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एडवोकेट रघुबीर सिंह दहिया का लेख: अद्वितीय महान क्रांतिकारी बेजोड साहसी शहीद उधम सिंह को नमन

ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को गांव सुनाम जिला संगरूर रियासत पटियाल पंजाब में हुआ। उनके पिताजी का नाम सरदार टहल सिंह और मां का नाम श्रीमती हरनाम कौर था। 1901 में असहनीय पेट दर्द से मां की मृत्यु हो गई और उस समय ऊधम सिंह की उम्र केवल दो साल थी। ऊधम सिंह के बडे भाई साधु सिंह की आयु सात साल थी।

एडवोकेट रघुबीर सिंह दहिया का लेख: अद्वितीय महान क्रांतिकारी बेजोड साहसी शहीद उधम सिंह को नमन
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प्रथम विश्वयुद्ध 1914 से 1918 के बाद युद्ध का भार लादने के लिए आम जनता को शोषण के शिकंजे में कसने की नीयत से अंग्रेज सरकार ने दमन व उत्पीडन का रास्ता चुना। 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग अमृतसर पंजाब में लगभग 20 हजार लोग इक्ट्ठा हुए, जिसमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। तनाव को देखते हुए पंजाब के गर्वनर माइकल ओडवायर ने शहर का प्रशासन जिला मजिस्ट्रेट से लेकर अस्थायी ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर को सौंप दिया। उस निर्दयी ने बिना चेतावनी दिए ही सैनिकों को गोलियां चलाने का आदेश दे दिया।

10 मिनट तक 1650 राउंड गोलियां चलाकर हजार से अधिक बेगुनाहों को मार डाला गया और तीन हजार से अधिक घायल हुए। मानव संहार का इतना विस्तृत और विकराल रूप पहले कभी इतिहास में शायद ही दर्ज हुआ हो। विकास के पहिए मरणासन पूंजीवाद के निर्मम शोषण के बोझ से घिस गए। दमन करने वाला दहशतगर्द कितना भी क्रूर हो, प्रतिशाेध की लपटें उसे जलाकर राख कर देती हैं। ऊधम सिंह जलियांवाला बाग हत्याकांड का प्रत्यक्षदर्शी चश्मदीद गवाह था। जब डॉक्टर सैफुद्दीन किचलू जेल से किए गए तो ऊधन सिंह उनसे मिलने उनके घर गए थे और उनके सामने जलियांवाला बाग की क्रूरता का बदला लेने की इच्छा जाहिर की तो डॉ. किचलू ने उनकी प्रशंसा की प्रोत्साहित किया। राम मोहम्मद सिंह आजाद ने अपने शिकार माइकल ओड्वायर को 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्कटन हॉल में गोलियों से भूनकर मौत के घाट उतार दिया।

ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को गांव सुनाम जिला संगरूर रियासत पटियाल पंजाब में हुआ। उनके पिताजी का नाम सरदार टहल सिंह और मां का नाम श्रीमती हरनाम कौर था। 1901 में असहनीय पेट दर्द से मां की मृत्यु हो गई और उस समय ऊधम सिंह की उम्र केवल दो साल थी। ऊधम सिंह के बडे भाई साधु सिंह की आयु सात साल थी।सरदार धन्ना सिंह ओवरसियर ने अपने रिश्तेदार सरदार चंचल सिंह सुनामी की सिफारिश से टहल सिंह को रेलवे फाटक पर गेटमैन की नौकरी पर लगवा दिया। एक दिन वह बकरियां चराने फाटक से थोडी दूर चला गया तो एक भेडिया ऊधम सिंह को अकेला देखकर उसे उठाने के लिए आगे बढा। ऊधम सिंह ने भी तत्काल कदम उठाते हुए कुल्हाडी से भेडिए पर हमला बोल दिया। बडा भाई साधु सिंह भी भाई की मदद के लिए आगे बढा। दोनों बच्चों को खतरे में देखकर टहल सिंह भी उस और दौडे और भेडिए को ललकारा तो वह भाग निकला। दोनों बच्चों पर जंगली जानवरों का खतरा देखकर टहल सिंह ने वो नौकरी छोड दी और मजदूरी की तलाश में दोनों बच्चों को साथ लेकर अमृतसर की ओर चल पडे।

