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मंगलयान से अंतरिक्ष में ऊंचाई तक पहुंचा भारत

अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में भारत ने अपने मंगलयान मिशन के साथ ही एक नया अध्याय लिख दिया है।

मंगलयान से अंतरिक्ष में ऊंचाई तक पहुंचा भारत
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अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में भारत ने अपने मंगलयान मिशन के साथ ही एक नया अध्याय लिख दिया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इसरो के श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से पीएसएलवी सी-25 रॉकेट से छोड़ा गया यह मिशन आने वाले दिनों में भारत को तकनीकी क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान दिलाने के साथ-साथ राजनीतिक और आर्थिक रूप से भी सशक्त बनाएगा। भारत पहली बार किसी दूसरे ग्रह पर प्रयोग की शुरुआत कर रहा है। पिछली बार उपग्रह चंद्रमा के बारे में जानने के लिए भेजा गया चंद्रयान-1 सफल रहा था। इस अभियान को मार्स ऑर्बिटर मिशन नाम दिया गया है। मंगलयान तीन चरणों में मंगल की कक्षा में प्रवेश करेगा। पहले चरण में यह चार हफ्ते तक धरती का चक्कर लगाएगा। दूसरे चरण में पृथ्वी की कक्षा से बाहर हो जाएगा। तीसरे चरण में 21 सितंबर 2014 को मंगल की कक्षा में प्रवेश करेगा। और सब कुछ ठीक रहा तो उसके बाद फिर इसमें लगी मशीनें मंगल के बारे में जानकारियां भेजने लगेंगी। इस प्रकार देखें तो मिशन के सामने हर कदम पर चुनौतियां मौजूद हैं। भारत से पहले अमेरिका, रूस और यूरोप के कुछ देश (संयुक्त रूप से) ही मंगल के लिए यान भेजे हैं। 1960 में रूस ने पहली बार इसके लिए कोशिश की थी और आज अमेरिकी यान क्यूरियोसिटी मंगल के रहस्यों को उजागर कर रहा है। चीन और जापान अपनी कोशिशों में अब तक कामयाब नहीं हो सके हैं।

अब तक ज्ञात ग्रहों और उपग्रहों में मंगल ग्रह पर ही जीवन की संभावना होने के कुछ संकेत मिले हैं। यही वजह है कि चंद्रमा के बाद लाल ग्रह वर्षों से उत्सुकता पैदा करता रहा है। अब तक भेजे गए मिशन से कईअहम जानकारियां मिली हैं, लेकिन वे पर्याप्त नहीं हैं। आशा है मार्स ऑर्बिटर मंगल के कई रहस्यों से पर्दा उठाएगा। इस मिशन से पता चलेगा कि क्या मंगल पर मीथेन गैस है, क्या इस ग्रह के गर्भ में खनिज छिपे हैं, क्या यहां बैक्टीरिया का भी वास है और क्या यहां जिंदगी की संभावनाएं भी हैं। अगर भारत का मंगलयान अपने मकसद में पूरी तरह कामयाब रहता है तो फिर अंतरिक्ष विज्ञान और तकनीक की दुनिया में निश्चित रूप से एक बड़ी कामयाबी होगी। यह इसरो के वैज्ञानिकों के तकनीकी कौशल का ही कमाल हैकि एक रिकॉर्ड समय और बहुत ही कम लागत में मंगलयान को तैयार कर लिया गया। हालांकि कुछ लोग इसे भारत जैसे देश के लिए फिजूलखर्ची से जोड़कर देखते हैं परंतु उन्हें समझना चाहिए कि अंतरिक्ष कार्यक्रम पर दूसरे देश जो राशि खर्च कर रहे हैं, यह उसका आधा फीसदी भी नहीं है। और इसके फायदे उस रकम से कहीं ज्यादा हैं। इससे विज्ञान के प्रति आकर्षण तो बढ़ेगा ही वैज्ञानिकों में भी नया उत्साह आएगा। फिर सबसे बड़ी बात यह है कि भारत अंतरिक्ष कार्यक्रम में विकसित देशों की बराबरी करने जा रहे हैं। आज देश अंतरिक्ष कार्यक्रम में आत्मनिर्भर है। यदि प्रसारण, संचार, मानचित्रण एवं नेवीगेशन के मामले में दूसरे देशों पर निर्भर रहते तो हमें काफी धन खर्च करना पड़ता। हालांकि ऐसे मिशन को पीएसएलवी की जगह जीएसएलवी रॉकेट से ही भेजा जाना उचित होता है। अब समय आ गया हैकि इसरो के वैज्ञानिक क्रायोजेनिक इंजन पर आधारित जीएसएलवी रॉकेट में महारत हासिल करें।

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