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पढ़िए मुंशी प्रेमचंद की कहानी ''यही मेरा वतन''

आज पूरे साठ बरस के बाद मुझे अपने वतन, प्यारे वतन का दर्शन फिर नसीब हुआ।

पढ़िए मुंशी प्रेमचंद की कहानी
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भले ही रोजी-रोटी और बेहतर जीवन, सुख-सुविधाओं की तलाश में हम परदेस चले जाएं लेकिन अपने देश, अपनी मातृभूमि की मिट्टी, यहां के लोगों से जुड़ाव कभी नहीं टूटता। रह-रहकर अपने वतन से मिलने की हूक उठती ही है। करीब साठ बरस बाद अपने देश लौटे एक बुजुर्ग के मन के भावों को उकेरती एक क्लासिक कहानी।
आज पूरे साठ बरस के बाद मुझे अपने वतन, प्यारे वतन का दर्शन फिर नसीब हुआ। जिस वक़्त मैं अपने प्यारे देश से विदा हुआ और किस्मत मुझे पच्छिम की तरफ ले चली, मेरी उठती जवानी थी। मेरी रगों में ताजा खून दौड़ता था और सीना उमंगों और बड़े-बड़े इरादों से भरा हुआ था। मुझे प्यारे हिंदुस्तान से किसी जालिम की सख्तियों और इंसाफ के जबर्दस्त हाथों ने अलग नहीं किया था। नहीं, जालिम का जुल्म और कानून की सख्तियां मुझसे जो चाहें करा सकती हैं मगर मेरा वतन मुझसे नहीं छुड़ा सकतीं। यह मेरे बुलंद इरादे और बड़े-बड़े मंसूबे थे, जिन्होंने मुझे देश निकाला दिया। मैंने अमरीका में खूब व्यापार किया, खूब दौलत कमाई और खूब ऐश किए। भाग्य से बीवी भी ऐसी पाई, जो अपने रूप में बेजोड़ थी, जिसकी खूबसूरती की चर्चा सारे अमेरिका में फैली हुई थी और जिसके दिल में किसी ऐसे खयाल की गुंजाइश भी न थी, जिसका मुझसे संबंध न हो। मैं उस पर दिलोजान से न्यौछावर था और वह मेरे लिए सब कुछ थी। मेरे पांच बेटे हुए, सुंदर,हृष्ट-पुष्ट और नेक, जिन्होंने व्यापार को और भी चमकाया और जिनके भी, नन्हे बच्चे उस वक़्त मेरी गोद में बैठे हुए थे, जब मैंने प्यारी मातृभूमि का अंतिम दर्शन करने के लिए कदम उठाया। मैंने बेशुमार दौलत, वफादार बीवी, सपूत बेटे और प्यारे-प्यारे जिगर के टुकड़े, ऐसी-ऐसी अनमोल नेमतें छोड़ दीं। इसलिए कि प्यारी भारत माता का दर्शन कर लूं। मैं बहुत बुड्ढा हो गया था। दस और हों तो पूरे सौ बरस का हो जाऊं, और अब अगर मेरे दिल में कोई आरजू बाकी है तो यही कि अपने देश की खाक में मिल जाऊं। यह आरजू कुछ आज ही मेरे मन में पैदा नहीं हुई है, उस वक्त भी थी, जब कि मेरी बीवी अपनी मीठी बातों और नाजुक अदाओं से मेरा दिल खुश किया करती थी। जब मेरे नौजवान बेटे सबेरे आकर अपने बूढ़े बाप को अदब से सलाम करते थे, उस वक़्त भी मेरे जिगर में एक कांटा-सा खटकता था और वह कांटा यह था कि मैं यहां अपने देश से निर्वासित हूं। यह देश मेरा नहीं है, मैं इस देश का नहीं हूं। धन मेरा था, बीवी मेरी थी, लड़के मेरे थे और जायदादें मेरी थीं, मगर जाने क्यों मुझे रह रहकर अपनी मातृभूमि के टूटे-फूटे झोंपड़े, चार छ: बीघा मौरूसी जमीन और बचपन के लंगोटिया यारों की याद सताया करती थी और अकसर खुशियों की धूमधाम में भी यह खयाल चुटकी लिया करता कि काश अपने देश में होता!
