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लोकसभा चुनाव 2019 का सबसे मजेदार व्यंग्य, : गांव की ओर आता नेताओं का झुंड

होरी के पास आकर गोबर ने ब्रेक लगाई तो होरी ने गाय के बदले उसके आगे भी चारा डालते पूछा , ‘अब क्या हो गया गोबर? इस तरह क्यों दौड़ा है? गांव में फिर कोई सफेद हाथी देख लिया क्या?’

लोकसभा चुनाव 2019 का सबसे मजेदार व्यंग्य, : गांव की ओर आता नेताओं का झुंड

होरी के पास आकर गोबर ने ब्रेक लगाई तो होरी ने गाय के बदले उसके आगे भी चारा डालते पूछा , ‘अब क्या हो गया गोबर? इस तरह क्यों दौड़ा है? गांव में फिर कोई सफेद हाथी देख लिया क्या?’ नहीं बाबा! ये देखो! गांव के बाहर लोकतंत्र के नेताओं का झुंड। मैंने अभी अभी उनका फोटो खींचा है, कह उसने दूर से भी पूरे नेता ही दिखने वालों की खींची फोटो दिखाते होरी से कहा तो होरी डरा। गोबर नेताओं को दूर से ही पहचान जाता है। कारण, वह बीच-बीच में शहर जाता रहता है, ‘मतलब पक्का है क्या? बता तो? होरी आंखों की नजदीक की रोशनी खत्म होने के बाद भी गोबर से उसके स्मार्ट फोन में कैद नेताओं का झुंड बड़े गौर से देखने लगा, कभी इस ओर से तो कभी उस ओर से। जब उसे साफ नहीं हुआ तो उसने गोबर से कहा,‘ पर यार, ये तो हमारे नेता नहीं लग रहे। कोई टूरिस्ट से लगे हैं। इननका पहनावा भी कुछ अलग-अलग सा दिखता है।’

बाबा, आजकल के नेता ऐसे ही होते हैं। वे काम कम टूरिस्टगीरी अधिक करते हैं, मस्तियां अधिक करते हैं। बापू! मान न मान, पर मेरी नजर तो कहे है कि ये सब हमारे नेता ही हैं। मैंने कानुपर जाकर पिछले दिनों ऐसे ही अजीबो गरीब नेता देखे थे,’ उसने जो फोटो दूर से नेताओं के झुंड का फोटो खींचा था उस पर अपनी सत्यता की मुहर लगाते कहा तो होरी असमंजस में। उसे समझ नहीं आ रहा था कि हमारे नेता ऐसे भी हो सकते हैं क्या। वो बार-बार फोटो को निहार रहा था। कहीं न कहीं उसे भी यह बात सत्य लगने लगी थी।

तो अब ये नेता लोग गांव में क्यों? शहर में क्या इनके लिए दाना पानी खत्म हो गया है अब? यहां तो गांव के पिद्दी-पिद्दी मेंबर, प्रधान ने पहले ही तबाही मचा रखी है। अब नेताओं का इतना बड़ा झुंड! बाप रे बाप! इतने गांव में आ गए तो बकरों की तो खैर नहीं, हमारी भी खैर नहीं!’ कहता होरी पता नहीं कहां की सोचने लगा। फिर कुछ देर तक कुछ सोचने के बाद होरी लंबी सांस भर बोला,‘ रे गोबर! शहर का तो एक भी नेता बुरा होता है और जे तो इमनी सख्या में एक साथ जो आ गए तो पता नहीं क्या होगा गांव का।’

‘बाबा अब?’गोबर भी परेशान। उसने गांव में बचे मुर्गे, बकरे दाएं हाथ की उंगलियों पर गिनते पूछा।

‘जा ,गांव के गिनती के बचे बकरों के मुखिया को तत्काल खबर कर दे कि गांव में शहर भर के नेता आ रहे है, वो तैयार रहे।’ और जैसे ही यह खबर चूल्हे में गीली लकड़ियां होने के बाद भी गांव में रूंई में लगी आग की तरह फैली तो पूरा गांव एकएक दहशत में आ गया। गांव वालों को समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या करें, कैसे निपटें।

अब प्रश्न यक्ष! गांव में अफसर घुसते तो वह नेता से फरियाद करते, गांव में पोलियो घुसता तो वह बीमारी के महकमे से फरियाद करते पर अब जब गांव में नेता ही घुसने को आ गए तो किससे फरियाद करें? कुछ समझ में ही नहीं आ रहा।

इससे पहले कि नेताओं का झुंड गांव में घुसता गांव वालों ने तय किया कि वे उन्हें किसी भी कीमत पर गांव में प्रवेश नहीं करने देंगे। इसके लिए चाहे उन्हें कितने भी जतन क्यों न करने पड़ें। चेचक गांव में घुस आए तो घुस आए पर वे नेताओं के झुंड में से एक भी नेता को गांव में घुसने नहीं देंगे। अबके जान चली जाए पर एक भी नेता गांव में न घुसने पाए। और देखते ही देखते सब गांव वालों ने नेताओं के झुंड के खिलाफ मोर्चा संभाल लिया। तरह-तरह की रणनीति तैयार करने लगे कि किसी भी तरह से नेताओं को रोकना है।

गांव में किसी अशुभ की आशंका को देख पंडित मातादीन ने मंदिर जाकर भगवान से कहा, प्रभु! गांववालों ने गांव के बाहर अबकी बार नेता नहीं, नेताओं का पूरा झुंड देखा है। पूरे गांव में दहशत का माहौल है प्रभु! गांव के तहसीलदार, पटवारी से बचे बकरों तक को अब इनका डर सता रहा है। हमसे बचे गांव की अब इन नेताओं से रक्षा करो प्रभु! नहीं तो अब हम भी भूखे मर जाएंगे। प्रभु से फरियाद करने के बाद प्रभु ने पंडित मातादीन को आश्वानसन देते कहा, हे मेरे ठेकेदार! गांव वालों से कह दो कि वे डरें मत! हम हैं न!

हम शीघ्र ही नेताओं के झुंड से गांव वालों को बचाने के लिए पिंजरा लगवाएंगे। हम अपने लोक से पोलिस बुलवाएंगे और। इसी के साथ ही उन्होंने गांववालों से भी आह्वान किया कि वे भी गांव से बाहर अकेले न निकलें, न अपने बकरों को गांव से बाहर जाने दें। वहीं घरों के बाहर आग जलाकर रखें जिसके डर से नेताओं के झुंड में से कोई भी नेता गांव में न घुस सके, शेष प्रभु इच्छा!

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