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राजा सिंह की कहानी : स्वयं पराजित

यथार्थ की पथरीली राह पर आखिर कब तक वह अपनी रचनात्मक कोमलता को बचाए रख पाता?

राजा सिंह की कहानी : स्वयं पराजित
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नौकरी के लिए माता-पिता द्वारा बार-बार टोका जाना उसे परेशान कर देता था। ऐसा नहीं था कि वह घर के हालात से अंजान था लेकिन अपने भीतर के लेखक को मारकर सिर्फ रोजी-रोटी के जुगाढ़ में स्वयं को आहूत करने को, उसका मन तैयार नहीं होता। यथार्थ की पथरीली राह पर आखिर कब तक वह अपनी रचनात्मक कोमलता को बचाए रख पाता?

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उसकी नींद खुल गई थी। उसने अपना सिर कछुवे की तरह रजाई से बाहर निकाला। आंखों में प्रकाश पड़ने से आंखें चुंधियां सी गर्इं। सिर को एक झटके से फिर रजाई के अंदर कर लिया। अब वह रजाई के भीतर ही भीतर बार्इं ओर खिसक गया। अब की बार आंखें बंद किए ही सिर को बाहर निकाला। वह अपने को आश्वस्त कर लेना चाहता था कि धूप उसकी आंखों में पड़ रही है या नहीं। उसने धीरे से आंखें खोलीं। रोशनदान से धूप उतर कर पलंग के दार्इं ओर आ बैठी थी। उसने आहिस्ता से अपने को रजाई से मुक्त किया और लेटे ही लेटे एक भरपूर अंगड़ाई ली। करवट बदल कर अलार्म घड़ी को देखा...साढ़े आठ। उसके चेहरे पर मुस्की तैर गई। मन ही मन बुदबुदाया, ‘धत् तेरे की...।’
कल रात सोते समय उसने निश्चय किया था कि सबेरे चार बजे उठकर कहानी लिखेगा। कहानी का प्लॉट कई दिनों से उसके जेहन में चक्कर काट रहा था। पता नहीं कब अलार्म बज गया। ‘दोपहर को लिखूंगा’ यह सोचकर वह आश्वस्त हुआ। लेटे ही लेटे उसने चाय के लिए आवाज दी और आंखें मलने लगा। आंखों में हाथ रखकर वह कुछ देर निश्चल पड़ा रहा।
आहट पर धीरे से आंख उठाकर देखता है। मां चाय और अखबार लेकर आई थीं। वह धीमे-धीमे चाय पीता रहा और अखबार पढ़ता रहा। मां सामने ही स्टूल पर बैठी उसके मूड को परख रही थीं। ‘क्या बात है मां?’ उसने चाय और अखबार एक साथ समाप्त करके बडे़ दुलार से पूछा।
मां ने अपने भीतर साहस महसूस किया, ‘ऐसा है...कल तुम्हारे बाबूजी...’ कहकर वह फिर उसकी प्रतिक्रिया देखने लगीं।
‘कहती जाओ’, उसकी मुखाकृति बदलती मालूम पड़ रही थी। वह लापरवाही से पलंग पर पसर गया था। ‘एक प्राइवेट स्कूल में तीन हजार रुपए की मास्टरी की जगह खाली है। उन्होंने तुमसे पूछने को कहा है। प्रिंसिपल तुम्हारे बाबूजी की जान-पहचान का है।’ यद्यपि मां को उसका जवाब मालूम था। परंतु वह सोचती थी कि प्रयत्न करने में क्या हर्ज है। ‘तुम मेरी औकात तीन हजार रुपए की समझती हो।’ उसने बड़ी झुंझलाहट से जवाब दिया। ‘मैं कई बार कह चुका हूं कि इस प्रकार की छोटी-मोटी नौकरी मुझे पसंद नहीं है। फिर भी तुम लोग मुझे चैन से नहीं रहने देते हो, जाओ! अपना काम करो जाकर। बेकार के लफड़े में न पड़ो। जब कोई नौकरी मेरे अनुरूप मिलेगी, मुझे देर नहीं लगेगी उसे हथियाने में।’
