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वोट की खातिर ऐसी संकीर्ण राजनीति नहीं होनी चाहिए

वोट की खातिर ऐसी संकीर्ण राजनीति नहीं होनी चाहिए

वोट की खातिर ऐसी संकीर्ण राजनीति नहीं होनी चाहिए

नई दिल्‍ली. सुप्रिम कोर्ट के कदम का स्वागत किया जाना चाहिए जिसने तमिलनाडु सरकार के उस फैसले पर रोक लगा दी है, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों को रिहा करने की बात की गई थी। पूर्व प्रधानमंत्री के हत्यारों को रिहा करने का तमिलनाडु सरकार का फैसला संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित है और यह देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बहुत ही खतरनाक है। इसकी जितनी निंदा की जाए कम है।

मंगलवार को सर्वोच्च अदालत ने दया याचिकाओं के निपटारे में हो रही बेवजह देरी को आधार बना कर राजीव गांधी के तीन हत्यारों संतन, मुरुगन और पेरारिवलन की फांसी की सजा को उम्र कैद में तब्दील कर दी थी। उनकी हत्या के अन्य चार दोषी पहले से ही उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। जैसे ही यह फैसला आया राज्य की एआईएडीएमके की सरकार ने उनकी रिहाई का प्रस्ताव पास कर केंद्र सरकार की सहमति के लिए भेज दिया और कहा कि वह केंद्र सरकार की असहमति के बाद भी उनको रिहा कर देगी, क्योंकि वह इसके लिए अधिकारी है।

परंतु सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए देश की न्याय व्यवस्था के इतिहास में यह अनहोनी नहीं होने दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राजीव गांधी हत्या मामले में दोषियों को रिहा करने के तमिलनाडु सरकार के फैसले में प्रक्रियागत खामियां हैं। राज्य सरकार बिना केंद्रीय मंत्रिमंडल की सहमति के उन्हें रिहा नहीं कर सकती। राजीव गांधी हत्याकांड की जांच एसआईटी को सौंपी गई थी, जो कि केंद्रीय एजेंसी थी। लिहाजा उस हत्याकांड से जुड़े सभी कैदी कानूनन केंद्र सरकार के माने जाएंगे। इनसे जुड़ा कोई भी फैसला केंद्र सरकार की सहमति के बिना नहीं लिया जा सकता।

इसमें देखें तो राज्य सरकार का कोई रोल नहीं है। एक तरह से तमिलनाडु की सरकार वोट बैंक की राजनीति कर रही है। तमिल की राजनीति कुछ दशकों से देश की विदेश नीति को भी प्रभावित करने की कोशिश करती रही है। साथ ही कुछ नए किस्म की राजनीति करके केंद्र सरकार और लोकतंत्र को भी प्रभावित करती रही है। वहीं से ही चुनावों में लोकलुभावन वादे कर मतदाताओं को प्रभावित करने का चलन आरंभ हुआ था, जो कि अब उत्तर भारत में भी देखा जाने लगा है। गत वर्ष श्रीलंका में चोगम की बैठक में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भाग लेने जाने वाले थे, परंतु उनके पूर्व सहयोगी डीएमके ने श्रीलंकाई तमिलों के मानवाधिकारों के मुद्दे पर उनसे बहष्किार करने के लिए दबाव बनाया।

केंद्र सरकार को दबाव में झुकना पड़ा और प्रधानमंत्री के बदले विदेश मंत्री को भेजा गया था। अब लोकसभा चुनाव नजदीक हैं। लिहाजा जयललिता सरकार इस तरह से वोट बैंक की राजनीति करने की कोशिश कर रही है। देश में एक संघीय व्यवस्था है। भारत को राज्यों का संघ कहा भी जाता है, जहां केंद्र प्रधान होता है।

ऐसे में राज्य सरकारों को केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्थाओं को मानकर चलना चाहिए, नहीं तो देश में अराजकता पैदा हो जाएगी। वर्तमान में आंध्र प्रदेश और दिल्ली इसके उदाहरण बने हैं। इस तरह की राजनीति भारतीय लोकतंत्र ही नहीं, बल्कि इसकी स्वतंत्र न्याय व्यवस्था को भी चोट पहुंचा सकती है।

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