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अंशुमाली रस्तोगी का व्यंग्य : आप बस योग करते रहिए

अक्सर मैंने देखा है, जब भी मैं योग करने बैठता हूं, मेरे आजू-बाजू के प्रगतिशील मुझे हिकारत भरी निगाह से देखते हैं!

अंशुमाली रस्तोगी का व्यंग्य : आप बस योग करते रहिए
सोच रहा हूं, या तो योग करना बंद कर दूं या फिर मोहल्ला ही छोड़ दूं। दरअसल, अपने मोहल्ले में एक अकेला मैं ही गैर-प्रगतिशील व गैर-पंथी हूं। बाकी मोहल्ले में एक से बढ़कर एक प्रगतिशील और पंथी मौजूद हैं। चूंकि वे प्रगतिशील भी हैं व पंथी भी इसलिए वे योग न कर केवल मॉर्निंग वॉक पर जाया करते हैं। योग उनके तईं हिंदुत्ववादी और मॉर्निंग वॉक धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक है।
अक्सर मैंने देखा है, जब भी मैं योग करने बैठता हूं, मेरे आजू-बाजू के प्रगतिशील मुझे हिकारत भरी निगाह से देखते हैं! योग कर न जाने मैं ऐसा कौन-सा पाप कर रहा होता हूं, जो उनकी निगाह में सांप्रदायिक किस्म का है। सूर्य नमस्कार से उन्हें चिढ़ है, लेकिन सूर्य से बहुत प्यार। सूर्य पर क्रांतिकारी किस्म की कविताएं भी लिखी हैं उन्होंने। उनकी निगाह में केवल वही ठीक है, जो वे करते या कर रहे हैं, लेकिन वही काम अगर कोई दूसरा करे तो तुरंत पिछड़ा या गैर-प्रगतिशील घोषित कर देते हैं।
इधर जब से योग दिवस मनाने पर विवाद बढ़ा है, प्रगतिशीलों की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। आजकल वे अखबारों-पत्रिकाओं में कम सोशल नेटवर्किंग पर अधिक सक्रिए हो गए हैं, इसके खिलाफ लिखने-बोलने में। तर्क भी ऐसे-ऐसे पेश कर रहे हैं, कभी-कभी तो मेरा माथा ही चकरा जाता है। एक-दो बार तो मैं बेहोश होते-होते बचा हूं।उनके अनुसार योग से कोई खास फायदा नहीं होता। योग केवल एक धर्म विशेष की विशेषताओं को आगे बढ़ाने का काम करता है।
बहुत से ऐसे प्रगतिशील हैं, जो योग इसलिए नहीं करते, कहीं उन्हें धर्म विशेष का पिछलग्गू न मान-समझ लिया जाए। यों भी, प्रगतिशीलों में ऐंठ गजब की होती है। पूरी रस्सी जल जाने के बाद भी।इत्ते साल मुझे योग करते हो गए, लेकिन एक बार भी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि मैं किसी धर्म या जाति विशेष का कोई काम कर रहा हूं। योग मेरे लिए महज खुद को स्वस्थ रखने की एक सार्थक प्रक्रिया है। जिसे करने में मुझे शांति और स्फूर्ति का अहसास होता है। मगर योग कब में सांप्रदायिक हो गया, ये मुझे आज तलक समझ नहीं आया।
योग पर प्रगतिशीलों द्वारा इत्ती आपत्तियां रखने का कारण कहीं उनका हर समय खाली रहना तो नहीं? जब से सत्ता परिवर्तन हुआ है, प्रगतिशीलों की बेचैनियां इस कदर बढ़ गई हैं, बिचारे दिन-रात मोदी-हिंदू-हिंदुत्व-बाबा का ही नाम जपते रहते हैं। अपने लिखे पुराने-धुराने लेखों के हवाले देते रहते हैं कि देखो हमाने हिंदू-हिंदुत्व के खिलाफ कित्ता-कित्ता लिखा है, लेकिन उससे क्या होता है पियारे।
समय के साथ जो नहीं बदलता, उसे एक न एक दिन हाशिए पर जाना ही होता है। आजकल ठीक ऐसी ही स्थिति में प्रगतिशील हैं। खाली हैं। खास काम कोई पास है नहीं तो चलो योग के बहाने की अपनी घिसी-पिटी प्रगतिशीलता जनता को दिखला दी जाए।
योग के भीतर जाति-धर्म-संप्रदाय के सूत्र तलाशना वाकई दुखद है। योग पर अगर विश्वास करते हैं तो करें। नहीं करते हैं न करें। किसी बाबा या नेता ने जोर देकर कोई थोड़े न कहा है कि अगर हिंदुस्तान में रहना है तो योग करना ही पड़ेगा।
आपकी र्मजी। मेरे योग करने को लेकर मेरे पड़ोसी प्रगतिशील मेरे प्रति चाहे जो धारणाएं बना लें, मुझे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। मैं कल भी योग कर रहा था। आज भी कर रहा हूं। आगे भी करता रहूंगा। मेरे तईं योग जीवन का अहम हिस्सा है।
फिर भी, जिनको योग पर बमचक मचाने का शौक है, शौक से मचाएं। जिन्हें योग करना है, भला कौन-सा रुकने वाले हैं। वे तो अपने पूरे तन मन धन से योग का आनंद उठाते रहेंगे।
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