‘पता नहीं कब अच्छी नौकरी मिलेगी?’ मां बड़बड़ाती हुई कमरे से बाहर हो गई थीं, ‘चार साल हो गए एमए किए हुए। अच्छी नौकरी मिलना क्या? कहीं से इंटरव्यू तक के लिए बुलावा आया नहीं हैं। छोटी-मोटी नौकरी लाट साहब करेंगे नहीं।’ मां का बड़बड़ाना चालू हो जाता है तो मुश्किल से ही थमता है, ‘अरे मैं कहती हूं दो-चार ट्यूशन ही कर ले तो कम से कम खुद का खर्चा तो निकाल ले। पता नहीं कब तक पराए बूते खाता रहेगा।’ ‘अब चुप भी करो।’ यह कहते हुए वह काफी बेबस हो गया था। उसका मूड बुरी तरह से ऑफ हो गया। उसने जल्दी से घर के बाहर का रास्ता नापा।
सड़क पर वह काफी धीमे कदमों से चल रहा था-एक दिशाहीन पड़ाव की तरफ। बोझिल कदमों के साथ उसका दिमाग भी बोझिल था। वह महसूस करता है कि उस पर काफी जिम्मेदारियां हैं। बड़ी बहन की शादी की समस्या, छोटे भाइयों की पढ़ाई की समस्या, घर के खाने-खर्चे की समस्या और खुद अपने खर्चे की समस्या। इन सब समस्याओं का भी भरकम बोझ ढोते बाबूजी। सड़क पर पड़े कंकड़ को उसने पैरों से लुढ़का दिया। बड़ी देर तक वह लुढ़कते हुए कंकड़ को देखता रहा। उसे लगा कुछ दिनों बाद उसकी भी नियति इस कंकड़ की तरह हो जाएगी।
रास्ते में कमल दिख गया, वह और कमल साथ-साथ पढ़े हैं, कमल को बैंक में नौकरी करते तीन साल हो रहे हैं। कभी वह और कमल काफी गहरे मित्र थे। कमल अब भी उससे काफी खुल कर मिलता है। परंतु वह उससे कन्नी काटता है। वह हीन भावना से ग्रसित हो जाता है, जब भी कमल दिखता है। शायद वह उससे ईर्ष्या भी करता है।कमल उसी की तरफ आ रहा था। कमल ने उसके दोनों कंधे पकड़ लिए, ‘मैंने कहा, कहां जा रहे हो, इतने गुमसुम?’ उसे लगा उसके स्वर में जिज्ञासा नहीं सहानुाभूति है।
‘बस ऐसे ही’ उसने बड़े निर्विकार भाव से उत्तर दिया था।
कमल ने उसे कुरेदा, ‘कहीं से इंटरव्यू के लिए आया कुछ?’‘नहीं’, उसने एक नजर उठाकर बड़ी शांति से जवाब दिया। उसे कमल को देखकर कोफ्त हो रही थी। उसे लगता है कि कमल जान-बूझकर उससे ऐसे सवाल पूछकर उसकी दु:खती नस को छेड़ता है।
‘तुम्हारे लेखन के क्या हाल-चाल हैं?’ कमल ने फिर कोंचा।‘भाड़ में गया लेखन’ वह काफी बोर महसूस करता है। उसका गुबार फूट पड़ना चाहता है। परंतु वह जब्त कर गया था। ‘चलो पिक्चर चलते हैं।’ कमल उसका हाथ पकड़कर चलते हुए बोला।
‘नहीं...’। उसने हाथ छुड़ाकर चलते हुए कहा। उसकी आवाज काफी ऊंची थी। उसे खुद अपनी आवाज पर झेंप महसूस हो रही थी। कमल समझ गया था कि शायद घर में तकरार हो गई है। और ऐसे मौके पर उसे अकेला छोड़ देना ज्यादा बेहतर होगा। उन दोनों के बीच कुछ दूरी तक शब्दहीन वार्तालाप था। एक-दूसरे के प्रति सोच और मनन।
‘अच्छा तो मैं चलता हूं’ कमल हताश सा बोला। उसने कोई जवाब नहीं दिया। सिर्फ कमल का जाना देखता रहा। वह काफी देरतक भटकना चाहता था कि एकदम से पता नहीं क्या सोचकर वह घर की तरफ लौट आया। खाना खाते समय घर में एक घुटा-घुटा सा माहौल व्याप्त था। एक-दो कौर के बाद वह इधर-उधर देखता है। बाबूजी चुपचाप खाना खा रहे हैं। मां उसे थोड़ी-थोड़ी देर बाद घूर लेती थी। कभी-कभी सन्नाटा हिलने लगता था, जब मां बिना पूछे रोटी रखने लगती थी। उसने महसूस कर लिया था कि बाबूजी और मां में बहस हुई होगी-जिसका कारण निश्चय ही वही होगा।
‘बेटा तुम ये नौकरी कर क्यों नहीं कर लेते?’ मां ने शायद बड़ी हिम्मत बटोर कर कहा था। उसने सिर्फ एक नजर उठाकर मां की तरफ देखा। फिर बाबूजी की तरफ। वे शायद इस समय यह प्रसंग छेड़े जाने को तैयार नहीं थे। उनके चेहरे पर एक सपाट नि:शब्द प्रतिक्रिया क्षण भर में गुजर गई। ‘जब तुम्हें अच्छी नौकरी मिल जाए...तुम इसे छोड़ सकते हो।’ मां को शायद उसके प्रतिरोधहीन चेहरे से उत्साह मिला था। आखिर कब तक ऐसे चलेगा? वह आंखें फाड़ते हुए मां को देखने लगा। उसे खाने से गंध आने लगी थी।
