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युवा कवि विपिन शर्मा अनहद की कविताएं

मोबाइल युग में प्रेम, प्रेम में डूबी स्त्री, पत्नी का विस्थापन

युवा कवि विपिन शर्मा अनहद की कविताएं

मोबाइल युग में प्रेम

खुशी भी नहीं ठहरती ज्यादा समय और गम का समन्दर भी
अक्सर जब फोन बताता है/ नम्बर अभी व्यस्त है
फोन पर आने वाली सुमधुर आवाज जिस नम्बर पर आप बात करना चाहते है
वह अभी दूसरे व्यक्ति से बात कर रहा है
फोन पर बने रहे, अथवा कुछ समय बाद संपर्क करें
प्रेम के गहन संबंधों में/ फोन जहाँ आपको जोड़ता है
वही असुरक्षा से भी भर देता है
पाना चाहते हैं खुद के लिये निपट स्पेस
जहां बसा सके प्रेम की दुनिया
मगर आप कहां जानते हैं/कोई भेदिया घात
लगाये करता रहता है आपको रिप्लेस
आप एक या दो बार पूछते है फोन
व्यस्त होने का सबब
फिर संबंध बिखरने के डर से तान लेते है धुन्नी चुप्पी.../और बस हो जाते है
निपट अकेले/लाख मान मनोबल के बाद एक दूरी बना ही देता है
फोन/स्वतन्त्रता और निज अस्मित्ता के युग में भी/ चाहता है इंसान कुछ
निजता अपने लिए और गहन अहसास भी/ विज्ञापन कितने भी कहें दूरियों का मतलब फांसले नहीं/ मगर प्रेम में फांसले दूरियाँ बना ही देते हैं
फिर याद आते है कबीर, मीरा, गालिब
प्रेम का फलसफा समझाते /
मगर सोचते हैं आप प्रेम बचा कहाँ है
फिल्मों, गानों में फेसबुक अथवा टिवीटर पर/ जब फ्लर्ट करने को प्रेम और
धूर्तता को प्रैक्टिकल होने का जामा पहना दिया गया हो/ऐसे समय में क्या प्रेम
प्रेम में डूबी स्त्री
प्रेम में डूबी स्त्री धरती का श्रृंगार है
वह उम्मीद है/पतझड़ में जर्द पड़ चुके मौसम की/रेत से भरी धरती का/वह लहलहाता समन्दर है/
वह कर सकती है/कुछ भी/फूल-पत्ते से रंग चुराकर/मटमैले और घूसर रंगा में
उत्पन्न कर सकती है चमक किसी सड़क चलते बच्चे को गोद में उठाकर जमा सकती है
उसकी पीठ पर चपत/ बेबात पर खिल खिला सकती है घंटो/
चुन सकती है सरसों के फूल खेतों से किताब में अपने प्रेमी के चित्र को छिपाने के लिये
मुँह बिचकाकर नकार सकती है/हर उस बाधा को/जो बनी हुई है उसके और उनके बीच जर्मन की दीवार
जब उदास होती है प्रेम में डूबी स्त्री/ तब हो जाती है वह पहाड़ी शाम सी/बिल्कुल तन्हा/
चाँद भी निभाता है/उससे अनबोला रिश्ता/चाहता है/फैलाये कुछ और रोशनी उसके चेहर पर/और कह उठता है
प्रेमी के गम में डूबी स्त्री है/दुनिया की सबसे खूबसूरत पोर्टेट/जिस पर कोई भी रंग/नहीं ठहरता ज्यादा देर तक।
पत्नी का विस्थापन
पत्नी होती है हल्दी से सने हाथ
आटा गूंथते- गूंथते माथे पर पड़ी बालों की लट पर
आटे के निशान लगायेभूल जाती है गार्नियर लैक्मे, रोज परफ्यूम और बस याद रखती हैं नून, तेल, लकड़ी के प्रबन्ध
प्रेमिकाएँ होती हैं/कमनीय, कोमल बलखाती नदी सी चंचल/इठलाती दरिया सी फेनिल
उनके बिछुड़ने पर रोते हैं उनके प्रेमी जार-जार/बिछुड़ने पर बन जाती हैं वह और भी ज्यादा दर्दीली
बस उस ख्याल की तरह जिसे केवल जेहन में लाया जा सकता है
पाना मुश्किल
क्या प्रेम में चूकने पर ही कोई भी स्त्री बस बन जाती है पत्नी
क्या पत्नी होना प्रत्येक स्त्री की नियति है?
कुछ भी मानों प्रेमिकाओं ने पत्नियों के खिलाफ षड़यंत्र कर उन्हें हाशिये पर धकेल दिया है
कविता-कहानी, किस्से गजलों में भी छायी है प्रेमिकाएँ पत्नी का निश्छल समर्पण जगह नहीं पाता
मित्रों यह सनसनी का युग है जो दिखता है वो बिकता है कोई नासमझ पत्नियों को समझाये
समर्पण, अहसास, संवेदनाएँ/किसी चमचमाते चेहरे के सामने फैड हो जाती हैं
उर्सुला, लैडी चेटर्लीज, हीर-सोहनी, पारो चंद्रमुखी/ये सब नाम हैं जो चुपके-चुपके मुस्कुराते है
आपस में बहनापा बनाके/नील दमयंती-सीता, सावित्री अथवा किसी आमफहम औरत को रिप्लेस करते जाते हैं।
खैर प्रेमिकाओं के भी अपने दर्द हैं उदास और गमगीन रहना
अन्यथा ताउम्र तालमेल बिठाने में जिंदगी लगा देना/ यह बहुत जरुरी है कि
रुद्ध, क्रूद्ध हताश पत्नियाँ एकमेव होकर प्रेम के विरुद्ध जाते समय को
मिलकर जात-पात, धर्म, क्षेत्र के तमाम वैचारिक टकरावों के बावजूद...
वह रह सकें खिली-खिली, महकी सुबह की उजास की मानिन्द
ना दिखे वह चूल्हे की बुझी राख सी
क्योंकि प्रेमिका होना प्रत्येक स्त्री का अधिकार है/बिल्कुल ऐसे ही जैसे तोड़ देना घुटन के बंधनों को
ताकि यह सनद रहे कि पत्नी होना ही/ स्त्री की एकमात्र परिणति नहीं है।
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