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जाधव केस: पाक के पास विकल्प कम

भारत ने 17 बार पाकिस्तान से जाधव तक भारतीय उच्चायोग के अधिकारियों को जाने की अनुमति मांगी, लेकिन पाकिस्तान अपने रुख से टस से मस नहीं हुआ।

जाधव केस: पाक के पास विकल्प कम

जिस दिन यह खबर आई कि हेग स्थित इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस यानी अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने पाकिस्तान को भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव की फांसी पर रोक लगाने को कहा तो पूरे देश में खुशियों की लहर दौड़ गई। पहली नजर में यह स्वाभाविक था। आखिर हमारा एक निर्दोष नागरिक वहां की सैन्य अदालत के फैसले के कारण फांसी पर लटकाए जाने के मुहाने पर खड़ा है।

पूरे देश की भावना है कि उसे किसी तरह बचाया जाए। उसमें ऐसा लगा जैसे यह फैसला देश की इस भावना को मूर्त रूप दे सकता है, किन्तु एक खबर यह है कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के मामले को मानने से इंकार कर सकता है। पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में अपनी दलीलें रखी हैं लेकिन पाकिस्तानी मीडिया की खबरों में सरकारी सूत्रों के हवाले से यह साफ लग रहा है कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के फैसले की अनसुनी करने की सीमा तक जा सकता है।

पाकिस्तान के एटर्नी जनरल का एक बयान चारों ओर प्रकाशित प्रसारित हुआ है कि इस मामले से पाकिस्तान की राष्ट्रीय स्थिरता का मुद्दा जुड़ा है लिहाजा इस मामले में पाक अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के न्यायक्षेत्र को मंजूर नहीं कर सकता। सवाल है कि अगर पाकिस्तान वाकई ऐसा करता है तो फिर क्या होगा जैसा हम जानते हैं पाक के सैनिक न्यायालय ने जाधव को जासूसी आतंकवाद जातीय दंगा भड़काने और देश विरोधी गतिविधियों के आरोप में फांसी की सजा सुनाई है।

पाकिस्तान का आरोप है कि जाधव भारत की विदेशी खुफिया एजेंसी रॉ का जासूस है जो उसके यहां बलूचिस्तान से लेकर सिंध तक विघटनकारी गतिविधियों को अंजाम दे रहा था और इसके लिए उसने टीम भी बनाई थी। हालांकि सैन्य न्यायालय के फैसले की कॉपी भारत को नहीं मिली है और न ही उसे किसी तरह सार्वजनिक किया गया है। इसलिए किन आधारों पर उसे फंासी की सजा मिली है यह हमें नहीं पता।

भारत ने अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत पाकिस्तान से फैसले की कॉपी मांगी थी जिसे नहीं दिया गया। यहां तक कि सामान्य नियम के तहत किसी दूसरे देश का नागरिक यदि कहीं गिरफ्तार होता है तो *उस देश के दूतावास को इसकी सूचना दी जाती है। मुकदमे की भी जानकारी दी जाती है। उस व्यक्ति तक दूतावास की पहुंच होती है। पाकिस्तान ने ऐसा कुछ नहीं किया।

भारत ने कुल 17 बार पाकिस्तान से जाधव तक भारतीय उच्चायोग के अधिकारियों को जाने की अनुमति मांगी लेकिन पाकिस्तान अपने रुख से टस से मस नहीं हुआ। यह व्यवहार हर दृष्टि से आपत्तिजनक था किंतु भारत के सामने तत्काल कोई चारा नहीं था। जैसे ही कुलभूषण जाधव की गिरफ्तारी की सूचना आई, भारत ने उसकी छानबीन कर यह स्पष्ट किया कि वह हमारा नागरिक है तथा नौसेना का सेवानिवृत्त अधिकारी है।

भारत ने उसकी पूरी जानकारी सामने रखी जिसमें ईरान से उसके व्यापार करने का भी जिक्र है। भारत को उम्मीद थी कि ऐसा करने से पाकिस्तान को अहसास होगा कि उसने शायद गलती से किसी निर्दोष नागरिक को पकड़ लिया है और उसे छोड़ देगा। किंतु पाकिस्तान ने भारत की सारी सूचनाओं को नजरअंदाज करते हुए *उस पर सैन्य न्यायालय में मुकदमा चलाया और सजा सुना दी गई।

