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केवल घाटे का सौदा ही नहीं है स्माॅग, जानें इसके फायदे

एक समय की बात है कि एक राज्य में भारी स्माॅग यानी धुंध यानी जहरीला कोहरा पड़ने लगा। एक नेता ने कही, यह तो घणी साजिश है। मैं इसके खिलाफ लड़ूंगा। पब्लिक ने कही-कैसे लड़ोगे भइया, तुम यह तो बताओ लड़ोगे कैसे। अभी तक तो इससे कारण का ही पता नहीं है, यह भी जानकारी नहीं है कि इसे लाया कौन है।

केवल घाटे का सौदा ही नहीं है स्माॅग, जानें इसके फायदे
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एक समय की बात है कि एक राज्य में भारी स्माॅग यानी धुंध यानी जहरीला कोहरा पड़ने लगा। एक नेता ने कही, यह तो घणी साजिश है। मैं इसके खिलाफ लड़ूंगा। पब्लिक ने कही-कैसे लड़ोगे भइया, तुम यह तो बताओ लड़ोगे कैसे। अभी तक तो इससे कारण का ही पता नहीं है, यह भी जानकारी नहीं है कि इसे लाया कौन है।

नेता स्पीचा, यह स्माग हमारा दुश्मन है। हमारे बच्चों का दुश्मन है। इसे हटाकर मानेंगे, हटा ही देंगे। मैं सत्ता में आते ही स्मागपाल नियुक्त करुंगा। स्मागपाल के आते ही स्माग खत्म हो लेगा। आप तो बस मुझे जितवा दो जी। जीत के बाद मेरा पहला आदेश स्मागपाल नियुक्त करना होगा, जैसे ही उसकी नियुक्ति होगी स्मॉग खुद बा खुद ही खत्म हो जाएगा।

पब्लिक बहुत परेशान थी स्माॅग से, नेता को जितवा दिया। नेता अब विदेश में रहता है। उनने अपने दफ्तर में भारी विराट एयर प्यूरीफायर लगवा लिया है। पब्लिक उससे मिलने जाती है, तो भाई मिलता ही नहीं है। घर के दरवाजे से ही दरबान कोई न कोई बहाना बनाकर लोगों को बैरंग लौट देता है। इस तरह से स्माॅग बहुत ही पाजिटिव साबित हुआ नेता के लिए। जैसे नेता को सुखी किया स्माॅग ने, वैसे ही सबको सुखी बनाये स्माग।

पर, पर, पर जो नेता नहीं हैं, वो क्या करें। तो वो भी नेता बन जाए। नेता बनने की मनाही थोड़े ही है। थोड़े दिनों में पानी जहरीला हो जाएगा तब वाटर स्माग पर नेतागिरी कर लें। वो नेतागिरी और भी जल्दी चमकेगी।

शिक्षा-इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि नेता हर हाल में मजे में रहता है।

स्माॅग कथा नंबर दो- स्विटजरलैंड में एनजीओ

उसी वक्त शहर में एनजीओ वाला था। उनने कुत्ता संरक्षण, आतंकी संरक्षण, मानवाधिकार आदि आदि विषयों पर एनजीओ चलाकर बहुत मोटी रकम खड़ी कर ली थी। पर वह और भी ज्यादा मोटी रकम खड़ी करना चाहता था। स्माॅग, जहरीला धुआं-यह विषय अभी खाया जाना बाकी था।

एनजीओ वाले ने भीषण फोटुएं लगा दीं अपनी वेबसाइट पर स्माॅग में बच्चे दम तोड़ते हुए, स्माॅग में मजदूर पछाड़ खाकर गिरते हुए। ऐसी बारी करुणा पैदा हुई फोटुओं को देखकर कि करोड़ों डाॅलर का चंदा एनजीओ वाले के खाते में आ गिरा। एनजीओ वाला टीवी चैनलों पर भी ध्यान देने लगा कि स्माॅग का इलाज यह है कि उसके एनजीओ को इतना चंदा दिया जाए।

मोटा चंदा खाया एनजीओ वाले ने, इतना कमाया कि उसने अपने बच्चों को दिल्ली आबोहवा से बचाकर स्विटजरलैंड के स्कूलों में एडमिट करा दिया। खुद एनजीओ वाला आठ महीने स्विटजरलैंड में गुजारने लगा। इस तरह से स्माग एनजीओ वाले को खूब फला।

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि स्माॅग हर किसी को नुकसान ना पहुंचाता, एनजीओ वाले को तो खूब फलता है स्माॅग। तो हम सबको एनजीओ वाला बन जाना चाहिए।

पर, पर जो एनजीओ वाले नहीं हैं, वो क्या करें।

अरे जो एनजीओ वाले नहीं हैं, तो बन जाएं एनजीओ वाले। संविधान ने नागिन वाले सीरियलों और एनजीओ पर कोई पाबंदी नहीं लगाई है।

स्माॅग कथा तीन- आम आदमी होने की आफत

एक्सपर्ट लोगों ने समझाइश्ा दी कि प्रदूषण स्मॉग से बचना हो, तो घर से ही ना निकलो। ओके जी पर घर से निकलने के लिए एक घर का होना जरुरी होता है। जिसके पास घर ही ना हो, वह कहां से निकले और कहां जायेगा, एक्सपर्ट लोग मोटी-मोटी बात कह देते हैं, उनका पालन कैसे होगा, यह देखना उनका जिम्मा नहीं है। तो एक आम आदमी था, वह खास आदमी की कोठी के सामने रहता था।

खास आदमी की कोठी में बिजली न आने की वजह से जनरेटर चलता था। आम आदमी का बच्चा दिन भर खुले में खेलता था, दिन भर जनरेटर का धुआं और स्माॅग खाता था, फेफड़े बहुत मजबूत हो गए। खास आदमी का बच्चा एक दिन घर से बाहर बिना एयरकंडीशन कार के निकला, तो उसका तो खांसते खांसते बुरा हाल हो गया, बच्चे को अस्पताल में भरती कराना पड़ा। खास आदमी ने आम से पूछा, तेरा बच्चा तो एकदम तंदुरुस्त है, ऐसे धूल धक्कड़ में। कैसे। आम ने कहा-इसके लिए गरीब होना पड़ता है।

स्माॅग ने अमीर को भी चक्कर में डाल दिया है कि अब आम आदमी वाले फेफड़े वह कहां से लाए। अगर बच्चे को घर से बाहर निकाले तो स्मॉग खाने को आता है अगर उसे घर में ही रखे तो वह कभी भी बाहर निकल ही नहीं पाता है।

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