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क्या चुनाव से पहले केजरीवाल को नहीं पता था की दिल्ली केंद्रशाषित प्रदेश के क्या नियम है

केजरीवाल सरकार का कहना है की केंद्र सरकार और आईएएस अफसर उन्हें काम नहीं करने दे रहे है। तो क्या इस बात को मान लेना चाहिए कि केजरीवाल को चुनाव लड़ने से पहले यह नहीं मालूम था कि 69 वे संविधान संसोधन अधिनियमम जिसे हम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र अधिनियम 1991 भी कहते है ,के तहत दिल्ली में राज्य सरकार के पास सीमित अधिकार होते है।

क्या चुनाव से पहले केजरीवाल को नहीं पता था की दिल्ली केंद्रशाषित प्रदेश के क्या नियम है
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केजरीवाल सरकार का कहना है की केंद्र सरकार और आईएएस अफसर उन्हें काम नहीं करने दे रहे है। तो क्या इस बात को मान लेना चाहिए कि केजरीवाल को चुनाव लड़ने से पहले यह नहीं मालूम था कि 69 वे संविधान संसोधन अधिनियमम जिसे हम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र अधिनियम 1991 भी कहते है ,के तहत दिल्ली में राज्य सरकार के पास सीमित अधिकार होते है। लेकिन आखिर ऐसी क्या मुसीबत आन पड़ी की केजरीवाल को उपराज्यपाल के कार्यालय मे ही धरने पर बैठना पड़ा। कई ऐसे सवाल है जो इस धरने के बाद दिल्ली के लगभग डेढ़ करोड़ मतदाताओं के सामने मुँह खोल कर खड़े है। चलिए जानते है कि असल मामला क्या है।

अनोखे धरने की जड़ क्या थी
इस पूरे घटना क्रम की शुरुआत दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ हुई कथित मारपीट से शुरू होती है। मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल का कहना है की दिल्ली सरकार के किसी भी मीटिंग में आईएएस अफसर शामिल नहीं होते जिसके चलते दिल्ली का विकास कार्य काफी समय से रुका हुआ है और सरकार अपनी योजनाओं को जनता तक नहीं पहुंचा पा रही है । केजरीवाल का यह भी कहना है की केंद्र सरकार, उपराज्यपाल के द्वारा दिल्ली सरकार को काम नहीं करने देती जिससे दिल्ली सरकार की योजनाऐ अधर में ही अटकी रहती है। इसी सिलसिले में केजरीवाल अपने कुछ मंत्रियों के साथ उपराज्यपाल से मिलने गए और जब बात नहीं बनी तो केजरीवाल अपने उन्ही मंत्रियों के साथ वहीं कार्यालय में ही धरने पर बैठ गए।
अब इस बात पर भी नज़र डालना होगा की दिल्ली विधानसभा के पास आखिर क्या-क्या अधिकार है। जिसके चलते जबसे केजरीवाल ने दिल्ली के सत्ता की चाभी अपने हाथ में ली है तो आखिर वो कौन से अधिकारों के ताले है जिसे केजरीवाल खोल नहीं पा रहे ,जिससे केंद्र और राज्य सरकार की लड़ाई जग जाहिर हो गयी।
दिल्ली में सरकार बनने और उसके अधिकारों की कहानी
आज़ाद भारत के बाद यह कवायद और तेज हो गयी की अब दिल्ली को राज्य का दर्जा मिलना चाहिए। दरसअल दिल्ली देश की राजधानी है इसलिए दुनिया की कुछ राजधानियों का अध्ययन भी किया गया की वह पर राष्ट्रीय राजधानी में सरकार कैसे चलती है।
1-दिल्ली को राज्य का दर्जा दिलवाने के लिए पट्टाभि सीतारमैया की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गयी.
2- वाशिंगटन डीसी ,लन्दन,और ऑस्ट्रेलिया की राजधानी मेलबर्न की शासन व्यवस्था का अध्ययन किया गया। जिसे बाद कमेटी ने यह निर्णय लिया की दिल्ली को समूह ग राज्य का दर्जा दिया जाएगा।
3-उसके बाद 1953 में एक बार फिर फज़ल अली आयोग बना जिसमे राज्य पुनर्गठन आयोग द्वारा सुझाव दिया गया जिसमे दिल्ली की सीमित अधिकारों वाली व्यवस्था बदल गयी और और चौधरी ब्रह्म प्रकाश को मुख्यमंत्री बनाया गया।
4-लेकिन फिर बाद में इस व्यवस्था को वापस ले लिया गया।
5-इसके बाद दिल्ली में महानगर परिषद के माध्यम से शासन किया जाने लगा।
6-लोक ,भूमि ,और पुलिस व्यवस्था के अलावा सभी अधिकार स्थानीय शासन के हवाले कर दिया गया।
अब यहाँ से शुरू होता है
7-1991 में किये गये संविधान संसोधन की कहानी। इस अधिनियम में भी यही कहा गया है की संसद के कानून के बीच राज्य के कानून का खलल नहीं पढ़ना चाहिए।
8-राज्य सूची के सभी विषयों पर दिल्ली सरकार कानून बना सकती है लेकिन संसद के क़ानून के दायरे में रहकर।

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