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प्रभात कुमार रॉय का लेख : अंतरद्वंद्वों में उलझा नेपाल

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने गत दिसंबर माह में संसद को अचानक भंग करने और नेपाल में अप्रैल के अंत सप्ताह में मध्यावधि चुनाव आयोजित कराने की अनुशंसा राष्ट्रपति के समक्ष पेश कर दी। प्रधानमंत्री की अनुशंसा को स्वीकर करके नेपाल की राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी ने संसद को भंग कर दिया। पुष्पकमल दहल प्रचंड और केपी शर्मा ओली दोनों नेताओं के बीच 2017 में एक समझौता हुआ था, समझौते के मुताबिक संसद के आधे-आधे कार्यकाल में क्रमशः नेपाल के प्रधानमंत्री रहेंगे,लेकिन ओली ने पहले ही संसद को भंग करवा दिया। इससे जगजाहिर हो गया है कि नेपाल गहन राजनीतिक अंतरद्वंदों में उलझा हुआ है।

प्रभात कुमार रॉय का लेख : अंतरद्वंद्वों में उलझा नेपाल
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प्रभात कुमार रॉय

नेपाल आजकल गहन राजनीतिक अंतरद्वंदों में उलझा हुआ है। नेपाल के प्रधानमंत्री खड़ग प्रसाद शर्मा उर्फ केपी शर्मा ओली ने विगत 20 दिसंबर को नेपाल की संसद को अचानक भंग करने और नेपाल में अप्रैल के अंत सप्ताह में मध्यावधि चुनाव आयोजित कराने की अनुशंसा राष्ट्रपति के समक्ष पेश कर दी। प्रधानमंत्री की अनुशंसा को बाकायदा स्वीकर करके नेपाल की राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी ने संसद को भंग कर दिया और मध्यावधि चुनाव कराने का शासकीय हुक्म जारी कर दिया। वर्ष 2018 के संसदीय चुनाव में नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी को आम चुनाव में दो तिहाई बहुमत हासिल हुआ और 27 फरवरी 2018 को केपी शर्मा ओली की सरकार सत्तासीन हुई। ओली सरकार का अभी और तीन वर्ष का कार्यकाल शेष था। ऐसा क्या घटित हो गया कि संसदीय चुनाव में दो तिहाई बहुमत प्राप्त करने वाली नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी जबरदस्त तौर पर आंतरिक द्वंदों में उलझ गई। यहां तक कि उसके प्रधानमंत्री को संसद भंग करके मध्यावधि चुनाव करने की नौबत आ गई।

दरअसल नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी का निर्माण वर्ष 2017 में वस्तुतः एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवाद पार्टी और माओवादी सेंटर पार्टी के परस्पर विलय से संपन्न हुआ था। माओवादी सेंटर के सर्वोच्च नेता पुष्पकमल दहल प्रचंड थे और एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवाद पार्टी के नेता थे केपी शर्मा ओली। दोनों कम्युनिस्ट नेताओं के मध्य एक समझौता हुआ था, समझौते के मुताबिक संसद के आधे-आधे कार्यकाल में क्रमशः नेपाल के प्रधानमंत्री रहेंगे। केपी शर्मा ओली को तकरीबन आठ महीनों के बाद प्रचंड के लिए प्रधानमंत्री पद का परित्याग करना था और प्रंचड को देश के प्रधानमंत्री पद पर विराजमान होना था। समझौते के मुताबिक यह संभव हो पाता, इससे कहीं पहले केपी शर्मा ओली ने संसद को भंग करके मध्यावधि चुनाव के लिए अनुशंसा कर दी। नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर जारी रहा आंतरिक सत्ता संघर्ष अब जगजाहिर हो गया है और आखिरकार नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के दो फाड़ होते हुए स्पष्ट तौर पर नजर आने लगी हैं। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के दोनों गुटों के मध्य सुलह कराने का भरसक प्रयास किया, जो कि अभी तक नाकाम सिद्ध हुआ है। नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के प्रचंड गुट ने संसद को प्रधानमंत्री द्वारा यकायक भंग करने के विरुद्ध नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे पर दस्तक दी। सर्वोच्च न्यायालय संसद भंग करने के संवैधानिक प्रश्न पर अंततः क्या फैसला देता है, यह तो वक्त ही बताएगा, किंतु बेवक्त नेपाल को मध्यावधि चुनाव में झोंक देने की पूरी कोशिश नेपाल के प्रधानमंत्री ने अंजाम दे दी है।

