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चुनाव में सपा की कमजोरी बन सकता है पारिवारिक दंगल

दोनों के सर्मथकों में भिड़ंत के बाद यह मानना कठिन है कि मुलायम के हस्तक्षेप से सब ठीक हो जाएगा।

चुनाव में सपा की कमजोरी बन सकता है पारिवारिक दंगल
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इस समय भले किसी तरह सपा के अंदर के संघर्ष को शांत कर दिया जाए, लेकिन जिन कारणों से यह इतने बड़े बवंडर में बदला उसे देखते हुए मानना कठिन है कि शांति स्थायी हो सकती है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव एवं शिवपाल सिंह दोनों कह रहे है कि नेता जी जो कहेंगे करुंगा। नेताजी पूरा भाषण देकर अखिलेश यादव को कहते हैं कि शिवपाल के गले मिलो।
वे गले मिलने की बजाय पैर छूते हुए कह देते हैं कि आप मेरे खिलाफ साजिश करते हैं, साजिश करना बंद कर दीजिए। तो यह कौन सा मिलन हुआ? उसके बाद जो हुआ वह दृश्य पूरे देश ने देखा। इससे समझा जा सकता है कि इनमें दूरियां कितनी बढ़ी हुईं हैं। दोनों के सर्मथकों में भिड़ंत के बाद यह मानना कठिन है कि मुलायम के हस्तक्षेप से सब ठीक हो जाएगा।
यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि अगर सपा में विभाजन नहीं हुआ है तो उसका कारण केवल मुलायम सिंह हैं। अखिलेश नहीं चाहते उन पर पिता के खिलाफ विद्रोह कर पार्टी तोड़ने का तोहमत लगे। अगर मुलायम सिंह इस समय सक्रिय रहने की स्थिति में नहीं होते तो वे ऐसा कर चुके होते। हालांकि जो सूचना है उन्होंने एक समय अलग होकर चुनाव लड़ने का मन बना लिया था। इस समय पार्टी में अखिलेश के सर्मथकों की संख्या सबसे ज्यादा है जो शक्ति प्रदर्शन के दौरान दिखा भी।
मुलायम सिंह द्वारा विधायकों, सांसदों, पूर्व विधायकों की बैठक के एक दिन पहले अपने आवास पर बैठक बुलाना प्रकारांतर से उनका शक्ति प्रदर्शन ही था। उसमें जितनी संख्या में विधायक एवं नेता पहुंचे उससे शिवपाल के सामने भी तस्वीर साफ हो गई होगी। शिवपाल ने पार्टी के लिए जितना काम किया हो, लेकिन इस समय उनकी ताकत केवल मुलायम सिंह हैं। अगर मुलायम सिंह हट जाएं तो अखिलेश की तुलना में शिवपाल को पूछने वालों की संख्या गिनी-चुनी होगी। इसके कारण दो ही हैं।
अखिलेश के हाथों में सत्ता है और सत्ता के साथ ज्यादा लोग रहते हैं। दूसरा, वे मुलायम सिंह के पुत्र हैं और उन्होंने 2012 में स्वयं ही उनको मुख्यमंत्री तथा बाद में प्रदेश अध्यक्ष बनाकर अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। अखिलेश ने अपने स्वभाव से भी सबका दिल जीता है और वह भी एक कारण हो सकता है। हालांकि नेताओं-कार्यकर्ताओं के लिए शिवपाल कहीं ज्यादा उपलब्ध रहते हैं, पर उनके साथ ये दो बातें नहीं है।
इस समय सपा में मुलायम सिंह के बाद अखिलेश सर्वाधिक स्वीकृत नेता है, किंतु उनको लगता है कि इस समय हमने पार्टी तोड़ी तो लोग यह कह सकते हैं जो अपने बाप का नहीं हुआ वह लोगों का क्या होगा। जाहिर है, सपा एक पार्टी के रूप में केवल मुलायम सिंह के रहते ही जीवित है। मुलायम सिंह ने शिवपाल बनाम अखिलेश की लड़ाई के अंत की जो कोशिशें की उससे समाधान की बजाय संकट ज्यादा बढ़ा।
जो व्यक्ति यह कह रहा हो कि अमर सिंह के साथ जो होगा हम उसे नहीं छोड़ेंगे क्या वह पिता के यह कहने भर से बदल जाएगा कि अमर सिंह मेरे छोटे भाई हैं? प्रश्न है कि अखिलेश को इस सीमा तक क्यों जाना पड़ा? कुछ तो इसके व्यावहारिक कारण हैं। मसलन, मुख्यमंत्री और पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष होते हुए भी सरकार एवं पार्टी दोनों जगह उनकी पूर्ण अथॉरिटी कभी कायम नहीं हुई। कुछ दूसरे मंत्री भी मुलायम सिंह का आदमी स्वयं को मानते रहे। अखिलेश के इस तेवर का कारण है कि वो सपा की कार्य और व्यवहार संस्कृति को बदलना चाहते हैं।
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