भारत का स्पष्ट मानना है और यही सच है कि कुलभूषण जाधव ईरान से व्यापार करता है जहां से उसे या तो किसी तरह फंसाया गया या फिर उसका अपहरण किया गया। हम पाकिस्तान के इस आरोप से सहमत नहीं है कि उसे 3 मार्च 2016 को बलूचिस्तान से पकड़ा गया। हालांकि अफगानिस्तान के खुफिया सूत्रों का मानना है कि उसे किसी आतंकवादी गुट ने पकड़ा और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई को सौंप दिया।

चूंकि भारत कभी भी किसी सूरत में आतंकवाद का समर्थन नहीं करता तो फिर प्रायोजित करने का कोई कारण ही नहीं है। पाकिस्तान के आतंकवाद के जवाब में भारत ने कभी न ऐसा किया और न करेगा। इसलिए पूरा देश इस बात को लेकर आश्वस्त है कि हमारा कोई नागरिक पाकिस्तान में आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ाने के काम में लग ही नहीं सकता।

लेकिन चूंकि पाकिस्तान मान नहीं रहा तो फिर भारत के पास पहला मान्य विकल्प यही था कि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में जाए। वहां भारत की तरफ से जाने माने वकील हरीश साल्वे ने 8 मई को याचिका दायर की। भारत ने कुलभूषण जाधव के अपहरण किए जाने से लेकर भारतीय राजनयिकांें को उससे न मिलने देने सहित पाकिस्तान द्वारा अंतरराष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन का पूरा मामला सिलसिलेवार ढंग से रखा।

इसके साथ भारत की ओर से न्यायालय से कई अपील की गई। मसलन भारत के पक्ष को जांचने से पहले जाधव की फांसी पर रोक लगाई जाए। दो, फांसी की सजा निलंबित की जाए। तीन, सजा को अंतरराष्ट्रीय कानून और वियना कन्वेन्शन का उल्लंघन घोषित किया जाए। चार, सजा पर अमल से पाक को रोकें और पाक कानून के तहत ही उसे रद करवाया जाए।

भारत की अपील यह भी है कि अगर पाक सजा रद नहीं करता है तो इसे अंतरराष्ट्रीय कानून और मानव अधिकार का उल्लंघन घोषित किया जाए। भारत की यह याचिका स्वीकार होनी ही थी। याचिका को स्वीकार करते हुए अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने पाकिस्तान को पत्र लिखकर कहा कि सरकार तय करे कि जाधव को फांसी न हो। दूसरे सरकार जो भी कदम उठाए उसकी जानकारी हमें दे और ऐसा कदम न उठाए जो जाधव के अधिकारों का हनन करे।

भारत और पाकिस्तान दोनों ही 1960 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का हिस्सा बने। जब दोनों देशों ने वियना समझौते पर हस्ताक्षर किए तो वे अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के न्यायक्षेत्र में आ गए। किंतु जैसा हम जानते हैं अगर कोई देश इसके फैसले को नहीं मानता तो फिर इसके पास उसे मनवाने की ताकत नहीं है। अभी चीन दक्षिण चीन सागर पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के फैसले को मानने को तैयार नहीं है।

कई देश उसे चेतावनी दे रहे हैं पर वह दक्षिण चीन सागर पर स्वामित्व के अपने दावे से पीछे नहीं हट रहा। लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय किसी देश को अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघनकर्ता तथा संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्वीकृत मानवाधिकारों का पालन न करने वाला घोषित कर देता है तो फिर उसे अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में अलग-थलग किया जा सकता है।

उसके खिलाफ सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव पारित कर कार्रवाई भी की जा सकती है। चीन सुरक्षा परिषद का सदस्य है और वह पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा हो सकता है। तो फिर भारत के पास चारा क्या है अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का फैसला अगर पाकिस्तान ने नहीं माना तो भारत को अपनी ताकत पर ही भरोसा करना होगा।

क्या अपने देश के एक निर्दोष नागरिक को बचाने के लिए भारत कोई प्रत्यक्ष कार्रवाई करेगा या पाकिस्तान ने जाधव को फंासी चढ़ा दिया तो यह सदेश देेने के लिए कि भारत अपने किसी नागरिक की हत्या को यूं ही नहीं जाने देता पाकिस्तान के साथ कुछ ऐसा करेगा ताकि आगे से कोई देश भारतीय नागरिकों को छूने से पहले सौ बार सोचे। अभी शायद यह प्रश्न बहुत लोगों को प्रासंगिक न लग रहा होए लेकिन फैसले की घड़ी आ रही है।

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