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व्यंग्य: प्रेमी-प्रमिकाओं का सबसे बड़ा फेस्टिवल ''हैप्पी वैलेंटाइन-डे''

यह मॉडर्न सांस्कृतिक उत्सव है।

व्यंग्य: प्रेमी-प्रमिकाओं का सबसे बड़ा फेस्टिवल
वैलेंटाइन-डे पर उपहार के कस्टम या सिस्टम से एक दूजे के प्रति निकटता का बोध होता है। प्रेजेंट का वांटेड प्रेजेंटेशन प्रणय को परिणय तक ले जाता है। ‘बिन फेरे हम तेरे’ वाली अट्रेक्टिव उम्मीदें अफेक्टिव हो सकती हैं। आशा से आकाश थमा है।
जो रिश्ता सितार के तार का झनकार से है, वही रिश्ता प्यार का इजहार से है। इसी तर्ज पर इजहार का नाता उपहार से है। गिफ्ट से ही रिटर्न गिफ्ट के रूप में लिफ्ट प्राप्त होती है। लिव इन रिलेशन की हवा के चलते अरुणाई वाली तरुणाई की एज के स्टेज पर क्रेज का प्रदर्शन बहुत प्रासंगिक है। रेडीमेड लव की दृष्टि से फैशनी अंदाज में बेहतरीन और हसीन प्रेमपर्व है वैलेंटाइन-डे, जिसका इंतजार फेसबुकिया पीढ़ी को बड़ी बेसब्री से रहता है। इसकी आड़ में मॉडर्न मजनुओं की खुशी को पंख लग जाते हैं। ‘एक तू न मिले सारी दुनिया मिले भी तो क्या है।’ ऐसे रोमांचक विशेषण के संप्रेषण के वास्ते आज अनेक रास्ते खुल गए हैं।
अब तो जनम-जनम के प्यार का जमाना अच्छी तरह रवाना हो गया है। शॉर्ट एंड स्मार्ट के लेटेस्ट तथा बेस्ट दौर में मौसमी प्यार की ही बहार है। चार दिन की चांदनी के नजारे भी बहुत प्यारे माने जाते हैं। किसी एक से ही लगातार प्यार से बोरियत होने लगती है। चेंज और एक्सचेंज के ट्रेंड के महत्व को नकारना रूढ़िवादी मानसिकता है। प्रणय की परिभाषा बदल चुकी है, जो स्वीकार्य और अनिवार्य है। प्यारदर्शी को पारदर्शी होना जरूरी नहीं है। लव से बढ़कर लव का शो होता है। अभिनय को अभिनव होना चाहिए। प्रपोज करते समय अपनी सचाई एक्सपोज न होने देना सामयिक है। सुर्ख गुलाब का फूल प्रदान कर अपनी भावनाओं को शेयर करने वाले पेयर वैलेंटाइन-डे को खूब जीवंत और रसवंत बनाए रखते हैं। सिटी टू सिटी यह सेलिबे्रशन परवान चढ़ता जा रहा है।
आज चौतरफा लाज पर गाज गिर रही है। ऐसे खुलेपन के हॉट जमाने में जो परंपरावादी, नई प्रगति को आहत करना चाहते हैं, वे शायद यह भूल जाते हैं कि दिल भी कोई चीज है। जवानी का पानी लासानी होता है। टच थेरेपी से लेकर रोमांस के चांस पाने हेतु जी का मचलना स्वाभाविक है। इंटरनेट वाली जेनरेशन द्वारा पाबंदी को गंदी बात मानना प्रगतिशीलता का सटीक प्रतीक है। जेनेटिक और मेग्नेटिक अफेयर को वेलकम कहना अच्छी बात है। अगर यह आरोप लगाया जाए कि इस तरह की इश्कबाजी से धोखे ज्यादा होते हैं, दर्दनाक और शर्मनाक दुर्दशा होती है तो ये सब फालतू की बाते हैं। यह ध्यान में धरना चाहिए कि अकल बादाम खाने से नहीं बल्कि ठोकर खाने से आती है।
मदनोत्सव अर्थात वसंत के बीच वैलेंटाइन-डे मनाया जाता है। ग्रामीण अंचलों की बस्ती-बस्ती में बढ़िया मस्ती का माहौल रहता है। बेचारे संयम की हवा निकल जाती है। ‘ऐसा क्या कर दिया वसंत ने, गेरुआ उतार दिया संत ने’ तो फिर उन प्राणियों का क्या हाल होगा, जिनका यौवन पानी में भी आग लगा सकता है। जोश अर्थात क्रेज को होश से परहेज भी रहता है। जवां उम्र ही ऐसी होती है। ब्लड का फ्लो भी अधिक महसूस किया जाता है। वैलेंटाइन-डे पर उपहार के कस्टम या सिस्टम से एक दूजे के प्रति निकटता का बोध होता है। प्रेजेंट का वांटेड प्रेजेंटेशन प्रणय को परिणय तक ले जाता है। ‘बिन फेरे हम तेरे’ वाली अट्रेक्टिव उम्मीदें अफेक्टिव हो सकती हैं। आशा से आकाश थमा है।
