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उमेश चतुर्वेदी का लेख : पैकेज पर न हो सियासत

सरकार ने किसानों, गरीबों, मजदूरों, छोटे कारोबारियों, उद्योगों अलावा बैंकिंग, परिवहन, पर्यटन आदि के लिए भी बड़े आर्थिक पैकेज का ऐलान किया है, लेकिन कांग्रेस खुश नहीं है। उसकी मांग है कि किसानों के खाते में साढ़े सात-सात हजार रुपये डाले। हालांकि कांग्रेस यह मांग करते वक्त यह भूल गई कि 2004 में जब सरकार केंद्र सरकार ने किसानों के 74 हजार करोड़ के कर्ज माफ किए थे, लेकिन इसका फायदा बैंकों, रसायन, उर्वरक और बीज कंपनियों को मिला था।

उमेश चतुर्वेदी का लेख : पैकेज पर न हो सियासत

उमेश चतुर्वेदी

कोरोना से उपजे अभूतपूर्व संकट ने देश के आर्थिक पहिये को बैक गियर में डाल दिया है। खेती-किसानी को छोड़ दें तो तकरबीन पूरे देश का कामकाज ठप है। इसकी वजह से जहां करोड़ों हाथ बेरोजगार हुए हैं, वहीं जनसंख्या के एक बड़े हिस्से के सामने रोटी का संकट खड़ा हुआ है। इसे देखते हुए पूरी दुनिया की सरकारों ने आर्थिक उपाय शुरू किए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देश की आर्थिक गतिविधियों को तेज करने के लिए बीस लाख करोड़ के पैकेज का ऐलान किया।

आंकड़ों के नजरिए से देखें तो यह पैकेज दुनिया की पांचवीं बड़ी आर्थिक महाशक्ति बन चुके भारत के सकल घरेलू उत्पाद का दस फीसद बैठता है। जो पड़ोसी पाकिस्तान जैसे देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के न सिर्फ बराबर है, वहीं यह दुनिया के 149 देशों की सालाना जीडीपी से भी ज्यादा है। भारत की तुलना में न्यूजीलैंड, पुर्तगाल, यूनान को कहीं ज्यादा विकसित माना जाता है। यह उनकी जीडीपी से भी बड़ा है। कोरोना में दुनिया का सबसे बड़ा आर्थिक पैकेज जापान ने जारी किया है, जो उसकी जीडीपी का 21.1 फीसदी है। जबकि दूसरे नंबर संयुक्त राज्य अमेरिका है, जिसने अपनी जीडीपी का 13 फीसदी के पैकेज का ऐलान किया है। तीसरे नंबर पर अपनी जीडीपी के 12 फीसदी के पैकेज के साथ जहां स्वीडन है, वहीं चौथे नंबर पर अपनी जीडीपी के 10.7 फीसद के साथ जर्मनी है। पांचवें नंबर भारत आता है। आर्थिक आंकड़ों के आधार पर भारत का यह पैकेज बड़ा तो जरूर है, लेकिन जनसंख्या के लिहाज से देखें तो यह आंकड़ा उन विकसित देशों की तुलना में कम ही कहा जाएगा। प्रधानमंत्री के ऐलान के बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने चार दिनों तक देश में आर्थिक गतिविधियां तेज करने के उपायों और आर्थिक कार्यक्रमों को घोषित किया। नए आर्थिक पैकेज में जहां किसानों की निश्चित आय, जोखिम रहित खेती और गुणवत्ता पर देशव्यापी कानून बनाने का ऐलान किया गया, वहीं किसानों को देशव्यापी बाजार देने, 25 साल नए किसान क्रेडिट कार्ड बनाने और किसानों को आसान दरों पर ब्याज देने का ऐलान किया गया। वित्त मंत्री ने आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन करने और ऑपरेशन ग्रीन का विस्तार टमाटर, प्याज और आलू के अलावा बाकी सभी फलों और सब्जियों के लिए करने की घोषणा की। इसके साथ ही मधु मक्खी पालन के लिए 500 करोड़ की सहायता देने की भी घोषणा की गई। ताकि मधु मक्खी पालकों के लिए आधारभूत संरचना का निर्माण किया जा सके। सरकार जड़ी-बूटी वाले पौधों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए चार हजार करोड़ रुपये देने जा रही है। इस योजना के तहत सरकार गंगा किनारे 800 हेक्टेयर में हर्बल उत्पाद पार्क बनाने की तैयारी में भी है। इसी तरह पशुधन विकास फंड के लिए पंद्रह हजार करोड़ का प्रावधान किया जा रहा है। इसी तरह मत्स्य पालन के लिए 20 हजार करोड़ और नौ हजार करोड़ उसकी बुनियादी संरचना सुधार के लिए भी सरकार ने प्रावधान किए हैं।

