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पीएम मोदी और अमित शाह की जोड़ी- जानें कैसे विपक्ष की कमर तोड़ी

अब शाह को सरकार में अपनी क्षमता स्थापित करनी हैं। उनके सामने कश्मीर प्रमुख चुनौती है। धारा 35-ए और 370 पर विश्वसनीयता प्रमाणित करनी है।

पीएम मोदी और अमित शाह की जोड़ी- जानें कैसे विपक्ष की कमर तोड़ी
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यह स्वीकार करने में किसी को हर्ज नहीं होगा कि अमित शाह इस समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बाद भारत के दूसरे सबसे शक्तिशाली राजनीतिक व्यक्तित्व हैं। गृहमंत्री होने के साथ वो पार्टी अध्यक्ष भ्ाी हैं। प्रधानमंत्री ने आठ समितियां गठित कीं और सबमें अमित शाह हैं। छह समितियों में तो गहमंत्री होने के नाते उन्हें रहना ही था। लेकिन आर्थिक और रोजगार पर जो दो समितियां बनीं उनमें भी वे शामिल किए गए। गृहमंत्री होने के नाते सीसीएस यानी सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति में वे है हीं।

कहने के लिए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह अभी नरेन्द्र मोदी के बाद दूसरे स्थान पर हैं, लेकिन व्यवहार में अमित शाह की स्थिति दूसरे नंबर की है। उनकी हैसियत का अंदाजा इसी से लगाइए कि जब उन्होंने जम्मू कश्मीर और आंतरिक सुरक्षा की बैठक ली तो उसमें वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, रेल मंत्री पीयूष गोयल, तेल एवं प्राकृतिक गैस मंत्री देवेन्द्र प्रधान जैसे कद्दावर मंत्री तथा सरकार के अनेक विभागों के बड़े अधिकारी उपस्थित थे।

उसके बाद पार्टी पदाधिकारियों की उपस्थिति में यह सर्वसम्मत निर्णय था कि इस वर्ष के विधानसभा चुनावों तक वही अध्यक्ष रहें। माना जा रहा है कि वो 2022 तक अध्यक्ष रह सकते हैं। उनके सहयोग के लिए तत्काल जे पी नड्डा को कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया गया है। भाजपा के इतिहास में कोई एक व्यक्ति कभी इतना शक्तिशाली नहीं रहा। लालकृष्ण आडवाणी भी नहीं जो अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार में दूसरे नंबर पर थे। प्रश्न है कि अमित शाह को सामान्य प्रक्रिया के तहत सरकार में लाया गया है या इसके पीछे दूरगामी सोच है?

सामान्य सोच के तहत अभी उनको सरकार में लाने का कोई कारण नहीं था। इस वर्ष झारखंड, हरियाणा एवं महाराष्ट्र, अगले वर्ष बिहार तथा 2021 के पश्चिम बंगाल चुनाव तक तो उनको अध्यक्ष के रुप सरकार से मुक्त रखना स्वाभाविक माना जा रहा था। ऐसे समय नरेन्द्र मोदी ने उनको मंत्रिमंडल में लाकर इतना महत्वपूर्ण बना दिया तो इसके पीछे निश्चित दूरगामी सोच है। पार्टी में उन्होंने जितना परिश्रम किया है उनसे पूरे देश के नेताओं-कार्यकर्ताआंें से उनका व्यापक संपर्क हो चुका है।

भाजपा को शाह ने भले पूर्णतया कैडर आधारित सख्त विचारधारा की पार्टी में परिणत नहीं किया, लेकिन मोदी के वरदहस्त से कुंद हो चुकी धार को पैना अवश्य किया है। उन्होंने यह संदेश दिया कि सरकार अपनी सीमाओं में रहे, लेकिन पार्टी उस सीमा को मानने के लिए बाध्य नहीं है। लंबे अंतराल के बाद अध्यक्ष ने रामजन्मभूमि, धारा 35 ए, धारा 370, बंगालदेशी घुसपैठियों सहित हिन्दुत्व से जुड़े पहलुओं पर खुलकर बोलना शुरू किया। इससे पूरी पार्टी की लंबे समय से कायम जड़ता टूटी।

1992 के बाद भाजपा के कार्यक्रमों में जय श्रीराम का नारा गूंजने लगा। आज पश्चिम बंगाल में जय श्रीराम कार्यकर्ताओं को तृणमूल से टकराने का प्रमुख नारा बना है। यह नारा कार्यकर्ताओं में विशेष रोमांच पैदा करता है। केरल में सबरीमाला आंदोलन शाह के कारण ही इतना प्रचंड हुआ। हालांकि उसका लाभ कांग्रेस को मिल गया, क्योंकि सरकार इस पर अध्यादेश न ला सकी। किंतु केरल में शाह ने पार्टी मंे नई जान फूंक दिया है। वाजपेयी व आडवाणी के उत्तर कार्यकाल में विचारधारा पर क्षमायाचक की मुद्रा से पार्टी बाहर आ चुकी है।

इस समय पार्टी में उनको चुनौती देने वाला या विरोध करने वाला कोई नहीं है। संघ ने इस पर विचार किया हो या नहीं, लेकिन संघ ने भी देखा है कि अध्यक्ष बनने के बाद अमित शाह ने किस तरह संगठन को सशक्त करने में पूरा समय लगा दिया। वे लगातार यात्राएं करते रहे, कार्यक्रम देते रहे। जिससे पार्टी कार्यकर्ता लगातार सक्रिय रहे। वस्तुतः पार्टी को सक्रिय राजनीतिक मशीनरी में बदलने की उनकी सफलता असंदिग्ध है।

सरकार के रहते ऐसा करना कठिन होता है, क्योंकि सरकार से कार्यकर्ताओं की अनेक अपेक्षाएं होतीं हैं जिनको पूरा करना संभव नहीं होता। शाह ने संघ परिवार के सभी घटकों के साथ संवाद बनाए रखकर वैसे अंतर्विरोध की स्थिति पैदा नहीं होने दी जैसी वाजपेयी सरकार के समय हुई। उस दौरान परिवार के घटक ही सड़कों पर आंदोलन कर रहे थे। यहां तक कि संघ भी सरकार के खिलाफ बयान देने लगा था। मोदी के पांच साल के कार्यकाल में ऐसा नहीं हुआ तो उसमें शाह की प्रमुख भूमिका है।

अब शाह को सरकार में अपनी क्षमता स्थापित करनी हैं। उनके सामने कश्मीर प्रमुख चुनौती है। धारा 35-ए और 370 पर विश्वसनीयता प्रमाणित करनी है। रामजन्मभूमि का जटिल विवाद भी है। अगर उन्होंने सफलता प्राप्त कर ली तो वे सर्वस्वीकृत नेता बन जाएंगे।

वास्तव में नरेन्द्र मोदी सरकार का नेतृत्व करने वाले व्यक्तित्व के रुप में उनको स्थापित करने की ओर बढ़ चुके हैं। उनको पता है कि विस चुनावों में प. बंगाल को छोड़कर चुनौती नहीं मिलने वाली। जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं वहां विपक्ष कमजोर है।

संगठन के लिए भी मोदी और शाह ऐसे लोगों को चिन्हित कर अपने अनुसार तैयार करने की कोशिश पहले से कर रहे हैं। संगठन एवं सरकार दोनों में योग्य उत्तराधिकारी तैयार करने में सफल हो गए तो मोदी ऐसा कर देंगे जो भाजपा तो क्या भारत की किसी पार्टी में कोई नेता न कर सका।

लेखक : अवधेश कुमार

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