Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

डा. सुनील कुमार का लेख : 21वीं सदी का मूल मंत्र है सड़क सुरक्षा-जीवन रक्षा

भारत में सड़क दुर्घटनाएं सालाना लगभग 1.5 लाख लोगों को मारती हैं। सड़क दुर्घटना के कारण मारे जाने वालों में 17% पैदल चलने वाले यात्री होते हैं, 37% दो पहिया वाहन पर चलने वाले यात्री और 16% चार पहिया वाहन में चलने वाले यात्री होते हैं।

डा. सुनील कुमार का लेख : 21वीं सदी का मूल मंत्र है सड़क सुरक्षा-जीवन रक्षा
X

डॉ.सुनील कुमार (सचिव, प्रादेशिक परिवहन हिसार)

सड़क परिवहन एक स्थान से दूसरे स्थान पर आवागमन को सुगम करती है, सड़कें कृषि उपज को बाजार तक ले जाती हैं और बच्चों को स्कूल अतः वर्तमान समय में सड़कें जीवन की गतिविधियों का केंद्र है। सड़कें आर्थिक विकास और सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। निरंतर आर्थिक विकास और बढ़ते शहरीकरण ने परिवहन प्रणालियों पर दवाब बढ़ा दिया और वर्तमान परिवहन प्रणाली ने एक तरफ़ दूरियों को कम कर दिया है लेकिन दूसरी ओर इसने जीवन जोखिम को बढ़ा दिया है।

सड़क दुर्घटना की सांख्यिकी का विश्लेषण

भारत में सड़क दुर्घटनाएं सालाना लगभग 1.5 लाख लोगों को मारती हैं। तदनुसार भारत में विश्व में दुर्घटना से संबंधित मौतों का लगभग 11% हिस्सा है। भारत द्वारा रिपोर्ट की गई सड़क दुर्घटनाओं की कुल अनुमानित सामाजिक आर्थिक लागत 1,47,114 करोड़ रुपये थी जो देश की जीडीपी के 0.77% के बराबर या उससे अधिक है। सड़क उपयोगकर्ता के दृष्टिकोण से दुर्घटना डेटा का विश्लेषण किए जाने पर निम्न विश्लेषण सामने आते हैं। सड़क दुर्घटना के कारण मारे जाने वालों में 17% पैदल चलने वाले यात्री होते हैं, 37% दो पहिया वाहन पर चलने वाले यात्री और 16% चार पहिया वाहन में चलने वाले यात्री होते हैं। अतः दो पहिया वाहन और पैदल चलने वालों की सड़क दुर्घटना से संबंधित दुर्घटना से मारे जाने वालों का का 54% हिस्सा होता है और यह वैश्विक रुझानों के अनुसार मानव विकास के दृष्टिकोण से सबसे कमजोर श्रेणी है।

अगर हम एज ग्रुप और जेंडर के अनुसार सांख्यिकी का विश्लेषण करें तो यह पाया गया है कि 18 से 45 वर्ष की आयु के युवा वयस्कों ने लगभग 69.3 प्रतिशत सड़क दुर्घटना के के कारण अकाल मौत के मुंह में चले गए हैं जो कि भारत के डेमोग्राफिक डिविडेंड का हिस्सा है। सड़क दुर्घटना से संबंधित डेटा का विश्लेषण करने पर यह भी पाया गया हैं कि कुल दुर्घटना मौतों की संख्या में पुरुषों की हिस्सेदारी 86% थी जबकि महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 14% पाई गई। ट्रैफ़िक रूल वाययलेशन के कारण होने वाली सड़क दुर्घटनाओं का विश्लेषण किया जाए तो यह पाया गया है 67.3% ओवर स्पीडिंग के कारण, 6.1% ग़लत साइड में ड्राइविंग करने के कारण और 3.3% ड्राइविंग करते समय मोबाइल फ़ोन के प्रयोग के कारण और 3.5% शराब पीकर गाड़ी चलाने के कारण दुर्घटना के कारण अपनी जान गंवा देते हैं।

राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा माह के अंतर्गत विभिन्न गतिविधियां

सड़क सुरक्षा के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने विभिन्न राज्यों के साथ मिलकर इस वर्ष 18 जनवरी से 17 फ़रवरी के बीच राष्ट्रीय रोड सुरक्षा माह मनाया। इससे पहले हर वर्ष सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाया जाता था। इस वर्ष सड़क सुरक्षा माह की थीम थी सड़क सुरक्षा- जीवन रक्षा। इसी दौरान इन्स्टिटूट ऑफ रोड ट्रैफ़िक और एजुकेशन ने विभिन्न दिशा निर्देश जारी किए हैं कि किस तरह सुरक्षित स्कूल बस, नागरिकों के लिए सुरक्षित टैक्सी और पर्यटकों के लिए सुरक्षित परिवहन की सुविधा विकसित की जा सके। इसके अतिरिक्त विभिन्न राज्यों ने सड़कों पर ब्लैक स्पॉट के सुधार की नीतियों पर विचार विमर्श किया। विभिन्न ज़िलों में सड़क सुरक्षा पर जागरूकता फैलाने के लिए मैराथन, साइक्लोथान और वाकाथोन जैसी प्रतियोग्यताओं का आयोजन हुआ। सड़क पर दुर्घटना पीड़ित की मदद करने वालों को गुड समरतीयंस का अवार्ड दिए गए। ट्रैफ़िक पुलिस और डॉक्टर्स को रोड सेफ़्टी चैम्पियन से नामांकित किया गया, विभिन्न स्कूलों में सड़क सुरक्षा प्रतिज्ञा बोली गई, हाईवे ऑपरेटर असोसिएशन ऑफ़ इंडिया ने भी सड़क सुरक्षा को लेकर विभिन्न तरह के जागरूकता प्रोग्राम किए, विभिन्न स्थानों पर ड्राइवर्स के आँखों और स्वास्थ्य के चैकअप कैंप का आयोजन हुआ, दिव्यांगो के लिए सुलभ भारत पर संगोष्ठी का आयोजन हुआ ओर सड़क सुरक्षा को लेकर विभिन्न कॉलेजों और स्कूलों में सेमिनार और वेबिनार का आयोजन हुआ। इन सभी का मक़सद है कि सड़क सुरक्षा जीवन रक्षा मंत्र के साथ आगे बढ़ते हुए किस तरह सड़क पर दुर्घटनाओं को कम किया जा सके।

