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अशोक गौतम का व्यंग्य : बिन पर्ची सब सून

देश में पर्चियों के बल पर कोई डॉक्टर बन मरीज के सामने तन रहा है तो कोई पुलिस की कुर्सी पर जा विराजा है।

अशोक गौतम का व्यंग्य : बिन पर्ची सब सून
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पड़ोसी कल पेरशान सा मेरे पास आया। आते ही बोला कम, अधिक गिड़गिड़ाया, मास्साब! बेटे को अब आप ही समझाओ। कल उसका पर्चा है। पढ़ने के बदले दनादन पर्चियां बना रहा है। दिमाग किताब के बदले पर्चियों पर दौड़ा रहा है। फोटोस्टेट वाले के पास जा किताब का हर पन्ना रिडियूस करा रहा है। जो नकल करता पकड़ा गया तो मेरी तो बची खुची नाक भी चली जाएगी। और ऊपर से मुझे धमका रहा है कि मैं उसे उसके पेशाब के बहाने हाफ टाइम के बाद परीक्षा हॉल से बाहर आने पर सीना चौड़ा कर पर्चियां दूं। जो न दूं तो कल से वह मेरा बेटा नहीं, मैं उसको उसका बाप कहता फिरूं तो कहता फिरूं! प्लीज ऐसे में मास्साब कुछ करिए आप! खैर, समझने वाला तो वह है नहीं पर फिर भी आप उसे थोड़ा बहुत समझा दो तो आपकी बहुते बहुत मेहरबानी होगी, कह उसने दोनों हाथ जोड़े तो मैंने उन्हें समझाते कम बुझाते अधिक कहा,बंधु!

आप भी पता नहीं किस जुग में जी रहे हैं। अरे, जानते नहीं कि अब आप गाय का शुद्घ दूध नहीं, यूरिया, साबुन का झाग पी रहे हैं। ऐसे में दिमाग खालिस कहां से होवे? छोड़ो परे। साहब जादे को इम्तिहान में पर्चियां क्या पूरी किताब शान से ले जाने दो। वहां तीन घंटे मिलते ही नकल करने को हैं। जे पढ़ने का नहीं, नकल का जमाना है। उसे जो वह कहता है करने दो, जो उसे सबसे आगे लाना है। अब उनको ही देखो लेओ देखो न! वे राज हठ किए हैं कि जो हो सो हो, वे अपने बिटुआ को देश का नेता बनाकर ही दम लेंगे। और बेटे का हठ है कि वे देश को अपना दमखम दिखा कर ही रहेंगे। देश को अपना जंग लगा लोहा मनवा कर ही रहेंगे। भले ही उन्हें संसद में पर्ची का सहारा लेना पड़े।

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सच कहें, आज के जमाने में पर्ची लेकर आगे बढ़ने का मजा ही और है। हाय रे मेरे देश के पर्ची प्रेम। इम्तिहानों के दिनों देखो तो हर परीक्षा केंद्र के बाहर पर्चियां देने वाले परीक्षा देने वालों से दोगुने। पुलिस की देख रेख में वे पर्ची- पर्ची चिल्लाते फिरते हैं और वह भी मुफ्त में। बड़े से बड़े नाक वाला शान से जेब में पर्चियां डाले मूछों पर ताव देता परीक्षा भवन में प्रवेश करता है। क्या मजाल जो कोई उसको रोकने का साहस करे।
देश में पर्चियों के बल पर कोई डॉक्टर बन मरीज के सामने तन रहा है तो कोई पुलिस की कुर्सी पर जा विराजा है। देश में बढ़ते पर्चियों के चलन को देख तो अब ऐसा लगता है कि पर्ची वाला ही गंगू तेली है पर्ची वाला ही भोज राजा है। जो अभागे अपने दिमाग पर भरोसा कर परीक्षा भवन में पर्ची ले जाने से डरते रहे, वे दिमाग होने के बावजूद भी घुट घुट कर जीते रहे, माशा माशा मरते रहे। परीक्षा भवनों में दिमाग नहीं, पर्चियां चलती हैं। हे पर्ची, तू महान है। स्कूल से लेकर संसद तक विद्यमान है। तू न चले तो बंदा तेरे बिना एक कदम न चले। तू चले तो आज के दौर में गधा भी सफेद हाथियों सा फले फूले। हे पर्ची, तुझे जिसने भी, जहां भी चलाया, उसने अखंड सौभाग्य का वर पाया।
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