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व्यंग: श्री उल्लू जी से साक्षात्कार

पिछली रात एक उल्लू महोद्य से भेंट करने की मंगल बेला मिल गई तो मेरी तबियत ए टू जेड खिल गई।

व्यंग: श्री उल्लू जी से साक्षात्कार
मेरी पूजा-अर्चना की जाती है मगर दूसरी ओर मुझे बर्बादी का प्रबल सिग्नल कहना हास्यास्पद भी है और निंदास्पद भी है। मां लक्ष्मी का वाहन कभी भी अशुभ भला कैसे हो सकता है। यदि मैं अपशकुन का कारक होता तो लक्ष्मी मैया मुझे अपना प्रिय वाहन क्यों बनातीं। मैं ऐसे अंधविश्वासियों की अकल एवं औकात की बात नहीं करना चाहता।
एक रात मुझे पिछले जन्मों के पुण्य प्रताप से अपने आप एक उल्लू महोद्य से भेंट करने की मंगल बेला मिल गई तो मेरी तबियत ए टू जेड खिल गई। अंधे के हाथ बटेर होना घूरे के पास सोना होना है। उस सुसंयोग को मैंने बिना अलसेट फुल सेलिबे्रट किया। किसी सुनसान खंडहर की छाती पर लक्ष्मी जी के वाहन श्री उल्लू जी मूक मुद्रा में संत श्रीमान की तरह विराजमान थे। मैंने अपनी रीढ़ को धनुष बनाकर और सिर को कमर तक झुकाकर दोनों हाथ जोड़कर व घुटने मोड़कर उन्हें मन से नमन किया।
मैं फिर इसके तुरंत बाद भरपूर प्रसन्नता व अमित आभार सहित नमित होकर प्रार्थना करने लगा, ‘हे उल्लू महाराज, आपकी महिमा अपार है। आज मैं आपके प्रार्थी और दर्शनार्थी का पूरा समानार्थी हूं। आपसे वार्ता करने हेतु मेरा जी, दीए की लौ के समान मचल रहा है। कृपया मुझे कुछ और चैतन्य और धन्य करने की महती कृपा करें।’
अब क्या था। मेरे मंतव्य और गंतव्य को भांपते हुए उन्होंने अपनी गर्दन मटकाकर हरी झंडी दिखा दी तो मैं पोर-पोर पुलकित हो गया। उनके पंखों में हुई फुरफुरी से मेरा रोमांचित होना स्वाभाविक था। इंटरव्यू-ब्रांड भेंटवार्ता की झलक प्रस्तुत है-
आप धन की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी जी के वाहन, किसानों के मित्र, दिवाली में पूज्य और रात के राजा माने जाते हैं। इतने इष्ट एवं विशिष्ट होकर भी आपको अनिष्ट क्यों माना जाता है?
यह सरासर सच है कि इस तरह की अजीब मान्यताएं, धारणाएं और प्रथाएं अंधविश्वास की ठीक प्रतीक हैं। मेरी पूजा-अर्चना की जाती है मगर दूसरी ओर मुझे बर्बादी का प्रबल सिग्नल कहना हास्यास्पद भी है और निंदास्पद भी है। मनुष्य के इस दोहरे आचरण का मैं अनावरण करता हूं। मां लक्ष्मी का वाहन कभी भी अशुभ भला कैसे हो सकता है। यदि मैं अपशकुन का कारक होता तो लक्ष्मी मैया मुझे अपना प्रिय वाहन क्यों बनातीं। मैं उन अंधविश्वासियों की अकल एवं औकात की बात नहीं करना चाहता। मैंने शॉर्ट और स्मार्ट शैली में अपने मन की बात कह दी।
यह दुखद आश्चर्य है कि ढेर सारे गुणों से लैस होने के बाद भी आज भी आप मूर्खता अर्थात बुद्धिहीनता के पर्याय माने जाते हैं। क्या ऐसी घनघोर विसंगति भोगकर आपका गुस्सा फूटने पर उतारू नहीं होता हैं?