वह गंध उसे अपने में घेरने लगी। उसके दिलो-दिमाग में एक पागल सी सनक घूमने लगी। एक अजीब सी वितृष्णा उसे जकड़ने लगी थी। अचानक उसने थाली उठा कर आंगन में फेंक दी। और उठकर खड़ा हो गया। मां और बाबूजी हतप्रभ रह गए, जड़वत हो गए थे। ‘हर समय वही बकवास... मैं तुम लोगों को बोझ लगता हूं।’ दिल के भीतर एक गुबार उठा और वह फूट गया था। वह चीखने लगा, ‘मैं इस घर में अब कभी नहीं आऊंगा’ और उन लोगों की प्रतिक्रिया देखे बिना ही वह घर से बाहर हो गया था।
कितनी देर वह उस दिन लाइबे्ररी में बैठा रहा, उसे कुछ पता नहीं चला। वह अपने ही ख्यालों में सिकुड़ कर बैठा था, वह कमरे, किताबों अखबारों, मेज, कुर्सी सबके बाहर था। उसने हर अखबार, हर पत्रिका उलट डाली थी। क्या पढ़ा था? कुछ ध्यान नहीं था। बड़ी देर तक वह एकटक चलते हुए पंखे को घूरता रहा था। लाइब्रेरी खाली हो चुकी थी, सभी लोग जा चुके थे। शायद टाइम हो चुका था। चपरासी उसकी तरफ आ रहा था। वह उठ खड़ा हुआ।
बाहर दूर-दूर तक लॉन बिछा हुआ था। बाहर का अंधेरा उसके भीतर धीमे से घुस आया था। शरीर के बाहर और भीतर के सन्नाटे में एक व्यवधान था...उसकी चप्पलें। वह लॉन में लेट जाता है। चप्पलों को तकिए के रूप में प्रयोग करता है।
अचानक उसके भीतर एक दु:ख दहकने लगता है। बाबूजी उसे ढूंढ़ रहे होंगे। मां रोते-रोते निढाल हो आई होंगी। अब शायद उसके लौट आने की राह देख रही होंगी। उसके भाई-बहन गुमसुम बैठे होंगे। एक छोटा सा डर उसके दिलो-दिमाग में छाने लगा था। एक अनिश्चित भविष्य का खौफ, यह चिंता उसके सारे शरीर को मथानी की तरह मथ डाल रही थी। क्या पेट के लिए इससे भी बदतर हालातों से सामना नहीं करना पड़ेगा, जिसके लिए वह घर छोड़ आया है।
उसने आंखों से हाथ को हटाया। ऊपर विशाल आकाश सीना ताने खड़ा था। बादल का एक टुकड़ा उसकी ओर देखकर सरक गया। शायद वह भी उसके पास ठहरना नहीं चाहता था। उसकी नींद बादलों के साथ बड़ी दूर चली गई थी। जिसका लौटना उस दिन मुश्किल था, ‘अब, मैं कहां हूं ?’ उसने अपने से पूछा? लेटे-लेटे वह काफी देर तक अपने से बातें करता रहा। लॉन में पड़े-पड़े वह ठंड से सिकुड़ सा गया था।
पेट के भीतर भूख का जीवित ज्वालामुखी फूट गया था। जिसका लावा सारे शरीर में फैल गया था। बाहर हवा सांय-सांय कर रही थी। उसकी जिद वाष्प बनकर उड़ रही थी। जो चारों ओर झींगुरों की आवाज के साथ मिलकर शोर कर रही थी। धीरे-धीरे उसका शोर बढ़ता ही जा रहा था।वह उठ बैठा। सामने बाबूजी खड़े थे। सुन्न स्तब्ध और आंखें फाड़ते हुए। उसने ग्लानि से सिर झुका लिया। ‘चलो घर...’ उन्होंने धीरे से उसके बालों को छुआ, एक सिहरन सिर से चल कर पैरों तक गुजर गई। उनके स्वर में बुलावा था, धीरज था।
‘नहीं...नहीं...नहीं...’ वह चीख पड़ना चाहता था। परंतु आवाज गले में दम तोड़ गई थी। पागलपन नहीं करते हैं।’ उनके स्वर में कराहट थी। बाबूजी ने उसे अंगुली पकड़कर उठाया था। वह अपनी अंगुली न छुड़ा सका और उनके साथ चल पड़ा।
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