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हे भक्तो! ये माया बहुत ठगिनी है

अशोक गौतम | UPDATED Jan 17 2019 1:12PM IST
हे भक्तो! ये माया बहुत ठगिनी है

अपने पाप्जी को लाइव रहने की न ठीक होने वाली बीमारी है। कारण, वे पेशे से लाइवता को धारण किए हैं। लाइव होने का यह असाध्य रोग जिसे एक बार लग जाए तो वह मरने के बाद भी नहीं जाता। मरने के बाद भी वह अशरीरी हो लाइव रहने लगता है, अपने भक्तियों, भक्तनों को परेशान करता।

पहले जब वे कारावास से बाहर थे तो अपने भक्तों, भक्तिनों के साथ बाहर से ही लाइव रह उन्हें अलाइवता का प्रसाद दोनों हाथों से आंखें बंद कर बांटते थे। पर जब नास्तिक कानून ने उन्हें बाहर लाइव न रहने दिया तो वे कारावास से ही लाइव होने लगे।

बाहर से लाइव रहते मत पूछो पाप्जी ने कितने भक्तों को स्वर्ग के बहाने नरक में प्रवेश करने का सुअवसर प्रदान किया। जो भी उनके चरणों में आता वे उसे नरक के द्वार पार करवा ही नाश्ता करते। जो भी उनके चरणों में आती उसे नरक का द्वार पार करवा ही डिनर करते।

उनमें कुछ कूट-कूटकर भरा हो या न हो पर उनमें लाइव रहने की सोमरसता की भावना कूट-कूटकर भरी हुई है। कल उन्होंने कारावास में जैसे कैसे लाइव रहते अपने लाइव होने का परिचय देते अपने भक्तों को वचन नहीं, प्रवचन दिए।

बाहर लाइव होते तो वचन भी देते, पर अभी उनके पास वचन देने को कुछ नहीं था सो प्रवचन से ही काम चलाते बोले, हे भक्तो! ये माया बहुत ठगिनी है। पता नहीं ऐसा क्यों होता है कि जिस माया से हम अपने भक्तों को दूर रहने का अमर संदेश देते हैं,

एक दिन हम खुद ही उसी माया के बबुआ हो जाते हैं। कारावास आने के बाद पता चला कि ये मठ नश्व्र हैं, वे मठ नश्वुर हैं, सब मठ नश्वर हैं। भक्तों से ठगा माल एक न एक दिन चीखता हुआ सच कह ही देता है। इन मठों में रहते जिसके पास दिमाग न हो उसका भी दिमाग फिर जाता है।

जिसने भी लाइव रहने के लिए अपने मठ कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, जोड़ तोड़ चुराफुरा बनाए, वे एक न एक दिन ढहे जरूर। ऊपर से ये लाइव रहने की बीमारी! सबसे असाध्य बीमारी इस जगत में जीव को है तो बस लाइव रहने की बीमारी है। इस लाइवता के लिए वह क्या-क्या नहीं करता।

कितनी बार जीने का नाटक करते हुए नहीं मरता भक्तो! जिसे यह बीमारी एक बार घेर ले, उसे दूसरी बीमारी दबोचेगी तो क्या, उसके पास फटकती भी नहीं, या कि दूसरी बीमारी को वह अपने पास फटकने भी नहीं देती। भक्तो! जीव को चाहिए कि वह दूसरों के पाप्जिओं के चक्कर में न पड़े।

वह अपने को ही अपना पाप्जी समझे। बाहर के पाप्जिओं से सावधान रहे। वह यह मान कर चले कि उसके भीतर ही उसका पाप्जी निवास करता है, जो सत्य है, सनातन है। बाहर के पाप्जी कभी सनातन नहीं होते। अपने अंदर के पाप्जी ही सनातन हैं तो बाहर के पाप्जी मिथ्या।

बाहर के पाप्जिओं को भी चाहिए कि वे अपने ही बच्चों के पाप्जी बने रहें, बाहर के बच्चों का पाप्जी होने के लिए बेकार में हाथ पांव न मारें, दूसरों के अवैध पाप्जी बनकर पंगा न लें। दूसरों का पाप्जी बनने का पंगा आज तक जिस जिसने लिया है, उसका हर्ष आपके सामने है।

ये तो बिना दिमाग के भक्तों की महानता है कि उनके अंदर हो जाने के बाद भी अपने पाप्जिओं का जन्मदिन धूमधाम से मनाते रहे हैं। वैसे भक्तो! समाज की भलाई के लिए तो भगवान को भी कारावास जाना पड़ा था। मैं तो बस एक सिंपल सा पाप्जी हूं और ये तो कलियुग है।

यहां पर जनकल्याण के लिए पाप्जिओं के लिए तो कदम कदम पर कारावास बने हैं। कितना ही कदम फूंक-फूंककर कोई भी पाप्जी क्यों न रखे, कारावास में उसका कदम पड़ ही जाता है। कारावास में भी शायद प्रभु पाप्जी को कल्याण के लिए ही भेजता है।

न हम पाप्जी कारावास में आते और न ही हे भक्तो! तुम्हारा कल्याण होता। कारावास में विभिन्न जुर्मों की सजा काट रहे भक्तों ने उनके सुर के साथ अपना सुर मिलाते कहा तो तनिक रूक पाप्जी बोले,

तो अब पेश है आपके कल्याण के लिए मेरे द्वारा बनाई समाज कल्याणवाली फिल्म! भक्तों अब सभी अपना। अपना बचा खुला दिमाग बंद कर मौन धारण कर अपनी नजरें एलईडी पर लगाओ।


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