जिस तरह औद्योगिक शहरों से मजदूरों का पलायन उनके गांवों की ओर हुआ है, उसे देखकर सरकार को भी लगता है कि इनमें से बड़ी संख्या शायद ही शहरों की ओर जल्द लौटे। इसे ध्यान में रखते हुए सरकार ने स्थानीय स्तर पर ही रोजगार उपलब्ध कराने की योजनाओं पर काम शुरू किया है। इसके तहत राज्यों के प्रमुख उत्पादों मसलन बिहार के मखाना, केरल के रागी, कश्मीर के केसर, आंध्र की मिर्च, उत्तर प्रदेश के आम आदि के लिए उन्हीं राज्यों में क्लस्टर बनाने की तैयारी है, जिससे करीब दो लाख छोटी खाद्य उत्पादक कंपनियों को फायदा पहुंचेगा।

वित्त मंत्री ने रेहड़ी-पटरी कारोबारियों, प्रवासी श्रमिकों और छोटे कारोबारियों के लिए नौ बड़े ऐलान किए। इसके तहत रेहड़ी-पटरी वालों को सीधे दस हजार रुपये कर्ज देने का ऐलान किया गया। इसी तरह शिशु ऋण पर छूट और ढाई करोड़ किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड पर दो लाख करोड़ रुपये तक का कर्ज देने का ऐलान किया गया है। इसके अलावा शहरी बेघरों के लिए सस्ता घर, किराए पर सस्ते घर, तीन वक्त का खाना आदि की भी व्यवस्था करने की भी घोषणा की गई। छोटे और मंझोले किसानों के लिए तीन लाख करोड़ का कोलेटरल फ्री कर्ज देने का ऐलान किया गया, जो बिना किसी गारंटी के चार साल के लिए होगा। इसी तरह खस्ताहाल छोटे और मंझोले उद्योगों यानी एमएसएमई के लिए बीस हजार करोड़ का कर्ज दिया जाएगा। जिससे दो लाख कारोबारियों को फायदा होगा। छोटे और मंझोले कारोबारियों को ज्यादा टर्नओवर में भी कर छूट मिलती रहे, इसके लिए सरकार ने एमएसएमई की परिभाषा बदल दी है। नई परिभाषा के मुताबिक पांच 5 करोड़ तक के टर्नओवर तक माइक्रो इंडस्ट्री कही जाएगी। फंड ऑफ फंड्स के जरिए एमएसएमई के लिए 50,000 करोड़ का इक्विटी इन्फ्यूजन किया जाएगा, जिससे उन्हें अपनी क्षमता बढ़ाने में मदद दी जाएगी। सरकार ने देशी उद्योग को फायदा पहुंचाने के लिए एक और बड़ा फैसला लिया है। इसके तहत दो सौ करोड़ तक के सरकारी टेंडर में विदेशी कंपनियों को हिस्सा लेने से रोक दिया गया है। इसके साथ ही ई-मार्केट से एमएसएमई को जोड़ने की तैयारी है। जिसके तहत सरकारी कंपनियों में फंसे पैसे को 45 दिनों में चुकाने का प्रावधान होगा। इसके साथ ही अगले तीन महीने यानी जून, जुलाई और अगस्त में भी ईपीएफ में कंपनियों और कर्मचारियों की देनदारी सरकार देगी। इसके साथ ही माइक्रो फाइनेंसिंग कंपनियों के लिए सरकार ने तीस हजार करोड़ की स्पेशल लिक्विडिटी योजना लाने का भी ऐलान किया है। इसी तरह टीडीएस और टीसीएस में 25 फीसद की छूट भी दी जा रही है। कोरोना के कारण रियल एस्टेट प्रोजेक्ट में देर होने के लिए रियल एस्टेट कंपनियों को कोई जुर्माना नहीं देना होगा।

सरकार ने इसके अलावा बैंकिंग, परिवहन, हवाई परिवहन, पर्यटन आदि के लिए भी बड़े आर्थिक पैकेज का ऐलान किया है, लेकिन कांग्रेस इन योजनाओं से खुश नहीं है। उसकी मांग है कि किसानों को सरकार तीन महीने तक लगातार सीधे उनके खाते में साढ़े सात-सात हजार रुपये डाले। हालांकि कांग्रेस यह मांग करते वक्त भूल गई है कि साल 2004 में जब उसकी अगुआई वाली सरकार केंद्र की सत्ता में आई थी, तब उसने किसानों के करीब 74 हजार करोड़ रुपये के कर्ज माफ किए थे, लेकिन इसका फायदा बैंकों, रसायन, उर्वरक और बीज कंपनियों को मिला था। उन दिनों किसानों की आत्महत्या के मामले को उछाल रहे नागपुर के किशोर तिवारी ने मांग रखी थी कि माफी की यह रकम किसानों के खातों में दे दी जाए। लेकिन कांग्रेस सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया था। कोरोना काल के दौर में अव्वल तो होना यह चाहिए कि राजनीति कम से कम हो, लेकिन राजनीति है कि थमने का नाम नहीं ले रही।

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