बीच रास्ते में ही टहल सिंह बीमार हो गए और किसी तरह अमृतसर पहुंचे लेकिन तबीयत और ज्यादा खराब होती चली गई। वह रामबाग के मैदान में लेट गए और दोनों बच्चे उनके सिर व पैर दबाने लगे। वहां मैदान में अनेक संत महात्मा भी रूके हुए थे। एक संन्यासी ने दोनों उदास बच्चों को देखकर टहल सिंह बातचीत की। टहल सिंह ने महात्मा से कहा कि वो बहुत बीमार है और बचने की भी कोई उम्मीद दिखाई नहीं दे रही है इसलिए उसके मरने के बाद वो इन दोनों बच्चों की परवरिश करें। संन्यासी ने भी टहल सिंह को वचन दिया। टहल सिंह को अमृतसर के सरकारी अस्पताल में दाखिल करवाकर संन्यासी दोनों बच्चों को अपने डेरे पर ले गया। ऊधम सिंह के पिता टहल सिंह की उसी रात को मौत हो गई और अस्पताल के कर्मचारियों ने उसे लावारिश समझकर दाह संस्कार किया।

कुछ दिन बाद सरदार धन्ना सिंह के रिश्तेदार चंचल सिंह सुनामी ने सरदार टहल सिंह के दोनों बच्चों को संन्यासी के डेरे पर देखा तो वह दोनों बच्चों को अपने घर ले आया। इसके बाद चंचल सिंह को जरूरी काम से बर्मा जाना पडा तो 1906 में वह दोनों भाइयों का दाखिला उसने अमृतसर के रामबाग पुतलीघर सैंट्रल खालसा अनाथालय में करवा दिया। ऊधम सिंह ने 1916 में दसवीं की परीक्षा पास की और उनका अंग्रेजी, उर्दू, पंजाबी तथा हिंदी पर समान अधिकार था। अनाथ आश्रम में नए नए अनुभव होने लगे और कुछ समय बाद 1917 में ऊधम सिंह के बडे भाई साधु सिंह की भी निमोनिया से मौत हो गई।

आजीविका चलाने के लिए ऊधम सिंह ने फर्नीचर का काम सीखा और कार ड्राइविंग भी सीख ली। प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त होते ही अंग्रेज सरकार ने रौलेट एक्ट के बहाने देश की जनता पर दमन का शिकंजा कसना शुरू कर दिया ताकि लोगों के दिमाग में सरकार की दहशत बनी रहे। नहरी पानी पर लगाए गए अतिरिक्त करों से पंजाब के किसानों में सरकार के खिलाफ रोष बढ रहा था। पंजाब में आजादी के लिए गुप्त गतिविधियां जोरों पर थी। रौलेट एक्ट में शक के आधार पर किसी को भी गिरफ्तार कर बिना आरोप के दो वर्ष तक जेल में रखा जा सकता था और उसके खिलाफ अपील का भी अधिकार नहीं था। देश की जनता ने उस कानून को मानने से इंकार कर दिया और पूरे देश में उस काले कानून के खिलाफ जन आंदोलन शुरू हो गया। उस वातावरण ने ऊधम सिंह को क्रांतिकारी राजनीति को आगे बढाने के लिए प्रेरित किया ताकि ताकत से गुलाम देश की आजादी का मार्ग खुले।

दस अप्रैल 1919 को डॉ सैफुद्दीन किचलू और डॉ सतपाल को गिरफ्तार कर धर्मशाला जेल में डाल दिया गया। 13 अप्रैल 1919 को बैशाखी के दिन जलियांवाला बाग में शांतिपूर्वक सभा चल रही थी। बीस हजार से ज्यादा लोग शामिल होकर अपनी आवाज उठा रहे थे। उस सभा में डॉ सतपाल और डॉ सैफुद्दीन किचलू की रिहाई की मांग उठी तभी सेना के अधिकारी ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर ने हथियारबंद सैनिकों को साथ ले बाग को घेर लिया और बिना चेतावनी के ही गोलियां चलाने का आदेश दे दिया। सैनिकों ने निहत्थे लोगों पर 1650 राउंड गोलियाें की बौछार की और इसमें एक हजार से ज्यादा बेगुनाह लोगों की हत्या की गई। शहीदों में बच्चे और महिलाएं भी शामिल थीं। तीन हजार बेकसूर लोग घायल भी हुए थे। चारों और लाशों के बीच घायलों की चीख पुकार सुनाई दे रही थी। लाशों से बहते खून और चीखों ने गुलाम देश की आजादी का रास्ता खोल दिया। ऊधम सिंह भी सभा में था और एक पेड पर चढकर पत्तों में छिपकर उसने यह सब अपनी आंखों से देखा। जलियांवाला बाग हत्याकांड का वह प्रत्यक्षदर्शी था।

