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डॉ. मोनिका शर्मा का लेख : गैर-शिक्षण कार्यों का बोझ घटे

कहना गलत नहीं होगा कि शिक्षकों की व्यस्तता शिक्षण कार्य ही दोयम दर्जे पर ले आई, जबकि यह समझना जरूरी है कि शिक्षक और विद्यार्थी का रिश्ता सिर्फ पुस्तकीय पाठ पढ़ाने भर का नहीं होता। यह साथ जीवन की बुनियाद बनाने वाला है। बच्चों के भविष्य की बेहतरी और स्वयं शिक्षकों की कल्पनाशीलता और शैक्षणिक योग्यता को सही दिशा देने के लिए जरूरी है कि उन्हें शिक्षण कार्यों के इतर दी जाने वाली व्यवस्थागत जिम्मेदारियों का भार कम किया जाए।

हिमाचल में अब साॅफ्टवेयर के जरिये होंगे शिक्षकों के ट्रांसफर
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फाइल फोटो

डॉ. मोनिका शर्मा

नई शिक्षा नीति-2020 में सीखने और सिखाने की प्रक्रिया में बड़े बदलाव किए गए हैं। इनमें कुछ नए प्रावधान केवल बच्चों से नहीं शिक्षकों से संबंधित भी हैं। इस फेहरिस्त में एक प्रावधान शिक्षकों को गैर-शिक्षण कार्यों के मुक्त रखने का भी है। गौरतलब है कि शिक्षा नीति-2020 के तहत सरकार ने शिक्षकों से केवल शिक्षण कार्य करवाने का भी नियम बनाया है। साथ ही अब बेवजह अध्यापकों का तबादला भी नहीं किया जाएगा। नई नीति के मुताबिक शिक्षकों के तबादले सिर्फ विशेष परिस्थितियों में ही किये जाएंगे। इस प्रक्रिया के लिए राज्य और केंद्र शासित प्रदेश एक सख्त मानक के अनुसार निर्णय ले सकेंगे। स्थानांतरण की प्रक्रिया कंप्यूटराइज्ड प्रणाली के तहत की जाएगी, ताकि उसमें पारदर्शिता भी बरती जा सके। इन बिन्दुओं को समग्र रूप से महत्वपूर्ण कहा जा सकता है, क्योंकि गैर-शिक्षण कार्यों की व्यस्तता शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़ी है। शिक्षकों का अन्य कार्यों में लगे रहना बच्चों के भावनात्मक और रचनात्मक विकास को बाधित करने वाला परिवेश बनाता है। सीखने-सिखाने का वह सकारात्मक प्रवाह और जुड़ाव बन ही नहीं पाता जो शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच होना चाहिए। ऐसे में अगर शिक्षकों को गैर-शिक्षण कार्यों में न लगाने के इस प्रावधान को सही ढंग से लागू किया गया तो यह पूरी शिक्षण व्यवस्था में बेहतर बदलाव लाने वाला साबित हो सकता है।

शिक्षक भावी नागरिकों की वैचारिक रचनात्मकता को सामने लाने और सर्वांगीण विकास कर उनके व्यक्तित्व को तराशने वाले मानवीय माध्यम कहे जाते हैं, लेकिन इसके लिए एक स्कारात्मक परिवेश की भी दरकार होती है। हमारे यहां अच्छे परिक्षा परिणाम न आने या बच्चों के विकास में दूसरे मोर्चों पर कोई कमी रह जाने पर शिक्षकों को ही दोष दिया जाता है। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि क्या हमारी शिक्षण व्यवस्था में शिक्षकों को क्षमता और योग्यता के बावजूद बेहतर कार्य करने का परिवेश और प्रोत्साहन मिलता है?

देखने में आता है कि चाहे-अनचाहे कितने की कामकाज उनके हिस्से डाल दिए जाते हैं, जो अंततः शिक्षा की निरंतरता को प्रभावित करते हैं। पढ़ाई का सहज प्रवाह प्रभावित होता है और इसका ख़ामियाज़ा बच्चों को भुगतना पड़ता है। कितने ही सरकारी और गैर-सरकारी अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि प्राथमिक स्कूल के विद्यार्थी अपनी कक्षा की पुस्तकों को भी नहीं पढ़ पाते। इतना ही नहीं वे अपनी उम्र और कक्षा के हिसाब से लिखने-पढ़ने और गणित के प्रश्न हल करने में में पीछे हैं। हिन्दी भाषी राज्यों में बच्चे भी अपनी भाषा में पिछड़ रहे हैं। शिक्षा के शुरुआती पड़ाव पर ही उनकी नींव कमजोर हो रही है। विचारणीय है कि राइट टू एजुकेशन के तहत स्कूलों में बच्चों का नामांकन तो बढ़ा पर शिक्षा की गुणवत्ता आज भी सवाल बनी हुई है। दो साल पहले प्रारंभिक शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था 'प्रथम' की एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ था कि 8वीं पास करने वाले वाले ज्यादातर छात्र सामान्य गणित के सवाल हल करना भी नहीं जानते। इतना ही नहीं 27 फीसदी विद्यार्थियों को ठीक से हिन्दी पढ़ना-लिखना नहीं आता। इस रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में 4 बच्चों में से 1 बच्चा साधारण सा पाठ पढ़ना सीखे बिना ही 8वीं कक्षा तक पहुंच जाता है। ऐसे में यह समझना मुश्किल नहीं कि बच्चों के पढ़ने- सीखने के इस सफ़र शिक्षकों द्वारा दिए जा रहे समय में कटौती करना उचित नहीं है। जो कि यह गैर-शिक्षण कार्यों की जिम्मेदारी कम किए संभव नहीं।

