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व्‍यंग्‍य: शादी का लिफाफा और उपहार-व्यवहार की चिंता

सब खुश हैं। ऐसा नहीं है कि लड़की पक्ष के लोग खुश नहीं होते। वो तो हमारी फिल्मों ने कुछ ऐसा चित्रित किया है कि लड़की का बाप सदैव दुखी ही रहे।

व्‍यंग्‍य: शादी का लिफाफा और उपहार-व्यवहार की चिंता
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देश पे शादियों का सीजन विराजमान है। लड़के वाले स्वयं को भगवान समझ रहे हैं। लड़की वाले खुद को भगवान का सबसे बड़ा भक्त मानने की मजबूरी में हैं। लड़के वालों की एंठी सूरतें उनकी तिजोरी के अच्छे दिनों की ओर संकेत कर रही हैं। चहुंओर उत्सव सा माहौल। हो भी क्यों न, शादी से बढ़कर अपने देश में किसी त्योहार की हैसियत नहीं है। सब खुश हैं। ऐसा नहीं है कि लड़की पक्ष के लोग खुश नहीं होते। वो तो हमारी फिल्मों ने कुछ ऐसा चित्रित किया है कि लड़की का बाप सदैव दुखी ही रहे।

वरना अपने यहां तो ऐसे कनिष्ठ क्लर्क से लेकर वरिष्ठ इंजीनियर टाइप बापों की कमी नहीं है, जिनके आगे विश्व बैंक भी पानी भरने लगे। शाही अंदाज मे बिटिया विदा होती है। हां, इन ऐतिहासिक बापों और बेटियों को छोड़ दें, तो एक आम लड़की का आम बाप गुरुत्वाकर्षण के नियम का पालन कड़ाई से करता दिखता है। वह गलती होने से पहले ही अपना माफीनामा तैयार रखता है।

अधिकतर वह झुका ही रहता है और लड़के वाले उसे इस तरह आशीर्वाद देते हैं कि कभी उठ ही न सके। यहां मुझे लज्जा फिल्म का एक दृश्य स्मरण हो आया-लड़की का बाप दूल्हे के टुच्चे किस्म के दोस्तों और रिश्तेदारों से अकारण ही माफी मांगता फिरता है। वह दोनों प्रकार की लक्ष्मियों के जाने से इतना दुखी हो जाता है कि सर्कस के जोकर की भांति चेहरे पे मुस्कान चिपकाए रहता है। शादी में लड़का लड़की, दोनों ही पक्ष के बुआ, ननद, भाई, बहनोई आदि ढेरों रिश्तेदारों के चेहरे पे मुस्कान ऐसी लगती है जैसे चेहरे को फोटोशॉप कर, मुस्कानों को उनकी हैसियत के हिसाब से चिपका दिया गया हो। दरअसल, सबकी मुस्कान के पीछे एक चिंता होती है। जी हां, किसे क्या उपहार-व्यवहार मिलने वाला है।

बुआ की साड़ी, ननद की साड़ी से अच्छी निकली तो भारतीय संसद जैसा माहौल बनने में देर नहीं लगती। गलती से लिफाफा खाली निकला, तो पंचायत बैठते देर नहीं लगती। लिफाफा भेंट करने वाला व्यक्ति स्वयं को अपराधी मान, जीवन भर इस अक्षम्य अपराध के ताने सहने की सजा काटता है। लड़के के रिश्तेदार और पड़ोसी पैनी निगाहें तिलक पे चढ़ने वाले चढ़ावे पर लगातार चढ़ाए रखते हैं। उधर लड़की पक्ष के पड़ोसी-रिश्तेदार, विवाह स्थल तक का रास्ता इसी बात पर काट देते हैं कि कितना व्यवहार देना उचित रहेगा। कई तो यही सोचने मे काफी समय व्यतीत करते हैं कि व्यवहार अपनी हैसियत के अनुसार दें अथवा सामने वाले की हैसियत देखकर दें।

व्यवहार देने के नाम से व्यथित कई लोग इस बात का फैसला विवाह स्थल पे मौजूद भोजन व्यवस्था के अनुसार ही करते हैं। मसलन खाने की क्वालिटी और क्वांटिटी के अनुसार, व्यवहार का भुगतान होता है। खैर, भारतीय विवाह से जुड़ी बातों पे तो अनेक ग्रंथ लिखे जा सकते हैं। मैं आपको एक अच्छे दिन की बात बताता हूं। परसों ही अपने दूर के करीबी की शादी में शरीक होने का मौका मिला। दूर के करीबी होने का लाभ यह है कि व्यवहार की ज्यादा चिंता करने की आवश्यकता नहीं होती। माहौल देखकर दूल्हे पक्ष और दुल्हन पक्ष के लोगों मे अंतर करना कतई मुश्किल नहीं था।

जो मुंह सीए खड़े थे और जिनके हाथों मे खाने की प्लेट की जगह शरबत का गिलास भर था, वे लड़की पक्ष के लोग थे। जिनके चेहरे पे रौब था और हाथों मे सात आठ व्यंजनों से सजी प्लेट थी, वे लड़के वाले थे। डस्टबिन में पड़ी प्लेटों का बचा हुआ खाना देख कर मुझे लगा कि अच्छे दिन तो वहीं डस्टबिन में वेस्ट पड़े हैं। फिर हम क्यों अच्छे दिन हेतु तरसने का रोना रोते रहते हैं?

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