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प्रमोद जोशी का लेख : राष्ट्रीय एकता का सूत्र तिरंगा

सच है कि भारत विविधताओं का देश है। आजादी के काफी पहले अंग्रेज गवर्नर जनरल सर जॉन स्ट्रेची ने कहा था, ‘भारतवर्ष न कभी राष्ट्र था, और न है, और न उसमें यूरोपीय विचारों के अनुसार किसी प्रकार की भौगोलिक, राजनीतिक, सामाजिक अथवा धार्मिक एकता है।’ यूरोप के कुछ विद्वान मानते हैं कि भारतवर्ष एक राजनीतिक नाम नहीं, एक भौगोलिक नाम है जिस प्रकार यूरोप या अफ़्रीका। इन विचारों और नजरियों को तोड़ते हुए ही भारत में राष्ट्रवाद का उदय और विकास हुआ, जिसका प्रतीक हमारा राष्ट्रीय-ध्वज है। अनेकता में एकता ही भारत की पहचान है।

प्रमोद जोशी का लेख : राष्ट्रीय एकता का सूत्र तिरंगा
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प्रमोद जोशी 

प्रमोद जोशी

कल आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ और 76वां स्वतंत्रता दिवस है। यह साल हम आज़ादी के अमृत महोत्सव के रूप में मना रहे हैं। इस साल केंद्र सरकार ने हर-घर तिरंगा अभियान की शुरुआत भी की है। 11 से 17 अगस्त के बीच यह अभियान चलाया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 जुलाई को इस अभियान की घोषणा की थी। इस अभियान के तहत 13 से 15 अगस्त तक घरों पर कम से कम 20 करोड़ झंडे लगाने का लक्ष्य भी है। झंडे लगाएं, पर राष्ट्रीय-ध्वजों की अवधारणा, अपने ध्वज के इतिहास, उससे जुड़े प्रतीकों और सबसे ज्यादा ध्वजारोहण से जुड़े नियमों को भी समझें। तभी इसकी उपादेयता है।

राष्ट्रीय-भावना

फिराक गोरखपुरी की पंक्ति है, 'सरज़मीने हिन्द पर अक़वामे आलम के फ़िराक़/काफ़िले बसते गए हिन्दोस्तां बनता गया।' भारत को उसकी विविधता और विशालता में ही पारिभाषित किया जा सकता है, पर चुनावी राजनीति ने हमारे सामाजिक जीवन की इस विविधता को जोड़ने के बजाय तोड़ा भी है। पिछले कुछ वर्षों से भारतीय राष्ट्र-राज्य को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। इस साल फरवरी में संसद में कहा कि भारत राष्ट्र नहीं, राज्यों का संघ है। ऐसा कहने के पीछे उनकी मंशा क्या थी पता नहीं, पर इतना स्पष्ट है कि राजनीतिक कारणों से हमारे अंतर्विरोधों को खुलकर खोला जा रहा है। भारत की अवधारणा पर हमलों को भी समझने की जरूरत है। सच है कि भारत विविधताओं का देश है। आजादी के काफी पहले अंग्रेज गवर्नर जनरल सर जॉन स्ट्रेची ने कहा था, 'भारतवर्ष न कभी राष्ट्र था, और न है, और न उसमें यूरोपीय विचारों के अनुसार किसी प्रकार की भौगोलिक, राजनीतिक, सामाजिक अथवा धार्मिक एकता है।' यूरोप के कुछ विद्वान मानते हैं कि भारतवर्ष एक राजनीतिक नाम नहीं, भौगोलिक नाम है जिस प्रकार यूरोप या अफ़्रीका। इन विचारों और नजरियों को तोड़ते हुए ही भारत में राष्ट्रवाद का उदय और विकास हुआ, जिसका प्रतीक हमारा राष्ट्रीय-ध्वज है। अनेकता में एकता ही भारत की पहचान है, जिसे यूरोपीय-दृष्टि से समझा नहीं जा सकता।

