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राफेल डील : बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का

राफेल डील पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला कानूनदां लोगों की मुट्ठी में हवा पकड़ना है। अदालत ने बहुअर्थी द्वैध फैसला कर दिया। सरकार को लगा क्लीन चिट मिली।

राफेल डील : बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का

राफेल डील पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला कानूनदां लोगों की मुट्ठी में हवा पकड़ना है। अदालत ने बहुअर्थी द्वैध फैसला कर दिया। सरकार को लगा क्लीन चिट मिली। याचिकाकारों और मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को लगा मुशायरा तो हुआ ही नहीं। 29 पृष्ठीय फैसले में तिहाई हिस्सा तथ्यों को संक्षेप में बटोरने में लगा। उतना ही प्रक्रिया के समझने समझाने की टिप्पणियों में दीखता है। मुख्य विवाद राफेल विमानों की कीमतों में कई गुना बढ़ोतरी का है। वह दो पन्नों में निपटा। अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस को आफसेट याने पूरक ठेका मिलने का विवाद पांच पृष्ठों में फैला।

आखिरी पैराग्राफ में परंतुक लगा कि संविधान के अनुच्छेद 32 के अनुसार मूल अधिकारों के हनन जैसी याचिका मानकर सुनने से सुप्रीम कोर्ट को परहेज़ है। बड़ा हिस्सा इस बौद्धिक, सैद्धांतिक विवाद में उपयोग हुआ कि कार्यपालिका अर्थात सरकार के प्रशासनिक, व्यापारिक और सामरिक महकमे के फैसलों में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक हस्तक्षेप करने की अधिकारिता काफी सीमित होती है।

कुछ पुराने फैसलों का हवाला देते कोर्ट ने बार बार परम्परा की चादर ओढ़ी कि देश की सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मामलों के निर्णय में बहुत परिणामधर्मी हस्तक्षेप कैसे करे। याचिकाकारों ने मोटे तौर पर कहा था मामले की सीबीआई जांच कराई जाए क्योंकि इसमें दीखता हुआ भ्रष्टाचार हुआ है।

यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और प्रशांत भूषण ने कहा सीबीआई एफआईआर तक दर्ज नहीं कर रही है जबकि उसे जांच करनी चाहिए। आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने भी ऐसी ही शिकायत की।

सुप्रीम कोर्ट के वकील मनोहरलाल शर्मा हड़बड़ी में जनहित याचिकाएं दाखिल करने और फिर उनके खारिज होने का फैसला सुनने और कभी कभी डांट या दंडित होने का अवसर पाले रहते हैं।

उनकी याचिका ने बड़बोले अनुतोष मांगे कि अदालत के संरक्षण में जांच हो और भारत फ्रांस के करार तक को रद्द कर दिया जाए। एक अंतरध्वनि आसानी से सुनी जा सकती है जो स्वाभाविक ही देश के उच्चतम न्यायालय के जे़हन में बार बार गूंजती भी थी।

मामले का निराकरण पूरी तौर पर सरकार के खिलाफ हो भी जाता तो अंततः उससे भारतीय वायुसेना और देश को सामरिक दृष्टि से नुकसान होने की भी सीधी सीधी आशंका रही होगी। बार बार यह कौंध फैसले में हिचक के साथ आगे बढ़ती है।

बाद में हिचकी की तरह बार बार आने लगी। सब कुछ कहने के उपक्रम के बाद भी सुप्रीम कोर्ट ने तयशुदा ढंग से अपनी तरफ से कुछ खास नहीं ही कहा। सरकारी जवाब और आधे अधूरे दस्तावेजों का अवलोकन करने पर सुप्रीम कोर्ट को लगा छानबीन किए बिना दस्तावेजी विवरण को आधार मानकर ऐसा कुछ कह दिया जाए जो पूरी तौर पर सरकार के खिलाफ नहीं जाए।

रक्षा सौदों के मामले में सरकार, आलोचक और जनता अलग अलग खेमों में फिट नहीं किए जा सकते। इस हड़बड़ी या सावधानी में कुछ तथ्यों की अनदेखी या गलतबयानी हो गई। पता नहीं सरकार ने कहा या सुप्रीम कोर्ट ने समझा कि सभी मुनासिब जानकारियां, प्रक्रिया और कीमतों के निर्धारण, विवरण को संसद की लोकलेखा समिति के सामने प्रस्तुत कर दिया गया है।

यह तथ्यात्मक दृष्टि से गलत है। इसीलिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने लोकलेखा समिति के अध्यक्ष सांसद मल्लिकार्जुन खडगे को प्रेस वार्ता में साथ बिठाकर आरोप लगाया कि लोकलेखा समिति के सामने दस्तावेज पेश ही नहीं किए गए। उन्हें पेश कर दिया जाना मानते हुए निर्णय में चूक हुई है।