दरअसल, हमारे यहां इस मोर्चे पर कम ही सोचा गया है पर देश की शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक अहम पहलू शिक्षकों के हालात भी हैं। उन पर लादे गए गैर-शिक्षण कामकाज के चलते स्कूलों में पढ़ाई की गुणवत्ता और कौशल निखारने का ऐसा माहौल ही नहीं है, जिसमें उनसे बच्चों के जीवन के हर पहलू को निखारने-संवारने की उम्मीद की जा सके। उन पर अध्यापन कार्य से इतर मिलने वाली दूसरी जिम्मेदारियों को भी ढंग से निभाने का दबाव बना रहता है। यह दबाव तब तनाव में बदल जाता है जब शिक्षकों को एक निश्चित समयावधि में कई सारे कार्य निपटाने होते हैं। सरकारी विभागों और विषयों से जुड़ी सूचनाओं को जुटाने के फेर में कई बार शिक्षकों के लिए कोर्स पूरा करवाने की औपचारिकता पूरी कर पाना भी कठिन होता है। अफसोस कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था का यह विचारणीय पक्ष सदा से ही उपेक्षित रहा है, जबकि बच्चों के बस्तों में भरी किताबों के पाठ्यक्रम को पूरा करवाने का दायित्व हो या समय-समय सरकार की ओर से मिली अन्य जिम्मेदारियों को पूरा करने की योजनाओं का हिस्सा बनना, शिक्षक भी भार ही ढोते रहे हैं। ऐसा भार जो गैर शिक्षण कार्यों से जुड़ा है। ऐसे दायित्व जो असल मायने में बच्चों की शिक्षा से किसी भी तरह से नहीं जुड़े हैं,जबकि प्राथमिक शिक्षा की गिरती गुणवत्ता की एक बड़ी वजह शिक्षकों पर लदा यह बोझ भी है। चिंतनीय है कि गैर-शिक्षण कामकाज से जुड़ी व्यस्तता के चलते एक ओर बच्चों की कल्पनाशीलता और रचनात्मकता का क्षय हो रहा है तो दूसरी ओर सृजनात्मक रिक्तता से स्वयं शिक्षक भी जूझ रहे हैं ।

असल में देखा जाए तो सरकारी मशीनरी से जुड़े कई सारे कार्यों के लिए शिक्षकों की ओर ताकने वाली हमारी व्यवस्था में शिक्षक बहुत सी जिम्मेदारियां एक साथ निभाते हैं। सरकारी योजनाओं और नीतियों को जन-जन तक ले जाने वाली कागज़ी कार्रवाई का यह बोझ प्रत्यक्ष रूप से हमारे शिक्षकों और अप्रत्यक्ष रूप से हमारी शिक्षा व्यवस्था पर इस कदर लाद दिया गया है कि शिक्षा का अर्थ केवल पाठ्यक्रम पूरा करवाने तक ही सिमट गया है। कई बार तो सरकारी विभागों और विषयों से जुड़ी सूचनाओं व तथ्यों को जुटाने के फेर में शिक्षकों के लिए पाठ्यक्रम पूरा करवाने की औपचारिकता पूरी कर पाना भी कठिन होता है।

कहना गलत नहीं होगा कि शिक्षकों की यह व्यस्तता शिक्षण कार्य ही दोयम दर्जे पर ले आई, जबकि यह समझना जरूरी है कि शिक्षक और विद्यार्थी का रिश्ता सिर्फ पुस्तकीय पाठ पढ़ाने भर का नहीं होता। यह साथ जीवन की बुनियाद बनाने वाला साथ है। शिक्षक बच्चों को किताबी ज्ञान से इतर ऐसे सबक भी देते हैं, जो व्यावहारिक जीवन से रूबरू करवाएं। बच्चों की रचनात्मक सोच को पंख देने का काम शिक्षक ही करते हैं। उनकी रुचि और मनोविज्ञान को समझकर सुशिक्षित नागरिक के रूप में गढ़ते हैं। बच्चों के भविष्य की बेहतरी और स्वयं शिक्षकों की कल्पनाशीलता और शैक्षणिक योग्यता को सही दिशा देने के लिए जरूरी है कि उन्हें शिक्षण कार्यों के इतर दी जाने वाली व्यवस्थागत जिम्मेदारियों का भार कम किया जाए।

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