राष्ट्रवाद का इतिहास

राष्ट्रीय-एकता को स्थापित करता है राष्ट्रीय-ध्वज। इसके विकास का लंबा इतिहास है। आपने महाभारत के युद्ध का विवरण पढ़ते समय रथों पर फहराती ध्वजाओं का विवरण भी पढ़ा होगा। देशों और राज-व्यवस्थाओं के विकास के साथ राज्य के प्रतीकों का विकास हुआ, जिनमें राष्ट्रीय-ध्वज सबसे महत्वपूर्ण हैं। यह ध्वज राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान विकसित, हुआ है। 1857 के पहले स्वतंत्रता-संग्राम के सेनानियों ने एक ध्वज की योजना बनाई थी। आंदोलन असमय ही समाप्त हो गया और उसके साथ ही वह योजना अधूरी रह गई।

ध्वज का विकास

1904 में स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता ने एक ध्वज का चित्र बनाया। 7 अगस्त 1906 को ग्रीन पार्क, कोलकाता में इसे कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया। इस ध्वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था। ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे और नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बनाए गए थे। बीच की पीली पट्टी पर वंदेमातरम लिखा गया था। मैडम भीकाजी कामा ने अगस्त 1907 में, जर्मनी के शहर स्टटगार्ट में दूसरी सोशलिस्ट कांग्रेस के अधिवेशन स्थल पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया। यह विदेशी धरती पर फहराया जाने वाला पहला भारतीय ध्वज था। इसे भारत की स्वतंत्रता का ध्वज नाम दिया गया। यह ध्वज भी पहले के समान था, सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपर की पट्टी पर केवल एक कमल था, किंतु सात तारे सप्तऋषियों को दर्शाते थे। 1917 में एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने होमरूल लीग आंदोलन के दौरान एक और ध्वज को फहराया। इसमें 5 लाल और 4 हरी क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के प्रतीक सात सितारे बने थे। ऊपरी किनारे पर यूनियन जैक और एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था। महात्मा गांधी ने 1921 में कांग्रेस के अपने झंडे की बात की थी। इस झंडे को पिंगली वेंकैया ने डिजाइन किया था। इसमें दो रंग थे लाल और हरा। बीच में एक चरखा था। बाद में इसमें सफेद रंग भी जोड़ा गया। 22 जुलाई, 1947 को संविधान सभा ने राष्ट्रध्वज को संशोधित किया। इसमें चरखे की जगह अशोक चक्र ने ली और लाल की जगह केसरिया रंग ने। 1951 में भारतीय मानक ब्यूरो ने पहली बार राष्ट्रध्वज के लिए कुछ नियम तय किए।

पहला ध्वजारोहण

भारतीय संविधान सभा ने 22 जुलाई 1947 को राष्ट्रीय ध्वज को स्वीकार किया। 14-15 अगस्त की रात में संसद भवन के सेंट्रल हॉल में तिरंगा फहराया गया। इसी कार्यक्रम में 72 महिलाओं के एक समूह का नेतृत्व करते हुए स्वतंत्रता सेनानी हंसा मेहता ने यह राष्ट्रीय ध्वज संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेन्द्र प्रसाद को भेंट किया। 15 अगस्त की भोर में इसे वायसराय हाउस या वर्तमान राष्ट्रपति भवन के शिखर पर भी फहराया गया। एक जानकारी यह भी मिलती है कि 16 अगस्त 1947 को सुबह साढ़े आठ बजे तब के पीएम जवाहर लाल नेहरू ने लाल किले के प्राचीर पर ध्वजारोहण किया था। 14 अगस्त 1947 की शाम को ही वायसराय हाउस के ऊपर से यूनियन जैक को उतार लिया गया था। इस यूनियन जैक को आज इंग्लैंड के हैम्पशर में नॉर्मन ऐबी ऑफ रोमसी में देखा जा सकता है। 15 अगस्त 1947 को सुबह छह बजे राष्ट्रीय ध्वज को सलामी दिए जाने का कार्यक्रम था। इसमें पहले यूनियन जैक को उतारा जाना था, लेकिन लॉर्ड माउंटबेटन और पंडित नेहरू के विमर्श से कार्यक्रम में कुछ बदलाव कर दिया गया।

