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डा. मोनिका शर्मा का लेख : कर्म का पाठ पढ़ाते कृष्ण

कर्म के समर्थक कृष्ण सही अर्थों में जीवन गुरु हैं, क्योंकि हमारे कर्म ही जीवन की दशा और दिशा तय करते हैं। कर्म की प्रधानता उनके संदेशों में सबसे ऊपर है। यही वजह है कि वे कई ईश्वरीय रूप में भी आम इंसानों से जुड़े से दिखते हैं। मनुष्यों ही नहीं संसार के समस्त प्राणियों के लिए उनका एकात्मभाव देखते ही बनता है। मानवीय व्यवहार और संस्कार की शालीनता बताती है कि वहां जनकल्याण को लेकर कैसे भाव हैं।

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प्रतीकात्मक

डा. मोनिका शर्मा

कृष्ण मानवता के प्रतिनिधि और लोक कल्याण के मार्गदर्शक हैं। जनमानस की आत्मा में बसे ऐसे अवतार हैं, जिनका जीवन अनगिनत कहानियों और लीलाओं से भरा है। तभी तो सामाजिक, धार्मिक, दार्शनिक और राजनीतिक हर क्षेत्र में सारथी की भूमिका में सच्चे हितैषी कहे जाते हैं। यूं भी वे निर्माण, ध्वंस, क्रोध, करुणा, आध्यामिकता के ही नहीं साहित्य और कला के भी समग्र रूप हैं। वे जीवन में आनंद और प्रेम को भी उतना ही जरूरी मानते हैं जितना विश्वास और मर्यादा की डोर को थामे रहना। उनका जीवन जितना रोचक उतना ही मानवीय भी। इसीलिए आम इंसान को बहुत कुछ सिखाता समझाता, उनका चरित्र जीवन जीने के अर्थपूर्ण संदेश संजोए हुए है। बालपन से लेकर कुटुम्बीय जीवन तक, उनकी हर बात में जीवन सूत्र छुपे हैं।

इंसान के विचार और व्यवहार स्वयं उनके ही नहीं बल्कि राष्ट्र और समाज की भी दिशा तय करते हैं। कृष्ण के संदेश इन दोनों पक्षों के परिष्करण पर बल देते हैं। एक ऐसी जीवनशैली सुझाते हैं जो सार्थकता और संतुलन लिए हो। समस्याओं से जूझने की ललक लिए हो। गीता में वर्णित उनके संदेश जीवन रण में अटल विश्वास के साथ खड़े रहने की सीख देते हैं। महान दार्शनिक श्री अरविंदो ने कहा कि भगवद्गीता एक धर्मग्रंथ व एक किताब न होकर एक जीवनशैली है, जो हर उम्र को अलग संदेश और हर सभ्यता को अलग अर्थ समझाती है। दुनिया के जाने माने वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने भी कहा है कि श्रीकृष्ण के उपदेश अतुलनीय हैं। कृष्ण से जुड़ी हर बात हमें जीवन के प्रति जागृत होने का संदेश देती है। मानव मन और जीवन के कुशल अध्येता कृष्ण यह कितनी सरलता और सहजता से बताते हैं कि जीवन जीना भी एक कला है। उनके चरित्र को जितना जानो उतना ही यह महसूस होता है कि इस धरा पर प्रेम का शाश्वत भाव वही हो सकता है जो कृष्ण ने जिया है। यानि कि संपूर्ण प्रकृति से प्रेम। यही अलौकिक प्रेम हम सबको को आत्मीय सुख दे सकता है और इसी में समाई है जनकल्याणकारी चेतना भी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी कहा है कि जब मुझे कोई परेशानी घेर लेती है, मैं गीता के पन्नों को पलटता हूं। हम सब जानते हैं कि बापू भी मानवीय सोच और जनकल्याण के पैरोकर रहे हैं।

आज हम कई पहलुओं पर प्रकृति की नाराजगी को झेल रहे हैं। बाढ़, सूखा, भूकंप जैसे विपदाएं दुनिया भर में कहर ढाती रहती हैं। इसकी वजह भी कुदरत का दोहन ही है। ऐसे में कृष्ण का प्रकृति के बहुत करीब रहा जीवन बड़ी सीख लिए है। प्रकृति के लिए उनके मन में जो अपनत्व रहा वो समाज और राष्ट्र के सरोकारों से भी जोड़ने वाला है। कदम्ब का पेड़ और यमुना का किनारा उनके लिए बहुत विशेष स्थान रखते थे। प्रकृति का साथ ही उनके विलक्षण चरित्र को आनन्द और उल्लास का प्रतीक बनाता है। कृष्ण ने किसी वस्तु को भी जड़ नहीं समझा। तभी तो आत्मीय स्तर का लगाव रहा उन्हें हर उस वस्तु से भी जो उस परिवेश का हिस्सा थी जहां वे रहे। वैसे भी पेड़-पौधे हों या जीव जन्तु संपूर्ण प्रकृति की चेतना से जुड़ना ही सच्ची मानवता है। वसुधैव कुटम्बकम के भाव को वासुदेव कृष्ण ने मन से जीया है। मनुष्यों और मूक पशुओं से ही नहीं मोरपंख और बांसुरी से भी उन्होनें मन से प्रेम किया। कान्हा का गायों की सेवा और पक्षियों से प्रेम यह बताता है कि जीवन प्रकृति से ही जन्म लेता है और मां प्रकृति ही इसे विकसित करती है, पोषित करती है। सच में कभी-कभी लगता है कि हम सबमें चेतन तत्व का विकास होगा तभी तो आत्मतत्व जागृत हो पाएगा। प्रकृति से जुड़ा सरोकार का ये भाव मानवीय सोच को साकार करने वाला है। यही वजह है कि विचार, व्यवहार और अपनत्व का यह भाव आज के जद्दोजहद भरे जीवन में सबसे जरूरी है ।

