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व्‍यंग्‍य: साल नया सवाल वही, आज भी नहीं नहाओगे?

केवल यही सवाल नहीं ऐसे अनेक सवाल हैं जो कोई उत्तर पाने की वजह से नहीं बस यूं ही पूछे जाते हैं।

व्‍यंग्‍य: साल नया सवाल वही, आज भी नहीं नहाओगे?
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क्या आज भी नहीं नहाओगे? मैडम जी ने इस सवाल को बीते हुए साल में पूछना शुरू किया था। कुछ सवाल होते ही ऐसे हैं जिनका कोई जवाब नहीं होता। फिर भी वो लगातार पूछे जाते हैं। पूछे जाते रहे हैं। पूछे जाते रहेंगे। ये सवाल वस्तुत: कालजयी होते हैं। केवल यही सवाल नहीं ऐसे अनेक सवाल हैं जो कोई उत्तर पाने की वजह से नहीं बस यूं ही पूछे जाते हैं। मसलन आप कैसे हैं, यह प्रश्न तब भी पूछ लिया जाता है जब बंदा आईसीयू में रुक रुक कर सांस ले रहा होता है। इसी तरह टीवी एंकर जब सवाल पूछने पर आते हैं तो वे कभी नहीं चूकते। वे बिना किसी उत्तर का इंतजार किये लगातार सवाल पूछते जाते हैं। वे यह काम रोज करते हैं। हर जरूरी और गैर जरूरी मौके पर करते हैं।

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सवाल यह है कि जब उत्तर की दरकार नहीं तब ये किये ही क्यों जाते हैं? लोगों की जुबान पर जितने सवाल रहते हैं उससे अधिक उनकी जेबों में रहते हैं। ये सवाल बड़े तिलिस्मी होते हैं। यह समयानुसार अपना रूप बदल लेते हैं। रंक का सवाल चंद सिक्कों का होता है। राजा का सवाल हुक्म होता है। सामंत का सवाल बेगार करवाने वाली दबंगई का होता है। घरवाली का सवाल चिरंतन होता है। राष्ट्रव्यापी होता है। अपने वर्चस्व प्रदर्शन के लिए उलहाना होता है। उसमें दुलार भी होता है। प्यार का परिष्कार होता है। लब्बोलुआब यह कि उसका सवाल बहुअर्थी बहुआयामी और ऑल-इन- वन संवाद होता है।
वैसे कुछ जवाब भी ऐसे होते हैं जो वास्तव में किसी प्रश्न का उत्तर न होकर खुद में ही सवाल होते हैं। जवाब की आड़ में छिपे सवाल करना पुरातन काव्य की नायिकाओं को बखूबी आता था। इस खेल में हमारे प्रगतिशील बड़े माहिर हैं। वे जब कुछ कहते हैं तो उनमें से नुकीले सवाल खुद-ब-खुद उग आते हैं। वे रायपुर जाते हैं और वहां से लौट भी आते हैं। सकशुल लौटने के तुरंत बाद जब सवाल उठते हैं तब वे भी तमाम सवाल उठा लेते हैं।
ये लोग कभी किसी से सवाल पूछते नहीं बस सवाल दर सवाल उठाते रहते हैं। ये राजनीति की दुनिया के मल्ल होते हैं। सवाल उठा-उठा कर अपनी बांहों पर मछलियां उकेरते हैं। मानसिक रूप से सबल बनते हैं। भुनभुनाते हुए रायपुर जाते हैं और अकड़े-अकड़े से वापस आते हैं। सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए नए सवाल गढ़ते हैं और उत्तर का इंतजार किये बिना समय के साथ आगे बढ़ जाते हैं। फिर भी सवाल यह किया जा सकता है कि आखिर ये सवाल किये, उठाये और पूछे ही क्यों जाते हैं? क्या इस दुनिया का काम केवल जवाबों से नहीं चल सकता? सचमुच जो कुछ करते धरते हैं वे कभी सवाल नहीं करते। वे अपने कर्म में संलग्न रहते हैं। उनके लिए सवाल करना एक लग्जरी है जिसे वे अफोर्ड नहीं कर सकते।
नया साल आ गया है। उसे तो आना ही था। यदि नहीं आता तो वह कहां जाता। उसके आने में किसी सवाल का कोई हाथ नहीं। कुछ लोग आधी रात को इतने अधिक चीखे चिल्लाये, इतना नाचे कूदे और इतनी अधिक दारू पी और वमन किया कि उन्हें लगा होगा कि ये नया साल उनके प्रयास से आया है। जी नहीं, नया साल तो स्वत: आया है? जाड़ों के बाद अच्छे दिनों के आने न आने का सवाल जस का तस कायम है। उसी तरह मैडम जी का यह उलहाना कि क्या अबकी बार नए साल पर भी नहीं नहाओगे?
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