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लोकतंत्र के महाकुंभ में उतरने को तैयार दल

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यह धीरे-धीरे परिपक्व हो रहा है।

लोकतंत्र के महाकुंभ में उतरने को तैयार दल

नई दिल्ली. किसी भी लोकतांत्रिक देश में संसदीय चुनाव एक महत्वपूर्ण पड़ाव होने के साथ-साथ उसकी दशा और दिशा तय करते हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यह धीरे-धीरे परिपक्व हो रहा है। यहां राज्यों के विधानसभा चुनाव हों या लोकसभा के, वे हमेशा एक उत्सव का रूप ले लेते हैं। हाल ही में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव कईमायनों में महत्वपूर्ण रहे। जिस प्रकार से मतदाताओं की रिकॉर्ड भागीदारी हुई उससे स्पष्ट होता है कि अब आमजन का राजनीति में भरोसा बढ़ रहा है और वे बुलेट की बजाय बैलेट से बदलाव लाना चाहते हैं। अब देश में लोकसभा चुनावों का महाकुंभ शुरू होने वाला है।

जिसे लेकर राजनीतिक दलों में अभी से गहमागहमी साफ देखी जा सकती है। जनता को भी भावी प्रधानमंत्री का बेसब्री से इंतजार है। हालांकि चुनाव आयोग की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन संकेत मिल रहे हैं कि आम चुनाव सोलह अप्रैल से शुरू होकर मई के पहले पखवाड़े में खत्म हो जाएगा और सोलह मईतक चुनावों के नतीजे घोषित हो जाएंगे।

वैसे भी 15वीं लोकसभा का कार्यकाल 31 मई तक निर्धारित है। भारतीय जनता पार्टी लोकसभा के लिए उम्मीदवारों की पहली सूची 20 जनवरी को जारी करेगी। करीब एक वर्षपुरानी पार्टी ‘आप’ भी चुनावी समर में उतरने की घोषणा कर दी है। दूसरी ओर कांग्रेस चार राज्यों में अपनी करारी हार से सीख लेकर आम चुनावों का सामना करने की कोशिशों में लगी है। क्षेत्रीय दल भी अपने-अपने स्तर पर मतदाताओं को आकर्षित करने में जुटे हैं।

भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की तैयारियां भी जोरो पर हैं। देशभर में उनकी जनसभाओं का दौर जारी है। कांग्रेस जिस तरह से नरेंद्र मोदी को निशाना बना रही है। उससे साफ संकेत मिल रहे हैंकि वह आम चुनावों को दूसरे ही रंगों में रंगने की कोशिश कर रही है। वहीं भारतीय जनता पार्टी महंगाई, भ्रष्टाचार, घपलों-घोटालों, नेतृत्व और कुशासन को मुद्दा बना रही है। प्रधानमंत्री 12 साल पूर्व हुए गुजरात दंगों का ही राग अलाप रहे हैं।

जबकि एसआईटी और कोर्ट ने मोदी को क्लीन चिट दे दी है। इससे स्पष्ट है कि कांग्रेस नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता से हताश है। उसे कुछ सूझ नहीं रहा है। इस बार के चुनाव कई मायनों में अलग होने जा रहे हैं। ‘आप’ की नई राजनीति को जिस तरह से दिल्ली विधानसभा में सफलता मिली है, उसके बाद कई क्षेत्रीय दलों के सामने भी चुनौतियां रहेंगी। वहीं नरेंद्र मोदी की जनसभाओं में जनसैलाब उमड़ रहा है। हर सर्वे और रिपोर्ट में मोदी बढ़त बनाये हुए हैं।

यूपीए के कुशासन के कारण कांग्रेस से जनता का मोहभंग हुआ है इसके संकेत भी मिलने शुरू हो गये हैं। देश बदलाव चाहता है। बेहतर विकल्प का इंतजार कर रहा है। हालांकि दिल्ली में कांग्रेस ने ‘आप’ को रणनीतिक सर्मथन दिया है। कांग्रेस इस नई ताकत को सर्मथन दे कर उसके गुब्बार को और फैलाना चाहती है जिससे कि नरेंद्र मोदी के बढ़ते कारवां को रोका जाये। इसमें कांग्रेस कितनी सफल हो पाती है, यह तो आने वाला वक्त और देश का मिजाज ही तय करेगा।

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