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आलोक पुराणिक का लेख : कृषि सुधार पर ठीक नहीं राजनीति

पंजाब के मुख्यमंत्री इस बात को जानते हैं, पर उन्हे संदेश देना है कि वो केंद्र सरकार के कृषि सुधारों के खिलाफ हैं। ऐसे संदेश दूसरे राज्यों की कांग्रेस सरकारें भी देने की तैयारी कर रही हैं। कुल मिलाकर राजनीतिक संदेश देने की तैयारियां जोरों पर हैं। किसानों के मुद्दों के असली हल क्या हैं, इस सवाल पर विमर्श फिलहाल स्थगित है। अर्थशास्त्र कानून से नहीं, नियमों से चलता है और नियम साफ है कि कृषि बाजारों में ग्राहकों की संख्या, ग्राहकों की गुणवत्ता बढ़ाई जाए।

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प्रतीकात्मक तस्वीर

आलोक पुराणिक

पंजाब विधानसभा से खेती से जुड़े कुछ विधेयक पारित किए हैं, जो सीधे तौर पर केंद्र सरकार के कृषि सुधारों के विपरीत खड़े दिखाई देते हैं। संविधान का कोई भी छात्र यह स्पष्ट कर सकता है कि पंजाब विधानसभा के ये विधेयक पूरे कानूनों की शक्ल कभी नहीं ले पाएंगे। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच संवैधानिक शक्तियों का विभाजन इस तरह का है, केंद्र ही भारी पड़ता है। पंजाब के मुख्यमंत्री इस बात को जानते हैं, पर उन्हे संदेश देना है कि वो केंद्र सरकार के कृषि सुधारों के खिलाफ हैं। इसी तरह के संदेश दूसरे राज्यों की कांग्रेस सरकारें भी देने की तैयारी कर रही हैं। कुल मिलाकर राजनीतिक संदेश देने की तैयारियां जोरों पर हैं। किसानों के मुद्दों के असली हल क्या हैं, इस सवाल पर विमर्श फिलहाल स्थगित है।

मूल अर्थशास्त्र के सिद्धांत सब पर लागू होते हैं, कृषि पर भी। किसी भी आइटम के दाम तब बढ़ते हैं जब उसके ग्राहकों की संख्या बढ़ती है, जब ज्यादा कीमत देने वाले ग्राहकों की संख्या बढ़ती है। आलू के भाव कई बार गिर जाते हैं, पर चिप्स के भाव नहीं गिरते, ब्रांडेड चिप्स के भाव नहीं गिरते। इसकी वजह है कि ब्रांडेड चिप्स के ग्राहक ज्यादा भाव देने को तैयार होते हैं। पर आलू के खरीदार, बड़े स्टाकिस्ट ज्यादा भाव देने से इनकार कर देते हैं और आलू का छोटा किसान स्टाक करने की वित्तीय हैसियत नहीं रखता, इसलिए वो सस्ते में माल बेचकर निकल लेता है। फिर हाहाकार होता है कि हाय किसान, किसान की हालत दयनीय। किसान की हालत दयनीय इसलिए है कि उसके उत्पादों के लिए बाजार कायदे का नहीं है। कृषि मंडियों की हालत किसी से छिपी नहीं है।साधारण सी बात समझी जा सकती है। कृषि मंडियों के आढ़तियों की संपन्नता लगातार बढ़ती जाती है, उन्हें माल बेचने वाले किसान लगातार दयनीय रहते हैं। बाजार ज्यादा होंगे, तो किसान के पास यह सुविधा होगी कि वह किसी को माल बेच ले। कृषि मंडियां भी चल रही हैं, कृषि मंडियों के बाहर भी माल बेचने की सुविधा होगी, तो ग्राहक को चार ग्राहक अतिरिक्त मिलेंगे। बाजारों का विस्तारीकरण होना चाहिए। अगर कृषि मंडी के आढ़ती अच्छे दाम और बेहतरीन व्यवस्थाएं किसानों को देते हैं, तो फिर किसान क्या बेवकूफ हैं कि अपना माल कृषि मंडी में न बेचकर मंडी के बाहर बेचेंगे।

