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गठन से पूर्व ही विवादों में घिरा लोकपाल

लोकपाल जैसी महत्वपूर्ण संस्था के सदस्यों का चयन आनन-फानन में किया जा रहा है।

गठन से पूर्व ही विवादों में घिरा लोकपाल
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नई दिल्‍ली. करीब चार दशक बाद देश को जब पिछले साल लोकपाल कानून मिला था तो लोगों ने इस उम्मीद के साथ इसका जोरदार स्वागत किया था कि वह भ्रष्टाचार से लड़ने का सबसे कारगर संस्था होगी, लेकिन अब इसके चयन की प्रक्रिया को लेकर जिस तरह से विवाद हो रहे हैं उसके बाद तो कांग्रेस नीत यूपीए सरकार की मंशा पर ही सवाल उठ रहे हैं। वहीं लोकपाल की चयन प्रक्रिया भी खटाई में पड़ती दिख रही है। यह निराशाजनक है कि ऐसी महत्वपूर्ण संस्था के सदस्यों का चयन आनन-फानन में किया जा रहा है। यह रवैया ठीक नहीं है।

देश लोकसभा चुनावों के मुहाने पर खड़ा है। और यूपीए सरकार चला चली की बेला में उन सभी कायरें को पूरा कर लेना चाहती है, जिसे वह करीब नौ वर्षों से लटकाई हुई है! देश का पहला लोकपाल चुनने की उसकी इसी जल्दबाजी के कारण उसे बार बार शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही है। बिना लोगों से चर्चा किए उनका नाम ले रही है और वे अपना नाम वापस ले रहे हैं। पहले जानेमाने विधिवेत्ता फली एस नरीमन ने लोकपाल सर्च कमेटी का सदस्य बनने से इंकार किया था और अब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश केटी थॉमस ने भी इस कमेटी की अगुआई करने से इंकार कर दिया है।

उन्होंने तो सर्च कमेटी की वजूद पर ही सवाल खड़े किए हैं। उनके मुताबिक तो इस कमेटी का औचित्य ही नहीं है, क्योंकि सर्च कमेटी के ऊपर एक लोकपाल चयन समिति भी है जो उसकी किसी सिफारिश को मानने के लिए बाध्य नहीं है। इस तरह देखा जाए तो यह उसकी अवमानना भी करती हुई दिख रही है। इससे पहले नरीमन ने भी तौर तरीकों पर सवाल उठाए थे। न्यायाधीश केटी थामस ने कहा है कि सर्च कमेटी की भूमिका मात्र इतनी ही है कि वह उन नामों में से कुछ नाम चिह्न्ति करेगी जो कमेटी को भारत सरकार की ओर से दिए जाएंगे।

यदि मौजूदा सर्च कमेटी का सिर्फ यही काम है तो उसके गठन की जरूरत क्यों है? इससे पहले नरीमन ने भी आशंका जताई थी कि लोकपाल चयन की बहुस्तरीय प्रक्रिया सर्वाधिक सक्षम, स्वतंत्र और साहसी लोगों की अनदेखी कर सकती है। उनकी राय थी कि लोकपाल जैसी महत्वपूर्ण संस्था के गठन का यह तरीका नहीं है। इन दोनों की इस आपत्ति में खासा दम नजर आता है कि इस तरह से देश में एक स्वतंत्र और निष्पक्ष लोकपाल का चयन करना संभव नहीं है। एक प्रश्न यह भी उठता है कि सरकार ने आखिर इस सर्च कमेटी की भूमिका को इतनी सीमित क्यों कर दी है।

उसे आठ लोगों वाली इस कमेटी पर क्यों यकीन नहीं है। और जब सरकार को अपनी ही करनी थी तो वह इसका गठन ही क्यों की है। लगता है सरकार की नीयत ठीक नहीं है वह मात्र दिखाना चाह रही है कि लोकपाल गठन के लिए एक व्यापक और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जा रही है। इससे पहले नेता प्रतिपक्ष ने भी विरोध जताया था कि लोकपाल चयन समिति का 5वां सदस्य पीपी राव कांग्रेस के सर्मथक हैं पर सरकार ने उनके विरोध को महत्व नहीं दिया। तो कहीं न कहीं सरकारी स्तर पर प्रबंधन और प्रक्रिया में खोट है। इसको दुरुस्त करने की जरूरत है।

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