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अंशुमाली रस्तोगी का व्यंग्य: अकल, नकल और भैंस

मैं सोचता था कि अकल से बढ़िया तो भैंस है, जो बिना फेल हुए अपनी धुन में एक ही रास्ते चलती रहती है।

अंशुमाली रस्तोगी का व्यंग्य: अकल, नकल और भैंस
मुझे खूब याद है, बचपन में जब एक ही क्लास में मैं कई-कई दफा फेल होता था, तब मुझे अपनी अकल पर दया और भैंस पर फख्र होता था। मैं सोचता था कि अकल से बढ़िया तो भैंस है, जो बिना फेल हुए अपनी धुन में एक ही रास्ते चलती रहती है। भैंस के आगे लोग बीन भी बजा लें तो भी स्थिर ही बनी रहती है।
मैंने हमेशा से ‘भैंस’ को ‘अकल’ से बड़ा माना है! भैंस न केवल अपने साइज बल्कि चरित्र में भी अकल से बड़ी ही होती है। फिर भी, जिन्हें लगता है कि अकल ही भैंस से बड़ी होती है, उनके प्रति मैं सहानुभूति का भाव रखता हूं। अकलमंद लोगों के साथ यही दिक्कत है कि वे अपनी अकल के आगे किसी की चलने नहीं देते।
मुझे खूब याद है, बचपन में जब एक ही क्लास में मैं कई-कई दफा फेल होता था, तब मुझे अपनी अकल पर दया और भैंस पर फख्र होता था। मैं सोचता था कि अकल से बढ़िया तो भैंस है, जो बिना फेल हुए अपनी धुन में एक ही रास्ते चलती रहती है। न किसी के कहे की परवाह करती है न चुहलबाजी की। भैंस के आगे लोग बीन भी बजा लें तो भी स्थिर ही बनी रहती है। बहुत हुआ तो ‘हां-न’ में सिर हिला देती है।
कहने में क्या शर्माना, बचपन से मेरी प्रेरणा का स्रोत, बड़े-बड़े महापुरुष नहीं बल्कि ‘भैंस’ रही है। मेरा आधे से ज्यादा बचपन भैंसों के बीच ही बीता है। भैंस मुझे और मैं भैंस को अच्छे से समझ सकते हैं। इसीलिए मैं अकल को दोयम और भैंस को पहले दर्जे पर रखता हूं।
पता नहीं क्यों अकल से मुझे शुरू से ही एलर्जी रही है। यही वजह है, मुझे अकलमंद लोगों के पास कम और नकल पसंद लोगों के पास बैठना अधिक अच्छा लगता है। नकल पसंद लोग एकदम भैंस जैसे होते हैं। जहां से जो या जैसी पर्ची मिल जाए, बिना अकल लगाए, बस नकल करने बैठ जाते हैं। भले ही पर्ची में दो नंबर सवाल का उत्तर लिखा हो लेकिन वे उसे एक नंबर सवाल का उत्तर समझकर ही उतारते चले जाते हैं।
किसी और को क्या कहूं, ऐसा मैंने खुद न जाने कित्ती ही दफा एग्जाम के दौरान किया था। नकल करने में जित्ती आत्मिक सुख की प्राप्ति होती है, उत्ती तो अपनी अकल लगाकर भी नहीं मिल पाती। अकल के साथ तमाम तरह के झंझट हैं। एक तो अकल अपने आगे किसी को कुछ समझती नहीं। दूसरा, अकलमंद व्यक्ति नकल मंदों से घृणा टाइप व्यवहार रखता है। लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं कि नकलमंद दोयम दर्जे के बंदे होते हैं। अगर नकलमंद न रहे होते तो दुनिया में न इत्ते अविष्कार होते, न खोजें। हर बंदा किसी न किसी तरह से कुछ न कुछ नकल कर रहा है। कोई बड़ी नकल कर रहा है तो कोई छोटी। लेकिन नकल का चलन समाज-व्यवस्था-साहित्य-राजनीति में बना हुआ है। और हमेशा बना रहेगा।
इस मामले में मुझे भैंस की भूमिका मस्त लगती है। न वो किसी की नकल करती है न अपनी अकल पर इतराती है। सुकून के साथ अपना काम करती रहती है। उसे जित्ता दूध देना है, उत्ता ही देगी। ज्यादा हू-हुज्जत की तो सींग से जवाब देना भी जानती है। जानवरों में सबसे श्रेष्ठ कोई अगर मुझे लगता है तो वो भैंस ही है। अगर मौका मिला तो मैं ‘भैंस पर पीएचडी’ जरूर करना चाहूंगा।
भैंस में कथित अकलमंदों की तरह सियानापन नहीं होता। अकलमंद तो इत्ती सी बात को भी राई का पहाड़ बना देते हैं। देखिए, नए बिहार के एक स्कूल में करवाई जा रही नकल पर आजकल कित्ते आग-बबूला हो रक्खे हैं। पानी पी-पीकर नकल और नकल करवाने वालों को कोस रहे हैं। मानो, अकलमंदों ने अपने जीवन में कभी नकल की ही न हो जैसे! मानो, सारी पढ़ाई उन्होंने अपनी अकल की जमीन पर खड़े होकर ही की हो!
होता है, होता है... जिस किसी को नकल का शौक होता है। उसे अपनी अकल से ज्यादा नकल पर विश्वास होता है। तो इसमें हर्ज ही क्या है प्यारे? जिन्हें एग्जाम अपनी अकल से देने हों, वे अकल से दें और जिन्हें नकल से देने हो नकल से दें। फिर इत्ती हाय-तौबा क्यों? भैंस और नकलमंद हमारे देश की ‘अमूल्य धरोहर’ हैं, इन्हें सहेजकर रखें। नहीं तो एक दिन हमें इनके लिए भी ‘गौरैया’ की तरह ही रोना पड़ेगा।
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