मगर जिस वक़्त बंबई में जहाज से उतरा और काले कोट-पतलून पहने, टूटी-फूटी अंगे्रजी बोलते मल्लाह देखे, फिर अंगे्रजी दुकानें, ट्रामवे और मोटर-गाडिय़ां नजर आर्इं, फिर रबड़वाले पहियों और मुंह में चुरुट दाबे आदमियों से मुठ•ोड़ हुई, फिर रेल का स्टेशन, और रेल पर सवार होकर अपने गांव को चला, प्यारे गांव को जो हरी-भरी पहाड़िय़ों के बीच में आबाद था, तो मेरी आंखों में आंसू भर आए। मैं खूब रोया, क्योंकि यह मेरा प्यारा देश न था, यह वह देश न था जिसके दर्शन की लालसा हमेशा मेरे दिल में लहरें लिया करती थीं। यह कोई और देश था। यह अमेरिका था, इंग्लिस्तान था मगर प्यारा भारत नहीं।
रेलगाड़ी जंगलों, पहाडों, नदियों और मैदानों को पार करके मेरे प्यारे गांव के पास पहुंची जो किसी जमाने में फूल-पत्तों की बहुतायत और नदी-नालों की प्रचुरता में स्वर्ग से होड़ करता था। मैं गाड़ी से उतरा तो मेरा दिल बांसों उछल रहा था,-अब अपना प्यारा घर देखूंगा, अपने बचपन के प्यारे साथियों से मिलूंगा। मुझे उस वक़्त यह बिल्कुल याद न रहा कि मैं नब्बे बरस का बूढ़ा आदमी हं। ज्यों-ज्यों मैं गांव के पास पहुंचता था, मेरे कदम जल्द-जल्द उठते थे और दिल में एक ऐसी खुशी लहरें मार रही थी, जिसे बयान नहीं किया जा सकता। हर चीज पर आंखें फाड़-फाड़कर निगाह डालता-अहा, यह वो नाला है, जिसमें हम रोज घोड़े नहलाते और खुद गोते लगाते थे, मगर अब इसके दोनों तरफ कांटेदार तारों की चहारदीवारी खिंची हुई थी और सामने एक बंगला था जिसमें दो-तीन अंग्रेज बंदूकें लिए इधर-उधर ताक रहे थे। नाले में नहाने या नहलाने की सख्त मनाही थी। गांव में गया और आंखें बचपन के साथियों को ढंूढ़ने लगीं मगर अफसोस वह सब के सब मौत का निवाला बन चुके थे और मेरा टूटा-फूटा झोंपड़ा, जिसकी गोद में बरसों तक खेला था, जहां बचपन और बेफिक्रियों के मजे लूटे थे, जिसका नक्शा अभी तक आंखों में फिर रहा है, वह अब एक मिट्टी का ढेर बन गया था। जगह गैर-आबाद न थी। सैंकड़ों आदमी चलते-फिरते नजर आए, जो अदालत और कलक्टरी और थाने-पुलिस की बातें कर रहे थे। उनके चेहरे बेजान और फिक्र में डूबे हुए थे और वह सब दुनिया की परेशानियों से टूटे हुए मालूम होते थे। मेरे साथियों के से हृष्ट-पुष्ट सुंदर, गोरे-चिट््टे नौजवान कहीं न दिखाई दिए। वह अखाड़ा जिसकी मेरे हाथों ने बुनियाद डाली थी, वहां अब एक टूटा-फूटा स्कूल था और उसमें गिनती के बीमार शक्ल-सूरत के बच्चे जिनके चेहरों पर भूख लिखी थी, चिथड़े लगाए बैठे ऊंघ रहे थे। नहीं, यह मेरा देश नहीं है। यह देश देखने के लिए मैं इतनी दूर से नहीं आया। यह कोई और देश है, मेरा प्यारा देश नहीं है।
उस बरगद के पेड़ की तरफ दौड़ा, जिसकी सुहानी छाया में हमने बचपन के मजे लूटे थे, जो हमारे बचपन का हिंडोला और जवानी की आरामगाह था। इस प्यारे बरगद को देखते ही रोना-सा आने लगा और ऐसी हसरतभरी, तड़पाने वाली और दर्दनाक यादें ताजी हो गर्इं कि घंटों जमीन पर बैठकर रोता रहा। यही प्यारा बरगद है, जिसकी फुनगियों पर हम चढ़ जाते थे, जिसकी जटाएं हमारा झूला थीं और जिसके फल हमें सारी दुनिया की मिठाइयों से ज्यादा मजेदार और मीठे मालूम होते थे। वह मेरे गले में बांहें डालकर खेलने वाले हमजोली जो कभी रूठते थे, कभी मनाते थे, वह कहां गए? आह, मैं बेघर-बार मुसाफिर क्या अब अकेला हंू? क्या मेरा कोर्ई साथी नहीं। इस बरगद के पास अब थाना और पेड़ के नीचे एक कुर्सी पर कोई लाल पगड़ी बांधे बैठा हुआ था। उसके आस-पास दस-बीस और लाल पगड़ीवाले हाथ बांधे खड़े थे और एक अधनंगा अकाल का मारा आदमी जिस पर अभी-अभी चाबुकों की बौछार हुई थी, पड़ा सिसक रहा था। मुझे खयाल आया, यह मेरा प्यारा देश नहीं है, यह कोई और देश है, यह योरप है, अमेरिका है, मगर मेरा प्यारा देश नहीं है, हरगिज नहीं।
