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अवधेश कुमार का लेख: अस्पतालों का इलाज जरूरी

स्वास्थ्य व्यवस्था को मरीजों के प्रति उचित चिकित्सीय और मानवीय व्यवहार के योग्य बनाना है। केंद्र और राज्य सरकारें यानी दिल्ली और महाराष्ट्र को सहयोग करते हुए सबसे पहले सारे सरकारी अस्पतालांें का प्रशासन वर्तमान प्रबंधन से छीनकर अपने हाथ मंें लेना चाहिए। दूसरे, सारे बड़े निजी अस्पताल, जो जनता की मुफ्त जमीन पर बने हैं उनको एक निश्चित समय के लिए अधिग्रहित किया जाना चाहिए। ये दो कदम सबसे पहले आवश्यक हैं।

अवधेश कुमार का लेख: अस्पतालों का इलाज जरूरी
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इस कटु सच को स्वीकार करने में हमने काफी देर कर दी कि देश में सबसे उत्तम और सक्षम कहे जाने वाला राजधानी दिल्ली का स्वास्थ्य ढांचा स्वयं अनेक गंभीर रोगों का शिकार है। गृहमंत्री अमित शाह को आगे आकर अस्पताल का औचक निरीक्षण करना पड़ रहा है। दिल्ली अर्धकेन्द्रशासित प्रदेश है तो यह संभव भी हुआ। अन्य राज्यों में तो कर भी नहीं सकते। अमित शाह को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल सहित अन्य संबंधित मंत्रियों, अधिकारियों, केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन तथा नगर निगमों के मेयरों के साथ बैठक करनी पड़ी। इसमें कई बड़े फैसले हुए। दिल्ली के बाहर से चार अधिकारियों को तथा केन्द्र के दो अधिकारियों को लगा दिया गया है। कोरोना संक्रमण से लड़ने के लिए सभी सुविधाओं से लैस आठ हजार बेड वाले 500 रेलवे कोच दिल्ली को मिल चुके हैं। निजी अस्पतालों के बारे में भी कुछ निर्णय हुए हैं जिनमें इनकी घोषित दर से 60 प्रतिशत कम राशि पर बेड उपलब्ध कराना शामिल है। टेस्ट की संख्या बढ़ाने तथा घर-घर जाकर टेस्ट करने की भी शुरुआत हो गई है।

छोटे अस्पतालों के लिए कोविड 19 के लिए सही जानकारी और दिशानिर्देश प्रदान करने के लिए एम्स के वरिष्ठ डॉक्टरों की समिति गठित हुई है। केंद्रीय स्वास्थ्य विभाग, दिल्ली स्वास्थ्य विभाग, एम्स और तीन नगर निगमों की एक संयुक्त टीम राजधानी के सभी अस्पतालों का दौरा कर बीमारी से लड़ने के लिए तैयारियों का निरीक्षण करेगी और रिपोर्ट तैयार करेगी। इससे दिल्लीवासियों का दिल्ली में रहने वालों के अलग-अलग राज्यों में परिवारों और रिश्तेदारों का भय थोड़ा कम हुआ होगा, जीवन को लेकर उम्मीद जगी होगी। प्रश्न है कि क्या इतना पर्याप्त है या इसके अलावा भी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है?

इसका सीधा उत्तर है कि प्रयास और कदम दोनों स्वागतयोग्य हैं, लेकिन दिल्ली के विफल साबित हो चुके स्वास्थ्य ढांचे को वर्तमान संकटों और चुनौतियों से मुकाबले के लिए सक्षम बनाने की दृष्टि से ये बिल्कुल पर्याप्त नहीं हैं। दिल्ली के साथ हमें देश की वित्तीय राजधानी मानी जाने वाली मुंबई के बारे में भी इसी तरह विचार करना चाहिए जहां स्वास्थ्य महकमा ही लगता है कोविड 19 का शिकार है। भविष्य के कदमों पर विचार करने से पहले हमंे कुछ डरावने यथार्थ को स्वीकार करना पड़ेगा। एक, दिल्ली और मुंबई या महाराष्ट्र के सरकारी और निजी स्वास्थ्य महकमे ने कोविड 19 के प्रति स्वास्थ्य सेवाओं की अपनी जिम्मेवारी तो छोड़िए, आम संवेदनशीलता, मनुष्यता और इंसानियत का भी व्यवहार नहीं किया है। दूसरे, केंद्र सरकार की अपीलों, मार्ग-निर्देशों के साथ राज्य सरकारों के आदेशों और दिशानिर्देशों तक को इन्होंने काफी हद तक ताक पर रख दिया है। तीसरे, निजी अस्पतालों ने मनमाने तरीके से इस अवसर को अधिकतम कमाई का जरिया बना लिया है। इन्होंने मान लिया है कि इनके उपर किसी का आदेश नहीं चलेगा। चौथे, मृतकों के शवों तक का जैसा अपमान अस्पतालों में हो रहा है उसकी हम आप कल्पना तक नहीं कर सकते। इन सबके अलावा हम यह क्यों नहीं सोचते कि कोविड 19 के अलावा अन्य प्रकार की बीमारियों के मरीजों के साथ क्या हो रहा है? आखिर कोविड के जितने मरीज हैं उससे कई गुणा ज्यादा हर जगह दूसरी बीमारियों के हैं जिनमें अनेक गंभीर, आपात या फिर गहन चिकित्सा या सर्जरी तक की आवश्यकता वाले हैं। जब तक केन्द्र एवं राज्य सरकारें इन सबका एक साथ विचार नहीं करती व्यवस्था आम व्यक्ति के लिए मारक बना रहेगा तो क्या किया जाए?