हमारे जवां दिल गबरू जवानों को ईर्ष्यालुओं के प्रति किंचित भी चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। नेक काम में अड़ंगे लगते ही हैं। ‘जलने वाले जला करें, आप तो अपना भला करें।’ आशिक को एसिक होना चाहिए सिक नहीं। प्रणय-प्रदर्शन में जो उन्मुक्त रहता है, वही आंनद से युक्त रहता है। नई फसल को भौतिकता के युग में नैतिकता से जबरन लादना शोभा नहीं देता है। यह दिवस नस-नस में रस भर देता है। भावमीनी सुगंध से तर कर देता है। इसलिए इसे निंदनीय न कहकर अभिनंदनीय कहना उचित है। मैत्रीपूर्ण चिट-चैट के नजारे कितने प्यारे होते हैं। नई जेनरेशन यदि लिव इन रिलेशन को लाइक करती है, तो यह अपडेट संस्कृति है, जिससे हार्ट स्मार्ट हो जाता है। जहां तक भूल-चूक का सवाल है, तो इसे नजर-अंदाज करना अच्छा है। सुधार के लिए गलतियां होती हैं। ज्यादा रोक-टोक के नतीजे साइड इफेक्ट के कारक बन सकते हैं। अंधेरे में मिलन से बेहतर उजाले में मिलन है। चाह अपनी राह बना ही लेती है।
यह भी सरासर सच है कि लव एट फर्स्ट साइट अर्थात पहली नजर का प्यार आटोमैटिक मैजिक होता है। इसके बाद फिर पेयर के बीच अफेयर चलता रहे, इसकी कोई गारंटी या वारंटी नहीं होती है। जब तक प्यार की बयार तब तक बहार इतना भी क्या कम है। समथिंग इज बैटर देन नथिंग। बहुत से लोग वैलेंटाइन-डे को विदेशी कल्चर की नकल कहते हैं। लेकिन उन्हें पता होना चाहिए कि देशी घी मटमैला होता है पर ब्रांडेड घी खूब गोरा होता है। उसकी बिक्री भी खूब होती रहती है। गुलामी के समय से ही आयातित माल के दिन-रैन बढ़िया फैन रहे हैं। इंपोर्टेड चलन के प्रतिफलन से ही भारत को इंडिया कहने के गौरव का खास अहसास होता है। दर्शन के देश में प्रदर्शन की हवा चल रही है।
हमें कभी-कभी उस समय की याद आती है, जब हम पर जवानी का पानी चढ़ रहा था। तरंगों की तरह उमंगों की हलचल बढ़ती जाती थी। मगर लोकलाज के भय के मारे हम ‘नदी किनारे घोंघा प्यासा’ सिद्ध हुए। आखिर घोंघा बनने की शैली में इकतरफा प्यार हम कहां तक करते, सो ठंडे बस्ते बने रहे। उस दौर में ऐसे मिलन-मेला की कल्पना भी नहीं थी। लड़के तक में यह कहने का दम नहीं था, ‘शादी मैं तुझसे करूंगा, वरना कुंआरा रह जाऊंगा।’ आधुनिक युग में इस तरह के अनारदाने जैसे मीठे तराने सुनकर जी गद्गद् हो जाता है, ‘मैंने तुझे मांगा तुझे पाया है, तूने मुझे मांगा मुझे पाया है।’ बाद में अधबीच में ही जोड़ी टूट जाए तो भी हताश होने की बात नहीं है।
इस प्यारे वैलेंटाइन-डे के आगे-पीछे कुछ रोचक प्रसंग भी सुनने को मिल जाते हैं। एक गर्लफ्रेंड अपने ब्वॉयफ्रेंड के बारे में अपनी सहेली से बता रही थी, ‘एक अंतराल से मिलाप न होने से मेरे ब्यॉयफ्रेंड ने खाना-पीना छोड़ दिया है।’ सहेली ने तो इससे बढ़कर बताया कि उसके ब्वॉयफ्रेंड ने तो केवल खाना ही छोड़ा है।
वैलेंटाइन की मैचिंग वाली फिजां में दिलनुमा गुब्बारे और गुलाब से चार्मिंग तथा वार्मिंग माहौल में तो तितलियां भी बिजलियां गिराती हैं। इससे अप्रासंगिक या अनैतिक न मानकर ईर्ष्यालु कृपालु बन जाएं, ऐसी संवेदनशील अपील है। फेवरेट का फेवर करना चाहिए। यह मॉडर्न सांस्कृतिक उत्सव है। इजहार के सीन देख-सुनकर बुजुर्गों का मन मचलता है तो हैप्पी वैलेंटाइन-डे की सफलता है।
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