इधर से निराश होकर मैं उस चौपाल की ओर चला, जहां शाम को पिताजी गांव के और बड़े-बूढ़ों के साथ हुक्का पीते और हंसी-दिल्लगी करते थे। हम भी उस टाट पर कलाबाजियां खाया करते। कभी-कभी वहां पंचायत भी बैठती थी, जिसके सरपंच हमेशा पिताजी ही होते थे। इसी-चौपाल से लगी हुई एक गौशाला थी, जहां गांव भर की गाएं रक्खी जाती थीं और हम यहीं बछड़ों के साथ कुलेलें किया करते थे। अफसोस, अब इस चौपाल का पता न था। वहां अब गांव के टीका लगाने का स्टेशन और एक डाकखाना था। उन दिनों इसी चौपाल से लगा हुआ एक कोल्हाड़ा था जहां जाड़े के दिनों मे ईख पेरी जाती थी और गुड़ की महक से दिमाग तर हो जाता था। हम और हमारे हमजोली घंटों गंडेरियों के इंतजार में बैठे रहते थे और गंडेरियां काटने वाले मजदूरो के हाथों की तेजी पर अचरज करते थे, जहां सैकड़ों बार मैंने कच्चा रस और पक्का दूध मिलाकर पिया था। यहां आस-पास के घरों से औरतें और बच्चे अपने-अपने घड़े लेकर आते और उन्हें रस से भरवाकर ले जाते। अफसोस, वह कोल्हू अभी ज्यों के त्यों गड़े हुए हैं मगर देखो, कोल्हाड़े की जगह पर अब एक सन लपेटने वाली मशीन है और उसके सामने एक तंबोली और सिगरेट की दूकान है। इन दिल को छलनी करने वाले दृश्यों से दुखी होकर मैंने एक आदमी से जो सूरत से शरीफ नजर आता था, कहा, ‘बाबा, मैं परदेशी मुसाफिर हूं, रात भर पड़े रहने के लिए मुझे जगह दे दो।’ इस आदमी ने मुझे सर से पैर तक घूरकर देखा और बोला, ‘आगे जाओ, यहां जगह नहीं है।’ मैं आगे गया और यहां से फिर हुक्म मिला-आगे जाओ। पांचवीं बार सवाल करने पर एक साहब ने मुट्ठी भर चने मेरे हाथ पर रख दिए। चने मेरे हाथ से छूटकर गिर पड़े और आंखों से आंसू बहने लगे। हाय, यह मेरा प्यारा देश नहीं है, यह कोई और देश है। यह हमारा मेहमान और मुसाफिर की आवभगत करने वाला प्यारा देश नहीं, हरगिज नहीं।
मैंने एक सिगरेट की डिबिया ली और एक सुनसान जगह पर बैठकर बीते दिनों की याद करने लगा कि यकायक मुझे उस धर्मशाला का खयाल आया, जो मेरे परदेश जाते वक्त बन रहा था। मैं उधर की तरफ लपका कि रात किसी तरह वहीं काटंू, मगर अफसोस, हाय अफसोस, धर्मशाला की इमारत ज्यों की त्यों थी, लेकिन उसमें गरीब मुसाफिरों के रहने के लिए जगह न थी। शराब और शराबखोरी, जुआ और बदचलनी का वहां अड्डा था। यह हालत देखकर बरबस दिल से एक ठंडी आह निकली, मैं जोर से चीख उठा, ‘नहीं-नहीं और हजार बार नहीं यह मेरा वतन, मेरा प्यारा देश, मेरा प्यारा भारत नहीं है। यह कोई और देश है। यह योरप है, अमेरिका है, मगर भारत हरिगज नहीं।’
अंधेरी रात थी। गीदड़ और कुत्ते अपने राग अलाप रहे थे। मैं दर्दभरा दिल लिए उसी नाले के किनारे जाकर बैठ गया और सोचने लगा कि अब क्या करूं? क्या फिर अपने प्यारे बच्चों के पास लौट जाऊं और अपनी नामुराद मिट्टी अमेरिका की खाक में मिलाऊं? अब तो मेरा कोई वतन न था, पहले मैं वतन से अलग जरूर था मगर प्यारे वतन की याद दिल में बनी हुई थी। अब बेवतन हूं, मेरा कोई वतन नहीं। इसी सोच-विचार में बहुत देर तक चुपचाप घुटनों में सिर दिए बैठा रहा। रात आंखों ही आंखों में कट गई, घड़िय़ाल ने तीन बजाए और किसी के गाने की आवाज कानों मे आई। दिल ने गुदगुदाया, यह तो वतन का नग्मा है, अपने देश का राग है। मैं झट उठ खड़ा हुआ। क्या देखता हूं कि पंद्रह-बीस औरतें, बूढ़ी, कमजोर, सफेद धोतियां पहने, हाथों में लोटे लिए स्नान को जा रही हैं और गाती जाती हैं, ‘प्रभु, मेरे अवगुन चित न धरो’