ऊधम सिंह ने देखा कि एक साहसी महिला रोती हुई लाशों में से अपने पति की लाश पहचाकर उसे खींच रही थी। ऊधम सिंह ने उसकी मदद की तो महिला ने उसे अपना भाई कहा और इस तरह एक अनाम बहन से पवित्र रिश्ता बन गया। उस बहन का नाम रत्ना देवी था। सरदार ऊधम सिंह ने बहन रत्ना के सामने प्रतिज्ञा की कि वह जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए जिम्मेदार पंजाब के गर्वनर जनरल माइकल ओडवायर, ब्रिगेडियर जनरल डायर और सचिव जेटलैंड को गोलियों से भून देगा। गुजरांवाला में 14 अप्रैल 1919 को सरकार के खिलाफ उमडी भीड पर गोलियां चलाई औ जनता में डर पैदा करने के लिए गुजरावालां के कुछ गांवों में हवाई जहाज से बम भी गिराए। पंजाब में मार्शल ला लगा दिया गया और 18 बेकसूर लोगों को फांसी पर भी लटका दिया गया। जलियांवाला बाग हत्याकांड से आहत महात्मा गांधी ने अंग्रेज सरकार को शैतानों का शासन करार दिया। असहयोग आंदोलन जलियांवाला बाग हत्याकांड की नींव पर खडा हुआ था। गांधी जी को भी गिरफ्तार कर लिया गया क्योंकि वो पंजाब जाने वाले थे। ऊधम सिंह उस वक्त गुजरावाला में थे।

ऊधम सिंह एक लकडी के व्यापारी के साथ नवंबर 1919 में अफ्रीका चले गए लेकिन कुछ समय बाद वापस अमृतसर आकर अपनी बहन रत्ना से मिलकर अपने घर सुनाम में दोस्तों से मिलने आए। अक्टूबर 1921 में नैरोबी जाकर वर्कशाप में पूरी मेहनत से दिनरात काम किया। 1922 में लंदन और फिर न्यूयार्क चले गए। 1923 में ऊधम सिंह ने अमृतसर में राम मोहम्मद सिंह आजाद नाम से फर्नीचर की दुकान खोली। इसी दुकान पर ऊधम सिंह ने शेरे पंजाब लाला लाजपतराय किशन सिंह सरीखे कई क्रांतिकारियों से मिले और क्रांतिकारी साहित्य का मर्म नवयुवकों को गहराई से समझ में आने लगा। 1923 में सरदार ऊधम सिंह को लेकर सरदार भगत सिंह भी कानपुर चले गए।

1924 में ऊधम सिंह अमेरिका चले गए और गदर पार्टी के सक्रिय सदस्य बनकर क्रांतिकारी काम के प्रचार प्रसार में जुट गए। पार्टी साहित्य स्वयं पढते और दूसरों को भी पढने के लिए प्रेरित करते थे। उन्होंने आजाद पार्टी नाम से एक पार्टी भी बनाई और ये गदर पार्टी की शाखा थी। दिसंबर 1926 में भगतसिंह ने ऊधम सिंह को पत्र लिखकर भारत वापस आने का अनुरोध किया और ऊधम सिंह 1927 में मिस मैरी तथा चार विश्वासपात्र क्रांतिकारियों के साथ अमेरिका से लाहौर पहुंचे और भगतसिंह व दूसरे क्रांतिकारियों से मुलाकात की।

30 अगस्त 1927 को अवैध हथियार रखने के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और जज ने ऊधम सिंह को पांच वर्ष की कठोर कैद की सजा सुना दी। सजा को निरस्त करवाने के लिए ऊधम सिंह के पांच वर्ष की कठोर कारावास की सजा सुना दी गई। सजा को निरस्त करवाने के लिए ऊधम सिंह की बहन रत्ना देवी और मिस मैरी ने उच्च न्यायालय लाहौर में चुनौती दी। 23 सितंबर 1928 को अपील खारीज कर दी गई और ऊधम सिंह को लाहौर सैंट्रल जेल में भेज दिया गया। साढे चार साल बाद उन्हें मुल्तान जेल में भेज दिया गया। जिस दिन 23 मार्च 1931 को भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को जालिम और भयभीत अंग्रेज सरकार ने फांसी पर चढाया उस दिन ऊधम सिंह सैंट्रल जेल लाहौर में ही बंद थे। साथियों की फांसी से उन्हें गहरा आघात पहुंचा।

