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एनजीओ की बाढ़ और जवाबदेही की कमी

एनजीओ की बाढ़ और जवाबदेही की कमी

एनजीओ की बाढ़ और जवाबदेही की कमी
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नई दिल्‍ली. भारत जैसे देश में जहां 943 लोगों के लिए एक पुलिसकर्मी और 1700 लोगों के लिए एक डॉक्टर हों, वहां प्रति 600 लोगों पर एक एनजीओ (गैर सरकारी संस्था) के सक्रिय होने की बात कौतुहल और संदेह पैदा करती है। देश में एनजीओ की इतनी बाढ़ आने की आखिर वजह क्या है? जानी मानी लेखिका एम्मा थॉमसन के अनुसार ये संस्थाएं जिस नैतिक और सामाजिक उत्तरदायित्व का भार उठातीं हैं, दरअसल वे सरकारों की जिम्मेदारी हैं। अर्थात लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकारों की सामाजिक आर्थिक मोर्चे पर मिली विफलता इनके पनपने के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है।

परंतु क्या सभी एनजीओ अपने उद्देश्यों में सफल हो रही हैं। तथ्यों पर गौर फरमाएं तो जिस तादाद में देश में इनकी मौजूदगी है और जिस स्तर पर सरकार तथा दूसरे स्रोतों से इन्हें फंड मिलता है, वह जमीन पर कहीं दिखाई नहीं देता। हालांकि कई गैर सरकारी संगठन हैं जिन्होंने बेहतर काम किया है, लेकिन उनकी संख्या मुट्ठीभर है। हाल ही में केंद्रीय जांच ब्यूरो ने यह तथ्य पेश किया कि देश के विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में करीब बीस लाख एनजीओ कार्यरत हैं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर सीबीआई इनकी जांच पड़ताल कर रही है, जिसमें लगभग आधे एनजीओ उत्तर प्रदेश और केरल में हैं।

दरअसल, मौजूदा समय में एनजीओ में जवाबदेही की कमी है। यही वजह है कि उन्हें शक की निगाह से देखा जाने लगा है। कई एनजीओ अपने फंड और खर्चे संबंधी कागजात आयकर विभाग को नहीं सौंपती हैं। ये बातें सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट से कही है। वर्ष 2002-09 के बीच इन स्वयंसेवी संस्थाओं को केंद्र और राज्य सरकारों से औसतन एक हजार करोड़ रुपये का वार्षिक अनुदान मिला। वहीं केंद्रीय गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि इन्हें विदेशों से करीब दस हजार करोड़ सालाना की रकम प्राप्त होती है। अकसर अनुदान में मिली रकम का इन संस्थाओं द्वारा दुरुपयोग की खबरें आती रहती हैं।

यहां भ्रष्टाचार भी कम नहीं है। अधिकांश एनजीओ तो महज कागजों पर ही चल रही हैं। इनकी सारी गतिविधियां कागजी होती हैं। यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि नीति निर्धारण और जनमत निर्माण के उद्देश्य से बनी सार्वजनिक संस्थाओं की साख प्रभावित हो रही है परंतु वहीं ये गैर सरकारी संस्थाएं अपने संसाधनों के दम पर राजनीति और समाज पर अधिक प्रभावी होती जा रही हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि कई जरूरी कानून और नीतियां इन गैर सरकारी संस्थाओं की देन हैं और कई मुद्दों पर इन्होंने लोगों और सरकार का ध्यान खींचा है।

ऐसे में विभिन्न क्षेत्रों में एनजीओ की मौजूदगी जरूरी है, लेकिन जिस तरह से मात्र पैसा जुटाने और स्वहित के लिए ऐसी संस्थाएं चल रही हैं, उस पर आज गंभीर बहस की जरूरत है। क्योंकि ऐसा देखने में आया है कि अधिकांश एनजीओ अनुदान में मिली राशि का बड़ा हिस्सा अपने कर्मचारियों के वेतन, कार्यालयी खर्च और कागजों पर खर्च कर देते हैं। आज इनकी गतिविधियों पर नियंत्रण और धन के दुरुपयोग को रोकने की जरूरत है, हालांकि यह कार्रवाई बदले की भावना से नहीं होनी चाहिए, नहीं तो अच्छे एनजीओ के लिए दिक्कत पैदा हो सकती है।

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