मान्यवर, जो रूढ़िवादी प्रचलन का प्रतिफल भोगकर भी नहीं सुधरते हैं, उनकी मति पर मुझे अति तरस आता है। वे अपने आपको सर्वश्रेष्ठ प्राणी कैसे कह सकते हैं, जिनके पास कॉमनसेंस तक नहीं है। जो लोग मुझमें मूर्खता के दर्शन करते हैं, उनका मैं आईना हूं। संत कवि श्री तुलसीदास जी कह गए हैं, ‘जाकी रही भावना जैसी।’ ज्ञानी और विज्ञानी मुझे समझदार, शांत, शालीन, दूरदृष्टा, सहनशील, चौकस, परोपकारी और गडेÞ धन आदि का संके त या संदेश देने वाला कहकर मेरा चंदन, वंदन, अभिनंदन से आराधन करते हैं।
विज्ञान के युग में चमत्कार को नमस्कार है। प्रमाण और तर्क-वितर्क के आधार पर खरे उतरने पर ही मान्यता की मुहर लगाई जाती है। बुद्धि कौशल की दुनिया में इस समय भी ‘उल्लू बनाना, उल्लू सीधा करना, उल्लू का पट्ठा’ जैसी सूक्तियों से क्या आप अपमानित नहीं होते हैं?
विज्ञान के सत्य और प्रमाण के पक्षधर ऐसे समय में भी रूढ़िवादी होना ‘नदी किनारे घोंघा प्यासा’ का उदाहरण है। आदमी को आदमी बनाने की सोच के बदले उसे उल्लू बनाना कितनी लज्जा की बात है। उल्लू के बच्चे उल्लू होते हैं पर आदमी के बच्चे अगर उल्लू हों तो प्रकृति के विरुद्ध यह विकृति है।
आपको मनुष्य की मृत्यु का पूर्वाभास हो जाता है। किसी भी मकान के छप्पर, छत पर या आस-पास आपको बोलना किसी के लिए खतरे की घंटी है। इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
रात में कर्कश आवाज में मेरा बोलना खतरे की घंटी हो या घंटा, मुझे जरा भी परवाह नहीं है। मेरे बोल से कोई भय से टें बोल जाए तो मैं क्या करूं। लोग कहते हैं कि जो कुछ भी होता है वह लिखे-बदे के अनुसार ही होता है। दूसरी तरफ मुझे नाहक दोषी ठहराते हैं। भ्रम और भय से रस्सी भी सांप है। मुझे अपशकुनी मानने के पीछे भ्रांति का ही रोल रहता है। ‘हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्तां क्या होगा’ यह भ्रामक है। इसका कारण पुराणों में वर्णित लक्ष्मी-सरस्वती का आपसी मतभेद भी हो सकता है। मुझ जैसे एकांतप्रिय को मूर्ख और मनहूस कहना गंदी बात है। फिर भी मैं अविचलित हूं।
यह मान्यता प्रचलित है कि आपको दिन में दिखाई नहीं देता है। केवल रात में विचरण करने के कारण आपको निशाचरी प्रवृत्ति का कहा जाता है। यह कितना सच है?
माई डियर। अगर इस बात को सही मान लिया जाए तो भी मैं उनसे अच्छा हूं जिन्हें धनांधता के चलते न दिन में दिखाई देता है और न रात में दिखाई देता है।
कुछ जानकार कहते है कि आपको दिन में भी दिखता है। यदि ऐसा है तो फिर आप रात में ही क्यों विचरते हैं?
मुझे दिन में भी दिखता है यह सच है लेकिन मेरे भोजन चूहा, गिलहरी, मेंढक दिन के उजाले में उपलब्ध नहीं हो पाते इसलिए मैं रात में ही उड़ता फिरता हूं। इस जीवन शैली से मैं संतुष्ट हूं। दूसरी बात यह कि रात की नीरवता में डिस्टरबैंस की संभावना नहीं रहती है। आप लोग मॉर्निंग वॉक करते हैं और मैं नाइट वाक करता हूं।
जोगी से लेकर भोगी तक आपको तंत्र, मंत्र की शक्ति तथा सिद्धि के लिए उपयोगी मानते हैं। आप बहुत सद्गुणी, परोपकारी, र्धर्यधारी, भाग्योदय का कारक, कष्ट निवारक व पूज्य माने जाते हैं। फिर भी अधिकांश लोग आपको त्याज्य मानकर हिकारत की नजर से क्यों देखते हैं? शुभ, अशुभ के दो वाटों के बीच आपको कैसा लगता है?