इस तड़पा देने वाले राग से मेरे दिल की जो हालत हुई उसका बयान करना, मुश्किल है। मैंने अमेरिका की चंचल से चंचल, हंसमुख से हंसमुख सुंदरियों की अलाप सुनी थी और उनकी जबानों से मुहब्बत और प्यार के बोल सुने थे जो मोहक गीतों से भी ज्यादा मीठे थे। मैंने प्यारे बच्चों के अधूरे बोलों और तोतली बानी का आनंद उठाया था। मैंने सुरीली चिड़िय़ों का चहचहाना सुना था। मगर जो लुत्फ, जो मजा, जो आनंद मुझे इस गीत में आया वह जिंदगी में कभी और हासिल न हुआ था। मैंने खुद गुनगुनाना शुरू किया, प्रभु, मेरे अवगुन चित न धरो
तन्मय हो रहा था कि फिर मुझे बहुत से आदमियों की बोल-चाल सुनाई पड़ी और कुछ लोग हाथों में पीतल के कमंडल लिए शिव-शिव, हर-हर गंगे गंगे, नारायण-नारायण कहते हुए दिखाई दिये। मेरे दिल ने, फिर गुद-गुदाया, यह तो मेरे देश प्यारे देश की बातें हैं। मारे खुशी के दिल बाग-बाग हो गया । मैं इन आदमियों के साथ हो लिया और एक दो तीन चार पांच छ: मील पहाड़ी रास्ता पार करने के बाद हम उस नदी के किनारे पहुंचे जिसका नाम पवित्र है, जिसकी लहरों में डुबकी लगाना और जिसकी गोद में मरना हर हिंदू सबसे बड़ा पुण्य समझता है। गंगा मेरे प्यारे गांव से छ: सात मील पर बहती थी और किसी जमाने में सुबह के वक्त घोड़े पर चढ़कर गंगा माता के दर्शन को आया करता था। उनके दर्शन की कामना मेरे दिल में हमेशा थी। यहां मैंने हजारों आदमियों को इस सर्द, ठिठुरते हुए पानी में डुबकी लगाते देखा। कुछ लोग बालू पर बैठे गायत्री मंत्र जप रहे थे। कुछ लोग हवन करने में लगे हुए थे। कुछ लोग माथे पर टीके लगा रहे थे। कुछ और लोग वेदमंत्र सस्वर पढ़ रहे थे। मेरे दिल ने फिर गुदगुदाया और मैं जोर से कह उठा, ‘हां-हां, यही मेरा देश है, यही मेरा प्यारा वतन है, यही मेरा भारत है। और इसी के दर्शन की, इसी की मिट्टी में मिल जाने की आरजू मेरे दिल में थी।
मैं खुशी में पागल हो रहा था। मैंने अपना पुराना कोट और पतलून उतार फेंका और जाकर गंगा माता की गोद में गिर पड़ा, जैसे कोई नासमझ, भोला-भाला बच्चा दिन भर पराए लोगों के साथ रहने के बाद शाम को अपनी प्यारी मां की गोद में दौड़कर चला आए, उसकी छाती से चिपट जाए। हां, अब अपने देश में हूं। यह मेरा प्यारा वतन है, यह लोग मेरे भाई , गंगा मेरी माता है।
मैंने ठीक गंगाजी के किनारे एक छोटी सी झोंपड़ी बनवा ली है और अब मुझे सिवाय रामनाम जपने के और कोई काम नहीं। मैं रोज शाम-सबेरे गंगा-स्नान करता हूं और यह मेरी लालसा है कि इसी जगह मेरा दम निकले और मेरी अस्थियां गंगा माता की लहरों की भेंट चढ़ें। मेरे लड़के और मेरी बीवी मुझे बार-बार बुलाते हैं, मगर अब मैं यह गंगा का किनारा और यह प्यारा देश छोड़कर वहां नहीं जा सकता। मैं अपनी मिट्टी गंगाजी को सौंपूंगा। अब दुनिया की कोई इच्छा, कोई आकांक्षा मुझे यहां से नहीं हटा सकती क्योंकि यह मेरा प्यारा देश, मेरी प्यारी मातृभूमि है और मेरी लालसा है कि मैं अपने देश में मरूं।
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