सुप्रीम कोर्ट ने देश की सामरिक सुरक्षा के साथ ही वायुसेना की हथियारों की ज़रूरतों पर टिप्पणी करते पाया कि सरकारी ढिलाई के चलते शत्रु मुल्कों में सामरिक सुरक्षा के नाम पर बेहतर नस्ल के हथियार खरीदे जा रहे हैं। ऐसा महसूस किया कि इस वजह से भारत यदि पिछड़ रहा है तो उसे पिछड़ने से रोका जाना भी ज़रूरी है।

यही मुख्य वजह है कि प्रकरण में चाहकर भी कथित सरकारी भ्रष्टाचार की जांच का आदेश देने से देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ या खतरा हो कोर्ट की समझ में आ सकता था। कुछ और सवाल तर्कों के गलियारे में गलबहियां करते हैं।

मोदी सरकार द्वारा राफेल सौदा सितंबर 2016 में संशोधित कर लिखा पढ़ी होने के बाद 2 वर्षों तक लोग मौन क्यों रहे पर सुप्रीम कोर्ट के सवाल पर ही जवाबी सवाल खड़े होते हैं। फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति के स्वयमेव आए खुलासे के बाद देश और मीडिया में हलचल हुई।

पूरी मासूमियत में पूछा जा सकता है कि रक्षा सौदों की गोपनीय प्रक्रिया के चलते किसी नागरिक को संभावित भ्रष्टाचार या अनियमितताओं की जानकारी मिल भी कैसे सकती थी।

आनुषंगिक सवाल यह है कि सरकार के इस अरोप में कि हिंदुस्तान एरोनाॅटिक्स लिमिटेड को यदि आंशिक ठेका दिया जाता तो उसकी हथियार निर्माण संबंधी योग्यता पर संदेह के बादल छितरा गए थे को कैसे माना जा सकता है।

सरकारी और प्रक्रियात्मक ढिलाई यदि हुई भी तो उसका खमियाजा देश और नागरिकों की न्यायप्रियता को क्यों भुगतना चाहिए। सरकार के संकटमोचक अरुण जेटली चुने गए अनुकूल हिस्सों को सुनाकर रक्षा में राफेल की गति की तेजी में ठीक ही आए।

बार बार सुप्रीम कोर्ट ने ब्रिटिश नजीरों पर आधारित पुराने फैसलों पर निर्भर रहते इस मामले की तह तक जाना राष्ट्रीय सुरक्षा के अलावा सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वनियंत्रित अनुशासन की परिधि में जाकर देखना चाहा।

मुख्य बात यही है कि सबसे बड़े आरोपकर्ता राहुल गांधी और कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में कोई मुकदमा प्रस्तुत नहीं किया। यह राजनीतिक फतवा कैसे दिया जा सकता है कि राहुल राफेल में फेल हो गए और उन्हें देश से माफी मांगनी चाहिए।

राहुल गांधी का सवाल तो देश के खिलाफ नहीं केन्द्र सरकार के खिलाफ था। केन्द्र सरकार ने लगातार राहुल गांधी की मांग का विरोध किया है कि मामले की जांच संसदीय संयुक्त समिति से कराई जाए। भले ही उसमें भाजपा और एनडीए के सदस्यों का बहुमत हो।

देश इस बात को समझे यदि न्यायपालिका, सरकार याने कार्यपालिका के सामरिक व्यापारिक नस्ल के फैसलों की तह में ब्रिटिश परंपराओं से पोषित न्याय के ज्ञानशास्त्र के कारण अदालतें नहीं जाना चाहतीं तो संविधान के निर्माता हम लोग याने भारत के नागरिकों द्वारा चुनी गई संसद के नियमों के अनुसार संयुक्त संसदीय समिति द्वारा जांच क्यों नहीं कराई जानी चाहिए।

जाहिर है इसका जवाब सुप्रीम कोर्ट को नहीं देना है। यह जवाब खुद के कपड़ों पर धूल झाड़ती केन्द्र सरकार को देना है। सुप्रीम कोर्ट ने देश की सामरिक सुरक्षा के साथ ही वायुसेना की हथियारों की ज़रूरतों पर टिप्पणी करते पाया कि सरकारी ढिलाई के चलते शत्रु मुल्कों में सामरिक सुरक्षा के नाम पर बेहतर नस्ल के हथियार खरीदे जा रहे हैं। ऐसा महसूस किया कि इस वजह से भारत यदि पिछड़ रहा है तो उसे पिछड़ने से रोका जाना भी ज़रूरी है।

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