सड़क सुरक्षा चुनौतीपूर्ण क्यों बनी हुई है

# सड़क सुरक्षा पर चलने वालों में पैदल यात्री सबसे अधिक असुरक्षित होते हैं क्योंकि सड़क दुर्घटना के बाद उनके पास बचाव के उपाय सबसे कम होते हैं साथ ही यह भी देखा गया है की मोटर चालकों के मन में पैदल चलने वालों के प्रति अत्यंत कम सम्मान की भावना होती है।

# फुटपाथ पर सामान्यतः वाहनों की पार्किंग हो जाती है या वहा आस पास के दुकानदार अतिक्रमण कर लेते हैं जिसके कारण पैदल चलने वाले यात्री को रोड पर चलने के लिए बाध्य होना पड़ता है जिसके फलस्वरूप दुर्घटना होने की संभावना बढ़ जाती।

# दुर्घटना होने पर वहाँ पर उपस्थित लोगों में सहायता की भावना की कमी देखी जाती है इसका कारण है लोगों में यह धारणा बनी है कि उसके बाद के क़ानूनी कार्रवाई जटिल होती है जबकि भारत में वर्तमान में गुड समेरिटन लॉ आ चुका है जिसके अंतर्गत सड़क दुर्घटना में मदद करने वालों को सरंक्षण मिलेगा।

# यह तो देखा गया है कि सड़क इंजीनियरिंग को नगर नज़रअंदाज़ किया जाता है जिसके फलस्वरूप सड़क सरंचना के डिज़ाइन की गुणवत्ता ख़राब हो जाती है और विभिन्न प्रकार की सड़क दुर्घटना का कारण बनती है। इस दिशा में भी सरकार संरचनात्मक कार्य कर रही है।

सड़क सुरक्षा दृष्टिकोण

पिछले कुछ वर्षों में 3E दृष्टिकोण ; एजुकेशनए इंजीनियरिंग और एन्फोर्समेंट सड़क सुरक्षा के लिए मुख्य दृष्टिकोण रहा है। इंजीनियरिंग उपायों का मतलब वाहन, सड़क, सड़क के किनारे या सड़क के वातावरण में सभी भौतिक परिवर्तन करने के संदर्भ में हैं। एजुकेशन उपाय-सड़क उपयोगकर्ताओं को सूचित करने, सलाह देने, सिखाने या निर्देश देने के लिए शिक्षकों, शिक्षकों, प्रचार एजेंटों की सभी गतिविधियाँ आदि से संबंधित है। प्रवर्तन का अर्थ है पुलिस द्वारा सड़क उपयोगकर्ताओं को ट्रैफ़िक का उल्लंघन करने से रोकने के उद्देश्य से सभी गतिविधियाँ इससे संबंधित है।यदि तीनों सिंक्रनाइज़ेशन में काम करते हैं तो ट्रैफ़िक प्रतिभागियों की सड़क सुरक्षा बढ़ जाती है और सड़क दुर्घटनाएँ कम हो सकती है।

बढ़ते हुए सड़कों के नेटवर्क और वाहनों की संख्या को देखते हुए एक नए दृष्टिकोण को अपनाने की जरूरत है जिसमें सड़क सुरक्षा सभी की जिम्मेदारी रहे क्योंकि यह सभी को प्रभावित करती है, सड़क सुरक्षित रहें तो सभी को लाभ होगा और सड़क सुरक्षा समाज के सभी वर्गो पर निर्भर करती है (सड़क सुरक्षा सभी के लिए और सभी के द्वारा)। इन सभी वर्गो जैसे कि स्कूल प्रशासन, विश्वविद्यालय प्रशासन, जिला प्रशासन, ग़ैर सरकारी संगठन, अस्पताल प्रशासन और नागरिकों को आगे आना होगा। स्कूल के अंदर और बाहर समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा ट्रैफ़िक सुरक्षा संबंधित सैमीनार वर्कशॉप का निरंतर अंतराल पर आयोजन करते रहना चाहिए और इसमें बढ़ चढ़कर भाग लेने का समय आ गया है। प्रत्येक नागरिक को यह एहसास करना होगा की सड़क सुरक्षा सबकी ज़िम्मेदारी है। ट्रैफ़िक इंजीनियरिंग, वाहन इंजीनियरिंग, मनोविज्ञान,शिक्षा और चिकित्सा विज्ञान के उचित सामंजस्य से हम वर्तमान समय की एक सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा का मुक़ाबला कर सकते हैं।

यह लेखक के अपने निजी विचार हैं

Next Story