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गणतंत्र दिवस 2018ः भ्रष्ट चुनाव प्रणाली और न्यायपालिका से बदहाल है भारत!

यह सही है कि देश के तमाम राजनीतिक दल आज सत्तालोलुप, भ्रष्ट और नाकारा नजर आते हैं तो इसके लिए देश की वर्तमान चुनाव प्रणाली जिम्मेदार है।

गणतंत्र दिवस 2018ः भ्रष्ट चुनाव प्रणाली और न्यायपालिका से बदहाल है भारत!

वर्तमान समय में भारतीय गणतंत्र की सबसे बड़ी विफलता यह है कि देश का गण हाशिए पर है और तंत्र ने व्यवस्था को पूरी तरह जकड़ लिया है। ऐसा नहीं है कि देश में विकास नहीं हुआ है, लेकिन यह असमान विकास है। धनी जिस तेज रफ्तार से धनी हो रहे हैं, गरीब उसी रफ्तार से गरीब। देश में करोड़पतियों की संख्या जिस तेजी से बढ़ी है, उसी तेजी से किसानों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की आत्महत्याओं की संख्या भी बढ़ी है। देश की एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे बसर कर रही है।

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युवा बेरोजगारों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। देश के संसाधनों पर एक दो प्रतिशत लोग काबिज हैं। देश में सांप्रदायिकता और जातिवाद घटने के बजाय दिनों-दिन बढ़ रहा है या यूं कहिए कि तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए इन्हें बढ़ाया जा रहा है। लोकतंत्र के लिए ये लक्षण शुभ नहीं हंैं। देश की वर्तमान राजनीति और प्रशासन में इन चुनौतियों से लड़ने की कोई इच्छा भी नहीं दिखती।

चुनाव प्रणाली जिम्मेदार

यह सही है कि देश के तमाम राजनीतिक दल आज सत्तालोलुप, भ्रष्ट और नाकारा नजर आते हैं तो इसके लिए देश की वर्तमान चुनाव प्रणाली जिम्मेदार है। जिस देश में विधायक और सांसद का चुनाव लड़ने के लिए लाखों, करोड़ों का खर्च आता है, उस देश में जनप्रतिनिधियों से ईमानदारी की उम्मीद करना दिवास्वप्न ही है। इन महंगे चुनावों के लिए राजनीतिक दल पूंजीपतियों और अवैध धंधों में लिप्त लोगों से बड़े पैमाने पर अवैध चंदे वसूलते हैं।

चुनाव जीतने के बाद चंदादाताओं की फिक्र

अगर वे जीते तो उन्हें अपने चंदादाताओं की फिक्र ज्यादा होगी और देश की आर्थिक नीतियां भी उन्हें ही ध्यान में रखकर बनाई जाएंगी। इसी तरह लाखों, करोड़ों खर्च कर जो लोग चुनाव जीत कर जाएंगे, वे अपनी लागत निकालने और अगले चुनाव के लिए धन एकत्र करने के उद्देश्य से अवैध कमाई करेंगे ही। पैसों पर आधारित यह चुनाव प्रणाली जब तक नहीं बदलेगी, तब तक राजनीतिक दल और उसके नेता भी नहीं बदलेंगे।

भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं है न्यायपालिका

केवल विधायिका और कार्यपालिका में ही भ्रष्टाचार नहीं है, न्यायपालिका भी भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं है। देश के न्यायालयों में सालों नहीं, दशकों से करोड़ों मामले लंबित हैं। अमीरों को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, लेकिन तारीख पर तारीख की लंबी और जटिल प्रक्रिया आर्थिक तौर पर कमजोर लोगों के लिए किसी आपदा से कम नहीं होती। विलंब से न्याय भी अन्याय ही है और यह किसी भी भ्रष्टाचार से ज्यादा खतरनाक है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाने वाला मीडिया भी विश्वसनीयता के संकट से गुजर रहा है।

भेड़चाल के शिकार

जब देश की समूची व्यवस्था भ्रष्ट, गैरजिम्मेदार, संवेदनहीन और अमानवीय हो चली हो तो आम लोगों से यह उम्मीद करना कि वे वीतरागी होकर और जाति-धर्म से ऊपर उठकर अपना दायित्य समझेंगे और ईमानदारी से निभाएंगे, अनुचित सोच है। देश के कुछ प्रतिशत आम लोगों का ही नैतिक और बौद्धिक स्तर ऐसा होता है कि वे समाज और देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। ज्यादातर लोग भेड़चाल के ही शिकार हैं। वे वही करेंगे जो सत्ता में बैठे लोगों को करते देखेंगे। यानी, जब तक देश की राजनीति और प्रशासन में बैठे लोग अपने उदाहरण से देश के सामने आदर्श उपस्थित नहीं करेंगे, देश की जनता से कोई उम्मीद करना बेमानी है।

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