23 अक्टूबर 1931 को ऊधम सिंह मुल्तान जेल से रिहा होते ही हुसैनीवाला पहुंचे और भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव को सलाम कर अपनी जन्मभूमि सुनाम आ गए। गुप्तचर सीआईडी और पुलिस ऊधम सिंह का पीछा कर रही थी। ऐसी स्थिति में ऊधम सिंह ने फिर से लंदन जाना ही उचित समझा क्योंकि उसके शिकार भी लंदन में ही थे।

राम प्रसाद बिस्मिल, अश्फाक उल्ला खां, भगतसिंह और चंद्रशेखर आजाद की महान शहादतों को सीने में संजोकर ऊधमसिंह पासपोर्ट नंबर 52753 से जर्मनी फ्रांस के रास्ते से लंदन पहुंचे और गुरुद्वारे में रहने लगे। वहां उनका परिचय सरदार महीप सिंह, सरदार आजाद सिंह, सरदार शिव सिंह जोहल इत्यादी युवकों से हुआ। समाजवाद के महान आदर्श से प्रेरित वे 1936 में रूस गए और 42 दिन मास्को आदि शहरों में घूमते रहे और बोल्ल्शेविकों के संघर्ष की सराहना की। 1937 में माइकल ओडवायर ने ऊधम सिंह को अपनी बेटी मिस गोल्डी को कॉलेज ले जाने तथा वापस लाने के लिए कार चालक रख लिया। कुछ समय बाद मिस मैरी ने ऊधम सिंह को समझाया और दूरी बनाने की नसीहत दी। ऊधम सिंह ने ओडवायर की कार चालक की नौकरी छोड गुरुद्वारे की टैक्सी चलानी शुरू कर दी और बहन रत्ना के सामने की गई प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए आगे बढे।

ऊधम सिंह के एक शिकार ब्रिगेडियर जनरल डायर को उस नरसंहारा के बाद बैचनी रहने लगी और एक दिन लकवा मार गया और दिमाग की नसें फटने से 23 जुलाई 1927 को मौत हो गई। जलियांवाला बाग नरसंहार के बाद डायर ने अपने एक दोस्त को बताया था कि वह उस घटना के बाद रातों को कभी सो नहीं पाया है।

13 मार्च 1940 को दोपहर 12 बजे मिस मैरी और ऊधम सिंह लंदन के कैक्स्टन हॉल में गए और पहली पंक्ति से मंच की दूरी कदमों से नापकर सारे हाल का निरीक्षण किया। इसके बाद उन्होंने सारी योजना से मिस मैरी को अवगत करवाया। लगभग ढाई बजे महान क्रांतिकारी ऊधम सिंह लोडिड पिस्तौल से युक्त डिक्शनरी हाथ में लेकर मिस मैरी सहित कैक्स्टन हॉल में प्रवेश कर गए। योजना के अनुसार मिस मैरी गेट के अंतिम पंक्ति में बैठी और ऊधम सिंह मंच के पास पहली पंक्ति में बैठ गए। मंच से बोलते हुए माइकल ओडवायर ने अमृतसर के जलियांवाला बाग की घटना का विस्तार से वर्णन किया और कहा कि भारत के लोग बहुत कायर हैं। गोलियों के सामने भेडों की तरह जान बचाने के लिए भाग रहे थे।

अब तक केवल बैठकर सुन रहे ऊधम सिंह अब खडे होते हैं और सीधे दो गोलियां माइकल ओडवायर की छाती में माकर उन्हें दुनिया से चलता कर दिया। एक गोली जैटलेंड को लगी और वह कुर्सी के नीच छिप गया। खचाखच भरे हॉल में भगदड मच गई। लार्ड लैमिंग्टन का हाथ छलनी हो गया। ऊधम सिंह ने किसी निर्दोष पर गोली नहीं चलाई। पास खडी एक महिला ने उनका हाथ पकड लिया तो मिस मैरी ने उन्हें हाथ छुडाकर भागने को भी कहा लेकिन ऊधम सिंह नहीं भागने का इरादा करके ही ओडवायर को उसके अंजाम तक पहुंचाने आए थे। उन्होंने मिस मैरी को जरूर इशारे से वहां से निकल जाने को कह दिया। इस प्रकार ऊधम सिंह ने 21 साल अपने सीने में जलाकर रखी प्रतिशोध की आग को ओडवायर के खात्मे के साथ शांत कर लिया। ऊधम सिंह को लंदन पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस को अपना नाम राम मोहम्मत सिंह आजाद बताया और कहा कि मैंने 13 अप्रैल 1919 को अपनी बहन रत्ना देवी के सामने प्रतिज्ञा की थी कि मैं जलियांवाला बाग की घटना का बदला लूंगा। 21 साल बाद मेरी वह प्रतिज्ञा पूरी हुई है। उस बदले की भावना में युवकों को इंकलाब की गूंज सुनाई दे रही थी।