देखिए, भाई साहब। मैंने पहले ही कह दिया है, ‘जाकी रही भावना जैसी।’ मैं झूठ मूठ से गुरेज और परहेज रखता हूं। क्या अशुभ, बुद्धिहीन और त्याज्य होकर मैं लक्ष्मीदेवी का अविभाज्य अंग बन सकता था? दीपावली के पावन पर्व पर ऐश्वर्या के वाहन का भी आवाहन क्यों किया जाता है? आदमी के बारे में यह भी कहा जाता है कि वह जिस पत्तल में खाता है, उसी में छेद करता है। इस प्रवृत्ति से निवृत्ति संभव नहीं है।
बहुत से लोग आपको देखते ही पथराव शुरू कर देते हैं। कंकर-पत्थर की मार भी आपके सामने बेकार रहती है। इतनी सहनशीलता क्यों?
आप आपने लोगों के बारे में डिस्कस जस का तस जारी मत रखिए। मैं पूर्व में ही बिना कष्ट के यह स्पष्ट कर चुका हूं कि दोरंगी रीति-नीति का जमाना है। लोग फूल भी बरसाते हैं, पत्थर भी बरसाते हैं। मैं तो यह मानता हूं कि जो जैसा रहता है, वही रहता है। ज्ञानी, ध्यानी भी यही कहते हैं। कृतज्ञ और कृतघ्न में बड़ा अंतर है।
हे उलूक महोदय, आप नाना प्रकार के लांछन ओर व्यंग्य सुनकर गुस्सा क्यों नहीं होते हैं?
प्रियवर एवं मान्यवर जी, मैं इस कहावत को यथावत जी रहा हूं, ‘क्षमा बड़न को चाहिए।’
कभी आपने अपनी सूरत पर गौर किया है?
मुझे भी यह पता है कि भगवान सबको सब कुछ नहीं देता है। आखिर चंद्रमा में भी तो धब्बा है लेकिन वे उसे अपने तक सीमित रखकर दुनिया को असीमित चांदनी प्रदान करता रहता है। मैं भी अपनी सूरत को अपने तक समेटे रहता हूं और सीरत को ज्यादा अहमियत देता हूं।
आप इस समय फुल फॉर्म पर हैं, इसलिए यह भी पूछ रहा हूं कि लक्ष्मी जब भी आती हैं तो छप्पर फाड़ कर आती हैं, क्या यह सच है?
हां यह सच है लेकिन यह भी सच है कि जब लक्ष्मी जाती हैं तो बड़े -बड़े कलेजे वाले भी आह कर उठते हैं।
आप शक्ल से फ्लॉप हैं मगर अक्ल में टॉप हैं। आपसे सभी डरते हैं और आप...?
मैं किसी से भी नहीं डरता हूं बरखुर्दार।
अपनी बदनामी पर आपकी प्रतिक्रिया?
असलियत में धर्मग्रंथों ने भी मेरा गुणवान या बखान किया है। धन को तरसते हुए ईर्ष्यालु बुद्धिजीवियों ने ही मुझ पर बहुत कलंक थोपे हैं। अंधविश्वासी भी पीछे नहीं रहे। सत्य में हजार हाथियों का बल होता है इसीलिए मैं ताल ठोंककर यह कहता हूं, ‘सबसे कहता सरेआम है उल्लू, बद नहीं बदनाम है उल्लू।’
हे शक्तिमान, बुद्धिमान, श्रीमान जी। इस अंतरंग साक्षात्कार के लिए मैं आपका भारी आभारी हूं। चलते चलते क्या आप कुछ और कहना चाहेंगे?
थैंक्यू। दीपावली की ढेर सारी शुभकामनाएं!
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