं, हंसना हैं, क्रोधित हैं, नाखुश हैं, मुंह फुलाना है, जीभ निकालनी है, आंख मारनी है, भृकुटि टेढ़ी करनी है, मुंह बिचकाना है, गाल फुलाने हैं, घूरना है, आंसू टपकाने हैं, दांत दिखाने हैं, आदि-आदि।

कभी-कभी तो स्माइली भी यह सोचकर बोर हो जाते होंगे कि किन मनहूस शक्लों से पाला पड़ा है! सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर कुछ कहने, सुनने के जॉब पर हमने स्माइली को परमानेंट अपॉइंट कर लिया है। स्माइली की विभिन्न मुद्राओं से भरी महफिल में चेहरे पर तकनीक की स्किन लगाकर फ्यूचर के नाम पर वर्तमान में ही भूत हो गए हैं। टची जरा भी नहीं, मगर टच करने का जबरदस्त शगल पाले हैं। हमारी स्किन को टच करने से कोई भाव नहीं उभरते। अगली जनरेशन के स्माइली इतने स्मार्ट हो जाएंगे कि नए जन्में बच्चों को सिखाएंगे कि इंसान को किन मौकों पर, कैसे रिएक्ट करना चाहिए, लेकिन उनकी रुचि टच करने में रहेगी। सो, वे टच करना सीखेंगे और स्माइली विभिन्न मुद्राओं के साथ व्यवहार करना।

यानी स्माइली निरंतर इंसान होने की ओर अग्रसर हैं और हम निहायत ही स्माइली होते जा रहे हैं। तकनीक की हर एडवांस्ड स्टेज के साथ हम एक स्टेज पीछे खिसक जाते हैं।फिर भी हम फकत इसी में खुश हैं कि हमारे समस्त आवेग रति, हास, जुगुप्सा, शोक, भय, उत्साह, क्रोध, सम अब स्माइली के विषय हैं! हो सकता है कुछ वर्ष बाद किसी हास्य या क्रोध की बात पर हम स्माइली की तरफ देखें और हमारी मन:स्थिति देख उनकी हंसी छूट जाए। किसी दिन हमसे चुहल भी कर बैठे कि ऐ भाई, जरा हंसकर तो दिखाना! ऊपर से यह कहकर और चिढ़ा दें कि रहने दो, तुमसे नहीं होगा! मुमकिन है तब हम उन पर क्रोध भी न कर पाएं, क्योंकि वह काम तो हम अर्से पहले उनके सुपुर्द कर खुद को क्रोधमुक्त कर चुके हैं।
आज से सौ-दो सौ वर्ष पश्चात जब मानव की उत्पत्ति और समय-समय पर आए व्यवहारगत परिवर्तनों का अध्ययन किया जाएगा, तो लोग यह जानकर चौंक जाएंगे कि उनके पूर्वज 2015 तक कायदे की बात पर हंसते भी थे, रोते भी थे, क्रोध भी करते थे। प्रतिक्रिया देने के लिए मुंह भी खोलते थे। हाय, इत्ते सारे एक्सप्रेशन्स! कैसे कर लेते थे हमारे ग्रेट पूर्वज! फिर वे यह रहस्य भी खोज लेंगे कि 2015 के बाद इंसानी प्रजाति में तकनीक नाम की महामारी तेजी से फैली और उसकी चपेट में आए इंसान हंसने की बात पर फिर सिर्फ लिखकर ही हंस पाते थे, हा.. हा.. हा..!
फिर उनकी जिंदगी में स्माइली आ गए, ढेर सारे स्टिकर आ गए, जो इस कदर मानवीय और इंसानी हरकतें करने लगे कि इंसान फिर इंसान नहीं रह गए। कालांतर में स्माइली तो एकदम इंसान हो गए और जो इंसान थे, वे स्माइली, स्टिकर बनकर रह गए। इसका मतलब आज जो इंसान हैं, वे कभी स्माइली हुआ करते थे और तब जो इंसान थे, वे आज स्माइली, स्टिकर हैं। इस प्रकार हमारे पूर्वज बंदर थे, हम स्माइली के पूर्वज हो जाएंगे। गधों के सिर से सींग और इंसानों के पिछवाड़े से पूंछ इसी अनुपयोगिता के सिद्धांत पर ही तो गायब हुई हैं। हम भविष्य की कहानियों के डायनासोर हो जाएंगे, जिनके अध्ययन पर ग्रांट तक जारी होंगी।
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