मरे हुए संवेदनहीन और लूटेरी स्वास्थ्य व्यवस्था को मरीजों के प्रति उचित चिकित्सीय और मानवीय व्यवहार के योग्य बनाना है। केन्द्र और राज्य सरकारें यानी दिल्ली और महाराष्ट्र को सहयोग करते हुए सबसे पहले सारे सरकारी अस्पतालांें का प्रशासन वर्तमान प्रबंधन से छीनकर अपने हाथ मंें लेना चाहिए। दूसरे, सारे निजी बड़े अस्पताल, जो जनता की मुफ्त जमीन पर बने हैं उनको एक निश्चित समय के लिए अधिगृहित किया जाना चाहिए। ये दो कदम सबसे पहले आवश्यक हैं। आपातस्थिति मानकर सरकार में बैठे अधिकारियों को अस्पतालांे का प्रशासन सौंपा जाए। इसके साथ हर अस्पताल में कोताही बरतने की जांच हो तथा दोषी पाए जाने वालों पर मुकदमा दर्ज कर गिरफ्तार किया जाए। आखिर जिस अस्पताल में चार-चार दिनों तक मरीजों को इलाज नहीं मिला और वे मर गए या जिनमें शवों को सड़के पर मरे कुत्ते-बिल्लियों की तरह उठाकर कूड़े की पेटियों में रख दिया गया या जहां है वहीं छोड़ दिया गया उनमें दोषियों को सजा तो मिलनी चाहिए। सबकी जिम्मेवारी तय हो ताकि पालन न होने की अवस्था में उन्हें दंडित किया जाए।

निजी अस्पताल अपील और मार्गनिर्देश से रास्ते पर नहीं आने वाले। गृहमंत्री ने एम्स के डॉ पॉल की अध्यक्षता में एक समिति बनाई है, जो निजी अस्पतालों में कोविड के मरीजों के लिए बेड 60 प्रतिशत कम दर पर उपलब्ध कराने के लिए एक रिपोर्ट तैयार करेगी। यह समिति कोरोना मरीजों के इलाज और जांच के संदर्भ में एक रिपोर्ट तैयार करेगी। क्या सरकार को सच पता नहीं है? सारे अस्पतालों का स्टिंग सामने आ चुका है जिसमें वे लिखते कुछ हैं और मांगते कुछ। कुछ बड़े अस्पतालों ने तो बाजाब्ता मोटी रकम की सूची तक टांग दिया है। उनमें जांच की क्या जरुरत है? आज की हालत में आप कुछ भी कर लंे निजी बड़े अस्पताल बिना मोटी रकम के आपको स्वीकार ही नहीं करते। इन अस्पतालांें का दायित्व अगर सेना के उच्चाधिकारी को सौंप दिया जाए तो वर्तमान समय के लिए बेहतर हो। सरकारी अस्पतालों की तरह ही निजी अस्पतालों के कुकृत्यों की जांच के लिए उच्चाधिकारी समिति गठित हो। उनसेे मरीजों से लूटे गए धन वापस लिए जाएं।

यहीं पर गैर कोविड मरीजों की चर्चा आवश्यक है। आखिर यह कौन सी वैज्ञानिकता है कि जिस किसी को भी बुखार है उसे किसी अस्पताल या जांच घर में प्रवेश ही नहीं करने दिया जाए? डॉक्टर ऐसे मरीज को देखना तो दूर अप्वाइंटमेंट रद्द कर दें? बुखार अनेक कारणों से होते हैं। कोई सुनने वाला नहीं। इससे संबंधित दिशानिर्देश तुरत जारी हो। अगर किसी के शरीर का तापमान बढ़ा मिले तो उसे वापस करने की जगह बिठाने का निश्चित स्थान बनाए जाए जहां सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए डॉक्टरों की टीम बीमारी का उपचार आरंभ करे। इस समय तो आपको यदि पेट का कोई बड़ा टेस्ट कराना है तो अस्पतालों ने कोविड टेस्ट अनिवार्य कर दिया है और उसमें पीपीई किट से लेकर कई प्रकार के शुल्क वसूलते हैं। इस पर रोक लगे। निजी क्लिनिक वाले डॉक्टरों के लिए भी इस संबंध में साफ आदेश जारी किए जाएं। न जाने इन चार महीनों में कितने दूसरी बीमारी से ग्रस्त लोग सही इलाज के अभाव में चल बसे और कितने कहां कराहते-छटपटाते पड़े होंगे।

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