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देशव्यापी परिचर्चा की मांग करता दंगा निरोधक कानून विधेयक

देश में जिस तरह से सांप्रदायिक दंगों का एक लंबा इतिहास रहा है, उसे देखते हुए यहां लंबे समय से दंगा निरोधक कानून की जरूरत है।

देशव्यापी परिचर्चा की मांग करता  दंगा निरोधक कानून विधेयक
देश में जिस तरह से सांप्रदायिक दंगों का एक लंबा इतिहास रहा है, उसे देखते हुए यहां लंबे समय से दंगा निरोधक कानून की जरूरत महसूस की जा रही है। एक ऐसा कानून जो अल्संख्यकों और बहुसंख्यकों के बीच होने वाली हिंसक झड़पों की रोकथाम करने में सहायक हो, साथ ही पीड़ितों को उचित मुआवजा व पुनर्वास का प्रबंध भी करे। जाहिर है सांप्रदायिक दंगों में दोनों वर्ग के लोगों की जानें जाती रही हैं और देश में पीड़ितों की सूची काफी लंबी है।
ऐसे दंगे समाज के अवांछित तत्वों द्वारा शुरू किये जाते हैं और शिकार निर्दोष परिवार होते हैं। देश में सांप्रदायिक भावना हमेशा से संवदेनशील मुद्दा रहा है, लिहाजा इससे जुड़ी समस्या के निवारण के लिए जो भी कानून बने उसमें ऐसे प्रावधान होने चाहिए जो हर समुदाय को सहज स्वीकार्य हों। ऐसे किसी भी तरह का पक्षपात या राजनीति से प्रेरित होकर काम नहीं किया जाना चाहिए जो भविष्य में सामुदायिक सौहार्द के लिए खतरा बने। केंद्र सरकार संसद के मौजूदा सत्र में जो सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक लाने की तैयारी कर रही है, उससे वास्तविक समस्या का निवारण होता नहीं दिखता, बल्कि मसौदे की भाषा को देखकर लगता हैकि विधेयक में यह पहले ही मान लिया गया है कि देश में हर तरह के दंगे का जिम्मेवार बहुसंख्यक होते हैं। विधेयक में ऐसे और भी कई प्रावधान हैं, जो मूल समस्या को नजरअंदाज तो कर ही रहे हैं, बल्कि उनकी आड़ में किसी समुदाय विशेष के खिलाफ इसका दुरुपयोग भी हो सकता है।
ऐसे में नरेंद्र मोदी की मांग उचित लगती है कि इस विधेयक में कई सुधारों की जरूरत है। मोदी ने बकायदा प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मांग की है कि इस पर आगे बढ़ने से पहले सभी राज्यों और इससे जुड़े तमाम पक्षों से सलाह-मशविरा किया जाना चाहिए, क्योंकि यह विधेयक संघीय ढांचे पर प्रहार करता है और समाज को आपस में बांटने वाला है। तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी और एआईएडीएमके की जयललिता भी इस पर विरोध जता चुकी हैं। जयललिता विधेयक को राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण बताते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से शीतकालीन सत्र में इसे न लाने की गुजारिश कर चुकी हैं। जाहिर इसके प्रावधान राज्यों के अधिकारों का भी हनन कर रहे हैं।
कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है और यह विधेयक केंद्र सरकार को उसमें हस्तक्षेप का अधिकार देता है। वहीं सपा, बसपा, बीजद और वाम दल सहित गृह और कानून मंत्रालय के अधिकारी भी कई प्रावधानों में संशोधन की मांग कर रहे हैं। सीपीआई नेता गुरुदास दास गुप्ता ने कहा है कि उनकी पार्टी इस बिल का सर्मथन करेगी, लेकिन मौजूदा स्वरूप में नहीं, कुछ बदलाव के साथ। जब हर स्तर पर संशोधन की मांग हो रही है तब सरकार को इतनी जल्दीबाजी क्यों है, जो कि हर हाल में इस सत्र में लाने का हठ पाले हुए है। जिस तरह से विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की भद पिटने की खबरें आ रही हैं वैसे में क्या इस बात की आशंका नहीं बढ़ जाती है कि इसके पीछे वोट बैंक की राजनीति काम कर रही है।
निश्चित रूप से बिल के मसौदे को नये रूप में कुछ इस तैयार किया जाना चाहिए, जिससे कि दंगों की मूल समस्या पर प्रहार हो सके। प्रधानमंत्री को सर्वसम्मति बना सामुदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाले प्रावधानों को हटाने की पहल करनी चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि केंद्र सरकार कुछ अच्छा करने और दंगों से निपटने की जल्दीबाजी में देश को किसी नई मुसीबत की ओर धकेल दे।
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