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दुष्कर्म के खिलाफ पुलिस तंत्र की उदासीनता असहनीय

सरकार कितना भी कठोर कानून बना ले, अपराधियों को तनिक भी भय नहीं है।

दुष्कर्म के खिलाफ पुलिस तंत्र की उदासीनता असहनीय
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दिल्ली निर्भया गैंगरेप के बाद केंद्र सरकार ने जिस तरह सख्त कानून बनाया था, उसके बाद उम्मीद की जा रही थी कि दुष्कर्म जैसे घिनौने अपराध पर अंकुश लगेगा और अपराधियों को कानून का भय होगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उत्तर प्रदेश में दिल्ली-कानपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर बुलंदशहर के पास एक महिला और उसकी नाबालिग बेटी के साथ उसके पति और पिता के समक्ष ही हुए गैंगरेप ने साबित कर दिया है कि अपराधियों में कानून का कोई भय नहीं है।
सरकार कितना भी कठोर कानून बना ले, अपराधियों को तनिक भी भय नहीं है। उल्टे निर्भया कांड के बाद रेप के अपराध में हिंसा और बढ़ गई है। अपराधियों ने सबूत मिटाने के लिए रेप के बाद हत्या करना शुरू कर दिया है। बुलंदशहर गैंगरेप कांड के दो दिन बाद दिल्ली में एक नाबालिग लड़की की रेप के बाद हत्या कर दी गई। सबूत मिटाने के लिए रेप के बाद चाकू मार कर हत्या की और उसके बाद लड़की के निचले हिस्से को जला दिया गया। दिल्ली में ही उबर टैक्सी ड्राइवर ने रात में अपनी ही महिला यात्री से रेप किया था। पिछले साल रोहतक में नेपाली युवती के साथ गैंगरेप के बाद हत्या की वीभत्स वारदात हुई थी।
उसमें अपराधियों ने युवती के गुप्तांग में रोड़े डाल कर बुरी तरीके से युवती को मौत के घाट उतारा था। इस साल मई में बेंगलुरु में एक छह साल की बच्ची के साथ उसके स्कूल के ही सुपरवाइजर ने रेप किया था। यूपी में बुलंदशहर से पहले बिजनौर, बरेली, शाजापुर और मुजफ्फरनगर में रेप व गैंगरेप के वारदात हो चुके हैं। इधर हाल के दिनों में लगता है कि देशभर में रेप जैसे जघन्य अपराधों की बाढ़ आ गई है। नेशनल क्राइम ब्यूरो (एनसीबी) की ताजा रिपोर्ट में भी कहा गया है कि पिछले एक साल में सबसे अधिक महिलाओं के खिलाफ अपराध में बढ़ोत्तरी हुई है।
उसमें भी रेप, छेड़छाड़ और हत्या के मामले सबसे अधिक हो रहे हैं। यह किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए चिंता की बात है। रेप व हत्या के खिलाफ सख्त कानून होने के बावजूद अगर अपराधियों में जरा भी खौफ नहीं है, तो इससे साफ है कि हमारा पुलिस सिस्टम बीमार है। वर्ष 2012 में हुए दिल्ली निर्भया कांड के चलते भारतीय पुलिस सिस्टम की पूरी दुनिया में पोल खुली थी, नागरिक सुरक्षा के मोर्चे पर भारत को दुनिया के सामने लज्जित होना पड़ा था। उसके बाद ही 2013 में केंद्र सरकार ने अपने क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में संशोधन कर महिलाओं के साथ यौन अपराध के खिलाफ कठोर कानून बनाया था।
लेकिन चिंता की बात है कि सख्त कानून के बावजूद महिलाओं के खिलाफ यौन अपराध में बढ़ोत्तरी ही हो रही है। आखिर पुलिस तंत्र को हो क्या गया है, वह कहां है? वे अपराध क्यों नहीं रोक पा रही है? दूसरी तरफ समाज भी मौन और उदासीन क्यों बना हुआ है? कहीं यह कारण तो नहीं कि राज्यों की पुलिस जिस संवेदनहीनता के साथ काम कर रही है, उसमें लोग खुद को हमेशा असुरक्षित महसूस करते हैं। सपा सरकार में यूपी पुलिस की छवि इस कदर बदनाम हो गई है कि उसकी साख पर सवाल उठने लगे हैं। वैसे पुलिस तंत्र की स्थिति देशभर में विस्फोटक है।
पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह की कमेटी ने पुलिस प्रणाली में आमूल-चूल सुधार की सिफारिश की थी। यह अब तक नहीं हुआ है। केंद्र को पुलिस सुधार के लिए तत्काल कदम उठाना चाहिए, तो राज्य सरकारों को भी अपने पुलिस सिस्टम को तुरंत दुरुस्त करना चाहिए। उसे नागरिकों के प्रति संवेदनशील और उत्तरदायित्व बनाना चाहिए।
पुलिस में शीर्ष पदों पर बैठे लोगों को भी अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करनी चाहिए और पुलिसकर्मियों की जिम्मेदारी तय करनी चाहिए। नहीं तो, पुलिस जब तक भैंस की तलाश को प्राथमिकता देती रहेगी, आपराधियों के हौसले बुलंद रहेंगे और पुलिस तंत्र पर सवाल उठते रहेंगे। हर हाल में यौन हिंसा असहनीय है।
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