4 जून 1940 को ऊधम सिंह पर माइकल ओडवायर की हत्या के अभियोग का मुकदमा शुरू हुआ। तीन वकीलों ने बचाव में महत्वपूर्ण तर्क दिए। कोर्ट में मिस बर्थ हेरिंग ने ऊधम सिंह से पूछा कि जब गोली चलाते वक्त तुम्हारे हाथ को पकडा गया तो तुमने मुझे पर गाेली क्यों नहीं चलाई। ऐसा करके तुम आसानी से भाग सकते थे। ऊधम सिंह ने जवाब दिया कि महिलाओं, बच्चों और निरअपराध लोगों पर गोलियां तो केवल अंग्रेज ही चला सकते हैं, मैं नहीं। मेरे लिए आप बहन जैसी थी और मैं हर महिला में अपनी मां का रूप ही देखता हूं क्योंकि मैंने अपनी मां को कभी नहीं देखा। नारी का तिरस्कार मैं अपनी मां का अपमान समझता हूं।

मुकदमे की अगली तिथि 5 जून को ऊधम सिंह ने अदालत में कहा कि मैंने एक हत्यारे को मारा है। उस हत्यारे ने जलियांवाला बाग में हजारों निर्दोष लोगों पर गोलियां चलवाई थी। मैंने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की है। देश की आजादी के लिए शहीद होना मेरे लिए गौरव की बात है। वह शासक अत्याचारी है जो अपनी इच्छा के अतिरिक्त कोई नियम कानून नहीं जानता है। दो दिन की 90 मिनट की सुनवाई का अभिनय कर ऊधम सिंह को अपराधी घोषित करके पांच जून को न्यायालय ने फांसी की सजा सुना दी।

मिस मैरी और सरदार शिवर सिंह जोहल ने ऊधम सिंह से हमदर्दी रखने वालों की सहायता से हाईकोर्ट में अपील की। मुकदमे के लिए हिंदू, मुस्लिम और सिख ही नहीं अंग्रेजों ने भी आर्थिक मदद की और करीबन एक हजार पौंड की राशि जमा हो गई। ऊधम सिंह ने सरदार शिव सिंह जोहल से कहा कि इस धनराशि का प्रयोग मुझे बचाने की बजाय भारत में शिक्षा के प्रचार प्रसार पर खर्च किया जाए तो मुझे बहुत खुशी होगी। अंग्रेज सरकार शिक्षा पर खर्च ही नहीं करना चाहती है और उसे तबाह करने पर उतारू है।

15 जुलाई 1940 को दायर अपील खारीज कर दी गई और निचली अदालत द्वारा दी गई फांसी की सजा को बरकरार रखा। ब्रिक्सटन जेल से ऊधम सिंह को पेन्टोनविले जेल भेजा और वहां से 31 जुलाई 1940 को फांसी की सजा को अमल में लाया गया। शिव सिंह जोहल और मिस मैरी पेंटोनविले जेल में मिलने गए और कहा कि हमें दुख है कि हम आपको बचा नहीं पाए। ऊधम सिंह ने कहा कि तुम जैसे लोगों ने मुझ जैसे अनाथ को अपना लिया, ये क्या कम है। 31 जुलाई 1940 को समझौताहीन महान क्रांतिकारी ऊधम सिंह को प्रात:काल चुपचाप पेंटोनविले जेल में फांसी पर चढा दिया गया और शव भी मित्रों को नहीं सौंपा गया।

15 जुलाई 1974 को मुख्यमंत्री ज्ञानी जेल सिंह की पहल पर केंद्र सरकार ने महान देशभक्त ऊधम सिंह की अस्थियों को इंग्लैंड से भारत मंगवाया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अस्थियों को प्राप्त कर श्रद्धांजलि अर्पित की और अस्थियां 31 जुलाई 1974 को जन्मभूमि सुनाम जिला संगरूर पहुंची, जहां पर मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह ने पूरी राजकीय सम्मान के साथ चिता पर अस्थियां रखकर अंतिम संस्कार कर खुद को धन्य कर लिया।

26 दिसंबर 1899 - 31 जुलाई 1940

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