हाल के कृषि सुधारों के बाद किसान को यह छूट है कि वो अपना माल मंडी के बाहर भी बेच सकता है। मंडी के बाहर बेहतर भाव मिलें, तो बाहर बेचे, मंडी के अंदर भाव बेहतर मिलें, तो मंडी के अंदर बेचे। मंडी के अंदर बेहतर भाव देने से किसने रोका है, पर अब किसान मंडी का बंधक नहीं है। बंधक ग्राहक विक्रेता को बहुत अच्छा लगता है और बंधक विक्रेता खरीदार को बहुत अच्छा लगता है। बाजार शक्तियां अपना काम करें, जो दाम बेहतर दे, वही माल खरीद ले। जैसा और बाजारों में होता है, पर कृषि उपजों के मामला संवेदनशील है, इसलिए पूरे तौर पर इन्हें बाजार शक्तियों के हवाले छोड़ दिया गया, तो कई गरीब लोगों को खाने की दिक्कत हो जाएगी, इसलिए राशन की दुकानें हैं। इन राशन की दुकानों पर खाद्यान्न की आपूर्ति सस्ती दरों पर हो, यह सरकार का जिम्मा है, पर जो लोग महंगी शिक्षा, महंगा मनोरंजन खरीद सकते हैं, वो लोग थोड़ा महंगा गेहूं और चावल भी खऱीद सकते हैं। किसानों को मिलने वाले भाव सस्ते हों और दुनिया जहान की चीजें महंगी हो जाएं, यह अर्थशास्त्र किसान पर भारी पड़ता है। किसान अपने आइटम उन्हें बेचे, जो सबसे ज्यादा कीमत दे। यह साधारण अर्थशास्त्र है और इसके लिए कृषि मंडियों के बाहर भी व्यवस्थाएं करनी होंगी। ज्यादा ग्राहक जुटाने होंगे। बड़े ग्राहक जुटाने होंगे। आईटीसी कंपनी अपने ब्रांड का आटा बनाती है और देश के कई हिस्सों में गेहूं खरीदती है। अगर यह कंपनी लगातार सिर्फ शोषण ही कर रही होती, तो इसके खिलाफ किसानों ने आवाज उठाई होती है। कोई कंपनी लगातार ठगी और शोषण से बाजार में नहीं टिक सकती है, इसलिए यह कहना कि कंपनियों के आते ही कृषि क्षेत्र में लूटपाट हो जाएगी गलत है। कंपनियां भी अच्छी बुरी होती हैं, कारोबारी भी अच्छे बुरे होते हैं। बाजार और कानून दोनों को ही अपने हिसाब से दंडित और पुरस्कृत करते हैं।

विमर्श इस बात पर हो कि किसान को ज्यादा से ज्यादा भाव कैसे मिलें और गरीब आदमी अनाज से महरूम न रहे, पर दिक्कत यह है कि हर दल को किसान-तारणहार दिखने की जल्दी है, इसलिए ठोस उपायों पर विमर्श नहीं हो पा रहा है। विस्तार से विमर्श इस बात पर होना चाहिए कि किस तरह से कंपनी माॅडल अपना किसान अपनी छोटी-छोटी कंपनियां खुद ही खड़ी कर लें। फार्मर्स प्रोड्यूसर्स आर्गनाइजेशन इस तरह का संगठन है। किसानों को इस तरह का संगठन बनाना चाहिए। कुछ संगठन इस तरह के बने हैं। संगठन बनाकर किसान ज्यादा बेहतर भाव ताव कर सकते हैं और फिर कृषि मंडियों का विकल्प तो खुला ही हुआ है। किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर फसल नहीं खऱीदी जा सकती, इस किस्म के कानून न्यूनतम मजदूरी कानून जैसे कानून हैं। न्यूनतम मजदूरी कानून की खुलकर धज्जियां उड़ती हैं , क्योंकि जब श्रम की आपूर्ति अधिक होती है और लेने वाले कम होते हैं, तो फिर जो भी रकम मजदूर को दी जाए, वह ले लेता है। अगर श्रमिकों की मांग ज्यादा होती है, तो अपने आप ही श्रमिकों की मजदूरी बढ़ जाती है।

इसी तरह से कानून बनाकर न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलवाना असंभव है। इसके लिए मांग बढ़ानी होगी। बाजार में ग्राहकों को बढ़ाना होगा, बाजार में बड़े ग्राहकों को बढ़ाना होगा। तब ही समस्या का पक्का हल निकलेगा। वरना तो एक और कानून बाजार में आ जाएगा, जिसका कोई भी अर्थ न होगा। अर्थशास्त्र कानून से नहीं चलता, वह अपने नियमों से चलता है और नियम बहुत साफ है कि कृषि बाजारों में ग्राहकों की संख्या, ग्राहकों की गुणवत्ता बढ़ाई जाए। जो भी ग्राहकों की संख्या बढ़ाने के कदमों का विरोध करे, उसे संदिग्ध ही माना जाना चाहिए।

केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को मिल बैठकर विमर्श करना चाहिए कि हालात में सुधार कैसे हो सकता है। आपसी झगड़ों से कुछ नहीं होगा, किसानों का भला तो बिलकुल ही नहीं होगी। संसद को एक विशेष सत्र का आयोजन सिर्फ कृषि अर्थव्यवस्था पर करना चाहिए, ताकि इससे जुड़े सारे पहलुओं पर रोशनी पड़ सके।

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