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कानून ही नहीं सोच को भी बदलना जरूरी

इंटरव्यू में 16 दिसंबर, 2012 को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सड़कों पर आधी रात को घटी उस बर्बर घटना के लिए निर्भया को ही दोषी ठहरा दिया है

कानून ही नहीं सोच को भी बदलना जरूरी
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निर्भया कांड के एक दोषी ने अपने एक इंटरव्यू में जो बातें कही है वह समाज के एक बड़े तबके का महिलाओं के प्रति रखने वाली रूढ़िवादी और दूषित सोच का ही प्रतीक है। उसने इंटरव्यू में 16 दिसंबर, 2012 को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सड़कों पर आधी रात को घटी उस बर्बर घटना के लिए निर्भया को ही दोषी ठहरा दिया है। हालांकि एक अपराधी से इससे ज्यादा की उम्मीद नहीं की जा सकती है।

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इस इंटरव्यू के आधार पर बनी डॉक्यूमेंट्री को एक विदेशी चैनल पर आठ मार्च को महिला दिवस के दिन दिखाया जाना था, लेकिन केंद्र सरकार ने तत्परता दिखाते हुए इसके प्रसारण पर रोक लगा दी है। साथ ही गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने जेलों में बंद अपराधियों व कैदियों के इंटरव्यू लेने के नियमों को फिर से रिव्यू करने और मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए उन्होंने इसमें जिम्मेदारी तय करने की बात भी कही है। यह अच्छा कदम है। हर देश में कभी-कभी ऐसी घटनाएं घटती हैं, जो समाज को अंदर तक झकझोर देती हैं। निर्भया कांड भी इसी तरह की घटना थी।

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लोगों के गुस्से को देखते हुए संसद, पुलिस-प्रशासन और सुप्रीम कोर्ट को आगे आना पड़ा था। महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए राज्यों में हेल्पलाइन नंबर जारी किये गए, जिलों में अलग से महिला थानों के गठन की बात भी कही गई, यौन उत्पीड़न जैसे मामलों की सुनवाई के लिए त्वरित न्यायालयों के गठन की योजना बनी और साथ ही महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा करने के लिए संसद ने बलात्कार के खिलाफ कड़ा कानून बनाया। उस कानून में बलात्कार के दोषियों को फांसी तक का प्रावधान किया गया है। निर्भया कांड के दोषियों (एक नाबालिग को छोड़कर) को फांसी की सजा दी गई।

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उम्मीद की गई थी कि इससे सभी दोषियों व समाज के दूसरे लोगों में भी कड़ा संदेश जाएगा, लेकिन इंटरव्यू के बाद साफ है कि न तो उनको अपने किए पर जरा भी पछतावा है, ना ही महिलाओं के प्रति उनका नजरिया बदला है। वहीं देश में महिलाओं के प्रति ऐसी घटिया सोच रखने वालों की कमी नहीं है। इसी घृणित सोच के कारण देश महिलाओं की रक्षा नहीं कर पा रहा है। इससे साफ हैकि कड़े कानून अपनी जगह हैं, लेकिन सबसे जरूरी है कि समाज अपनी सोच बदले।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि 21वीं सदी में भी समाज के अधिकांश लोगों के विचार अब भी रूढ़ियों की बेड़ियों में जकड़े हुए हैं। निर्भया कांड के बाद देश भर से उठी आवाज और सरकारी सक्रियता को देखते हुए एक उम्मीद जगी थी कि समाज महिलाओं के हितों के प्रति संवेदनशील होगा, लेकिन उन तमाम उम्मीदों पर पानी फिर गया है।

यह अफसोसजनक है कि इतना कुछ होने के बाद भी निम्न वर्ग से लेकर समाज के उच्च वर्ग में महिलाओं के प्रति पुरुषवादी मानसिकता में कोई बदलाव देखने को नहीं मिल रहा है। बीते दिनों जिस तरह कई धार्मिक गुरुओं और जनप्रतिनिधियों सहित उच्च अधिकारियों पर भी बलात्कार के गंभीर आरोप लगे, उससे इसकी पुष्टि होती है। आखिर लोगों की यह सोच क्यों नहीं बदल रही है। यह चिंता की बात है। इस पर सभी को एकजुट हो कर गंभीर चिंतन करने की जरूरत है।

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