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राजकिशोर राजन की कविताएं

समकालीन, किउल नदी और बसमतिया बोली

राजकिशोर राजन की कविताएं
1. समकालीन
और जब कविता छप गयी
तो कवि पर मुसकायी
कि देख लो, जीभर के
चले थे घेरने, पूरे का पूरा
मगर इस बार भी
मैं तुम से छूट गयी
और तुम्हारी कलम भटक गयी
तुमने तो किया था, भगीरथ प्रयास
पर अपने गाँव की उस भूली-बिसरी नदी को
और वह दोस्त तुम्हारा जो पढ़ता था, गाँव के स्कूल में
कक्षा एक से लेकर पाँचवी तक
वही, जो, पके अमरूद और फरेन जामुन खिलातार हा
दोपहर में तुम्हें तोड़ कर
और बाद में पकड़ लिया हल की मूँठ
पता नहीं कब बूढ़ा हुआ, कैसे मर गया उसी को तुम भूल गए
बीच-बीचमें देखते रहे
अपने कवि मित्रों का मुख
करते रहे याद
अपनी आदरणीय आलोचकों की सीख
जो छूट गया, उसे छोड़ दिये
जो सामने दिखा उसे धर लिये
तुम्हें तो यह भी पता नहीं
जैसे-जैसे तुम से छूट रहे हैं सभी, वह नदी, वे दोस्त
छूट रही है, तुम्हारी कविता भी तुमसे
इस बार कवि मुसकाया
और कहा कि
तुम्हारी सोच समकालीन नहीं है।
2. किउल नदी
किउल नदी
मई का महीना है और नदी लेटी है खाट पर
इसलिए नहींकि, वह जाग रहीहै कब से
कि अब उसे आ रही नींद
नदी की बस, चल रही सांस
बरसात के भरोसे
भैसें ढूंढ़ रही दोपहर में
लोटने के लिए कीचड़-पानी
जबकि धोने भर को पांव
पानी नहीं उसमें
ऐसेमें, दोपहर की चिनगिन धूप में
एक बच्चा कब से कररहा
बंसी ले मछलियों को फंसाने की कोशिश
और नदी, पडे़-पडे़ खाट पर गली जा रही है।
3. बसमतिया बोली
बस मतिया बोली
बस मतिया बोली, सुनो कवि जी!
कविता में तनिक माटी भी मिलाओ
बहुत हुई शब्दों की खेती
शब्द हो गये ऊसर
अब अपने अंतःपुर से बहर
हम्मर गाँव में आओ
उनको अच्छा लगे कला फिल्म
जिनका पेट भरा है
कला फिल्म ही जिनका जीवन
उन्हें वह कथा मत सुनाओ
बसमतिया बोली, सुनो कवि जी!
कविता को
‘आईस-पाईस’ का खेल मत बनाओ
हम भी पढ़ें, अपनी कविता
उसे अईसा बनाओ।
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