नेपाल सदैव से ही भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ोसी देश रहा है। दोनों देशों के मध्य सदियों पुराने प्रगाढ़ सांस्कृतिक और धार्मिक संबंधों की दीर्घ दास्तान है। आजकल करीब सवा करोड़ नेपाली भारत के विभिन्न इलाकों में कार्य करते हैं। भारत के भी करीब पचास लाख लोग नेपाल में कार्यरत हैं। दोनों देशों के मध्य तकरीबन दो हजार किलोमीटर लंबी खुली सरहद विद्यमान है। राजशाही के अंत के तत्पश्चात लोकतांत्रिक नेपाल के नए संविधान के तहत वर्ष 2015 में जब पहली दफा केपी शर्मा ओली नेपाल के प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए तो उसी वर्ष के प्रारम्भ में संपूर्ण नेपाल को मधेशी आंदोलन द्वारा नाफ़िज किया गया। नेपाल में सदियों से निवास करने वाले मधेशी जनमानस मूलतः भारतवंशी है। संसद में नेपाल में हिमालय की तराई में विद्यमान मधेशी क्षेत्र को अधिक सीटें प्रदान करने के लिए मधेशी आंदोलन संचालित किया गया था।

उल्लेखनीय है कि नेपाल में मधेशियों की आबादी नेपाल की कुल आबादी का तीस प्रतिशत है। अर्थात तीन करोड़ नेपालियों में करीब 90 लाख मधेशी नेपाल में निवास करते हैं। नेपाल को तकरीबन 80 फीसदी माल भारत से निर्यात किया जाता रहा है, जिसका मधेशियों ने ब्लॉकेड किया। उस वक्त नेपाल में यह प्रबल धारणा बनी कि मधेशी आंदोलन और ब्लॉकेड को भारत सरकार द्वारा समर्थन दिया जा रहा है। चीन की हुकूमत को सुअवसर हासिल हो गया कि वह नेपाल में आवश्यक सामान पहुंचा सकें। यह वह प्रस्थान बिंदु है जहां से कि नेपाल और भारत के मध्य कटुताएं बढ़नी शुरू हुईं। केपी शर्मा ओली की सरकार वर्ष 2017 में गिर गई, क्योंकि प्रचंड की माओवादी सेंटर पार्टी ने ओली सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। फिर कुछ ऐसा घटनाक्रम चला कि दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों ने एकजुट होकर नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी का निर्माण किया और वर्ष 2018 के संसदीय चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी को दो तिहाई सीटें हासिल हो गई। ओली सरकार ने वर्ष 2019 में भारत के कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा क्षेत्रों पर नेपाल की दावेदारी पेश कर दी। इन इलाकों पर बाकायदा दावेदारी पेश करते हुए ओली सरकार ने नेपाल का एक नया मानचित्र संसद से पारित करा लिया। ओली सरकार के दौर में नेपाल का स्पष्ट झुकाव चीन की तरफ दृष्टिगोचर हुआ और निश्चित रूप से ओली सरकार का रवैया खुले तौर भारत विरोधी प्रतीत हुआ।

चीनी हुकूमत नेपाल में बहुत बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश करके नेपाल को ठीक उसी तरह से अपने प्रभाव क्षेत्र में लाना चाहती है जैसा कि उसने पाकिस्तान, म्यांमार और श्रीलंका में किया है। स्टिंग ऑफ पर्ल्स कुटिल कूटनीति के तहत चीन भारत को रणनीतिक तौर पर चारों तरफ से घेरने की पुरजोर कोशिश कर रहा है। नेपाल क्योंकि भारत का अत्यंत निकट भ्राता देश रहा है, अतः नेपाल को भारत विरोधी बनाने में चीन कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहा है। भारत को कूटनीतिक संबंधों में नेपाल को अहम स्थान देना होगा और जो भी गलतफहमियां दोनों देशों में उत्पन्न हो गई हैं, उनको यथाशीघ्र खत्म करना होगा, ताकि चीन को भारत और नेपाल के मध्य दरार पैदा करने का कोई अवसर प्राप्त न हो जाए। नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता वस्तुतः बेहद गरीब नेपाल के लिए सबसे अधिक दुखदायी स्थिति रही है। तकरीबन दस वर्षों तक तो माओवादियों द्वारा संचालित गुरिल्ला गृहयुद्ध में नेपाल फंसा रहा। माओवादी गुरिल्लाओं के आत्मसमर्पण के तत्पश्चात आखिर नेपाल में शांति कायम हुई, किंतु राजनीतिक अस्थिरता का कदाचित अंत नहीं हो सका और विगत दस वर्ष में ही नेपाल वस्तुतः नौ प्रधानमंत्रियों की सरकारों का दीदार कर चुका है। बार-बार आम चुनावों का आयोजन होना भी गरीब देश नेपाल पर एक आर्थिक बोझ बन जाता है। नेपाल का लोकतंत्र अभी शैशव काल में है। प्रबल आशा है कि नेपाल का लोकतंत्र भविष्य में अधिक शक्तिशाली होकर उभरेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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