मानवीय स्वभाव की विकृति और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जनजागरण करने वाले योगेशवर कृष्ण सही अर्थों में अत्याचार और अहंकार के विरोधी हैं। यही वजह है कि उन्हें बंधी-बधाई धारणाओं और परंपराओं की जड़ता को तोड़ने वाला माना गया है। उनका चिंतन राष्ट्र-समाज के लिए हितकर विचारों को प्रोत्साहन देने वाला है। आमजन को अत्याचार से लड़ने और जागरूक रहने का संदेश देते हैं। वे स्त्री अस्मिता के प्रबल समर्थक रहे। आज के समय में एक सखा रूप में स्त्री के मान की रक्षा और उसके मन की सुनने का इससे सुन्दर उदाहरण नहीं मिल सकता। इसीलिए कर्मयोगी कृष्ण दमन के खिलाफ है तो हैं ही मन की पूर्णता के भी समर्थक हैं। इस बिखराव भरे दौर में राष्ट्र-राज्य की उन्नति के लिए समर्पित उनकी सोच सही मायनों में दिशा देने वाली साबित हो सकती है। उनकी हर क्रिया में जगत के कल्याण का उद्देश्य निहित है। चेहरे पर मुस्कराहट और मस्तिष्क में कर्म की दिशा का ज्ञान। बालसुलभ बातें और जीवन की गूढ़ समस्याओं के हल निकालने की गहरी समझ। यही उनके चमत्कारी व्यक्तिव का सबसे आकर्षक पहलू है। तभी तो कृष्ण की दूरदर्शी सोच समस्या नहीं बल्कि समाधान ढूंढ़ने की बात करती है। वे उदासी नकारात्मकता के विरोधी है। कृष्ण यह समझाते, सिखाते हैं कि जीवन की लड़ाई संयम और सधी सोच के साथ लड़ी जाए। यही वजह है कि नीतिराज कृष्ण का चरित्र सदैव चमत्कारी और कृतित्व कल्याणकारी रहा है। उनका जीवन इस बात को रेखांकित करता है कि जीवन में आने वाली हर तरह की परिस्थितियों में कहीं धैर्य तो कहीं गहरी समझ आवश्यक है। इन दिनों मुसीबत बना कोरोना काल तो मानों हर पहलू पर हमारे धैर्य की परीक्षा ही ले रहा है।

कर्म के समर्थक कृष्ण सही अर्थों में जीवन गुरु है। क्योंकि हमारे कर्म ही जीवन की देश और दिशा तय करते हैं। कर्म की प्रधानता उनके संदेशों में सबसे ऊपर है। यही वजह कई वे ईश्वरीय रूप में भी आम इंसानों से जुड़े से दीखते हैं। मनुष्यों ही नहीं संसार के समस्त प्राणियों के लिए उनका एकात्मभाव देखते ही बनता है। सच भी है कि आज के दौर में भी नागरिक ही किसी देश की नींव सुदृढ़ करते हैं। वहां बसने वाले लोगों की वैचारिक पृष्ठभूमि और व्यवहार यह तय करते हैं कि उस देश का भविष्य कैसा होगा? मानवीय व्यवहार और संस्कार की शालीनता बताती है कि वहां जनकल्याण को लेकर कैसे भाव हैं। अधिकतर समस्याओं का हल देश के नागरिकों के विचार और व्यवहार पर ही निर्भर है। ऐसे में कृष्ण कर्मशील होने का संदेश सृजन की राह सुझाता है। कृष्ण की दूरदर्शी सोच समस्या नहीं बल्कि समाधान ढूंढ़ने की बात करती है। जो कि राष्ट्रीय और सामाजिक समस्याओं के सन्दर्भ में भी लागू होती है। तभी तो भाग्य की बजाय कर्म करने पर विश्वास करने सीख देने वाला मुरली मनोहर का दर्शन आज के दौर में सबसे अधिक प्रासंगिकता रखता है। कर्ममय जीवन के समर्थक कृष्ण जीवन को एक संघर्षों से भरा मार्ग ही समझते हैं । हम मानवीय मनोविज्ञान के आधार पर समझने की कोशिश करें तो पाते हैं कि अकर्मण्यता जीवन को दिशाहीन करने वाला बड़ा कारक है ।

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