पिंगली वेंकैया

पिंगली वैंकैया को भारत के राष्ट्रीय ध्वज का अभिकल्पक माना जा सकता है। उनका जन्म 2 अगस्त 1876, को वर्तमान आंध्र प्रदेश के मछलीपत्तनम के निकट भटलापेनुमारु नामक स्थान पर हुआ था। 1921 में विजयवाड़ा में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में वेंकैया ने भारत का खुद का राष्ट्रीय ध्वज होने की आवश्यकता पर बल दिया। उनका यह विचार गांधी जी को बहुत पसंद आया। 1931 में कांग्रेस ने कराची के सम्मेलन में केसरिया, सफ़ेद और हरे तीन रंगों व चरखे से बने इस ध्वज को मंजूर किया। बाद में चरखे की जगह अशोक चक्र ने ली।

ध्वज-संहिता

भारतीय राष्ट्रीय-ध्वज का प्रदर्शन, फहराना और उपयोग भारतीय ध्वज-संहिता, 2002 और राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के तहत आता है। इस संहिता को 26 जनवरी 2002 से लागू किया गया। 2002 से पहले आम लोगों को सिर्फ स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराने की छूट थी। 26 जनवरी 2002 को इंडियन फ्लैग-कोड में संशोधन किया गया, जिसके बाद अब कोई भी नागरिक किसी भी दिन झंडा फहरा सकता है। 20 जुलाई, 2022 को एक आदेश के जरिए इस कोड में भी संशोधन किया गया है। पहले तिरंगे को केवल सूर्योदय से सूर्यास्त तक फहराने की अनुमति थी। अब रात में भी फहरा सकते हैं। यह ध्यान रखना होगा कि ध्वज का पोल लंबा हो और झंडा भी चमके। पहले राष्ट्रीय-ध्वज खादी के ही हो सकते थे, पर अब पॉलिएस्टर और मशीन से बने राष्ट्रीय ध्वज का भी उपयोग किया जा सकता है।

ध्वजारोहण का अधिकार

गृह मंत्रालय ने उद्योगपति सांसद नवीन जिंदल द्वारा इस सम्बन्ध में रखे गए एक प्रस्ताव के बाद यह फैसला किया। इससे पहले जिंदल ने हर नागरिक के मूलभूत अधिकार के तौर पर तिरंगा फहराने के लिहाज से अदालती लड़ाई जीती थी। जिंदल ने जून 2009 में मंत्रालय को दिए गए प्रस्ताव में बड़े आकार के राष्ट्रीय ध्वज को स्मारकों के पोलों पर रात में भी फहराए जाने की अनुमति मांगी थी। ध्वजारोहण के सिलसिले में इन बातों का ध्यान रखना चाहिए। झंडे को कभी जमीन पर नहीं रखा जा सकता। आधा झुकाकर नहीं फहराया जाएगा सिवाय उन मौकों के जब सरकारी इमारतों पर झंडे को आधा झुकाकर फहराने के आदेश जारी किए गए हों। उसे पानी में नहीं डुबोया जा सकता। झंडे के किसी भाग को जलाने, नुकसान पहुंचाने के अलावा मौखिक या शाब्दिक तौर पर इसका अपमान करने पर तीन साल तक की जेल या जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं। व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं कर सकते। तिरंगे की यूनिफॉर्म बनाकर पहनना गलत है। झंडे पर कोई अक्षर नहीं लिखे जाएंगे। खास मौकों पर झंडा फहराए जाने से पहले उसमें फूलों की पंखुड़ियां रखने में आपत्ति नहीं है।

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