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व्यंग्य : अपनी राय पोस्ट कीजिए

मेरे पास एक प्रॉडक्टिव आइडिया है,उसने कहा तो मैं चौंका।

व्यंग्य : अपनी राय पोस्ट कीजिए
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- अशोक गौतम -
कल तक जो बीवी आठ पहर चौबीसों घंटे मैगी का गुणगान किया करती थी, उसी बीवी ने मैगी के इन दुख के क्षणों में उससे हमदर्दी जताने के बदले मेरे कान में पहली बार प्रॉडक्टिव आइडिया फुसफुसाया तो मेरे हाथों से पेन खिसक कर जमीन पर जा पड़ा, सुनो जी! मेरे पास एक प्रॉडक्टिव आइडिया है,उसने कहा तो मैं चौंका।
चौंका इसलिए कि आइडिया तो मेरी बीवी के पास एक से बढ़कर एक हैं पर उसने जो पहली बार आइडिया से पहले प्रॉडक्टिव आइडिया की बात कही। मैंने अपने अगले व्यंग्य के लिए आइडिया किनारे छोड़ दांतों तले पेन दबाते उससे चकित हो पूछा, क्या प्रॉडक्टिव आइडिया है तुम्हारे पास?
इसके धर्म जली मैगी के पिटने के बाद क्या है न कि पूरे देश में मैगी के लिए हाहाकार मचा हुआ है। कई घरों में तो चूल्हा जलना तक बंद हो गया है। मैगी के बिना बच्चे तो बच्चे, बूढ़े तक बूढ़े हुए जा रहे हैं। बिन मैगी देश चार दिन में ही देखो तो कितना कमजोर हो गया है।
होते हैं तो होने दो, जहर खाने से बेहतर तो भूखे पेट सो जाना है, मरते हुए राइटर के भीतर उस वक्त समाज सुधारक पता नहीं कहां से जाग उठा।ऐसे में जो तुम चाहो तो.. अपने दिन बहुर सकते हैं। क्या? मेरे दिन? अरे, इस देश में घूरे के दिन बहुर सकते हैं पर मेरे जैसे लेखक के नहीं!
मेरी मानो तो इससे पहले कि बाबा बाजार में अपनी मैगी उतार देश के पेट पर कब्जा जमा लें, तुम आदर्श पति होने का परिचय देते हुए ये बेकार के व्यंग्य लिखना बंद कर गई मैगी का नया संशोधित संस्करण वैगी बाजार में उतार दो तो देखते ही देखते अपने वारे न्यारे न हो जाएं तो कहना!
अरी भागवान! कहां बाबा और कहां मैं? मैंने तुम्हें कितनी बार समझाया कि एक लेखक सबकुछ हो सकता है पर कम से कम बाबा नहीं हो सकता।तो तुम्हारी र्मजी। मैं तो तुम्हें सफल पति होने का मौका देना चाहती थी पर जिसके भाग में.., बीवी ने पूरे नरक सा दुख महसूसते कहा तो अपने पर बहुत दया आई। कुछ देर अपने पर मन ही मन हंसने के बाद उससे मैंने कहा, देखो बेगम! पहली बात तो ये कि आइडियों पर पहला कानूनी हक राइटर का होता। कहां एक लेखक और कहां नूडल्स बना बेचने वाला!
एक मरियल से मरियल लेखक का दर्जा नूडल्स बनाने बेचने वाले से कहीं ऊंचा होता है। सृष्टि में नूडल्स बेचने वाले तो बहुत पति मिल जाएंगे पर लिखने वाला पति परम सौभाग्य से ही मिलता है। अगर लेखक पूंजीवादी के एंगिल से सोचेगा तो आ लिया देश में समाजवाद! तीसरे, वह अपने सुंदर रचना संसार का ब्रह्मा है। जहर बेचकर तबाही बचाने वाला नहीं। ये अनाप शनाप कौन कहता है?
मैं कहता हूं, मैंने सीना चौड़ा कर कहा तो वह मुझसे भी जोश में बोली, बहुत हो चुका। अब ये मजाक बंद करो! मैं बात बिंदी लाने की करती हूं और तुम ले आते हो डाक टिकट! मैं मांग के लिए सिंदूर मंगवाती हूं और तुम ले आते व्यंग्य भेजने को लिफाफे।
ऐसे लेखन से तो बेहतर है कि ये लिखना- लुखना छोड़ नूडल्स-फूडल्स का धंधा शुरू करो तो कम से कम मोहल्ले में मैं भी गर्व से सिर ऊंचा कर तो निकल सकूं, कह वह चार-चार कदमों का एक-एक कदम कर पता नहीं किस ओर चली गई। कलम मार पूंजीवादी भवरों में फंसा है। मित्रो, अपनी राय शीघ्र पोस्ट कीजिए प्लीज।
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