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जम्मू-कश्मीर : फारूक की रिहाई के मायने

नरेंद्र मोदी सरकार की नीति जम्मू कश्मीर की परंपरागत राजनीति को बदलने की है। आम धारणा यही है कि चाहे अब्दुल्ला परिवार हो या मुफ्ती, दोनों अलगाववाद को बढ़ावा देते रहे हैं। मुफ्ती परिवार खुलकर ऐसा करता था तो अब्दुल्ला दूसरे तरीके से। सरकार को वहां राजनीतिक प्रक्रिया तो शुरू करनी है। दो परिवारों के वर्चस्व वाली राजनीति वहां वापस न आए यही केंद्र की कोशिश है। फारूक को भी कुछ अहसास तो है, इसीलिए वे पहले की तरह आक्रामक नहीं हैं।

जम्मू-कश्मीर : फारूक की रिहाई के मायनेफारूक अब्दुल्ला

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री व सांसद डॉ. फारूक अब्दुल्ला को हिरासत में लिए जाने तथा उन पर जन सुरक्षा अधिनियम लगाने की जितनी व्यापक चर्चा हुई, उतनी उनकी रिहाई की नहीं हो रही है। यही अंतर साबित करता है कि पांच अगस्त 2019 और मार्च 2020 में जम्मू कश्मीर और उसे लेकर देश का वातावरण काफी बदल चुका है। जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने तथा राज्य को विभाजित कर उसे केन्द्रशासित प्रदेश बनाते समय फारूक अब्दुल्ला को हिरासत में लिया गया था। करीब साढ़े सात माह बाद रिहा होने को कई लोग चौंकाने वाली घटना कह रहे हैं। हालांकि रिहाई के बाद फारुख द्वारा वक्तव्य देने में बरती जा रही सतर्कता अवश्य चौंकाने वाली है। माना जा रहा था कि वो निकलने के बाद केंद्र सरकार पर हमला करेंगे तथा कश्मीर को लेकर ऐसा बयान देंगे जिससे नए सिरे से राजनीति गरम होगी। किंतु उन्होंने केवल इतना कहा कि अब मैं आजाद हूं। राजनीति के बारे मंे पूछे गए सवाल पर उनका एक ही उत्तर था, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जैसे नेताओं की रिहाई तक कोई राजनीतिक बातचीत नहीं होगी। विचार करने वाली बात है कि आखिर फारूक इतने संतुलित और संयमित रुख क्यों अपना रहे हैं? क्या इतने दिनों तक दुनिया से दूर रहने के बीच उन्होंने जम्मू कश्मीर के बदले हुए हालात से समझौता कर लिया है? या फिर किसी बात का भय है?

ये सारे प्रश्न स्वाभाविक ही उठ रहे हैं। फारूक अब्दुल्ला जम्मू कश्मीर के कोई सामान्य नेता नहीं। उनके परिवार का शासन सबसे ज्यादा समय तक रहा है। वे कह रहे हैं कि मैं जल्दबाजी में कोई राजनीतिक कदम नहीं उठाउंगा। हालात का जायजा लेने के बाद नए एजेंडे को सार्वजनिक करूंगा। संभव है आगे वे विपक्षी नेताओं से बातचीत के बाद धीरे-धीरे अपने रुख में बदलाव लाएं। हालांकि फारुख को पता है कि भाजपा विरोधी पार्टियों और नेताओ ने अवश्य उनकी रिहाई के लिए आवाज उठाई किंतु जम्मू कश्मीर की राजनीति में वे उनकी कोई सहायता नहीं कर सकते। आखिर उनको हिरासत में लिए जाने से लेकर पीएसए के तहत गिरफ्तारी को विपक्ष नहीं रोक सका। ध्यान रखिए, उनकी रिहाई के पांच दिन पूर्व राकंपा अध्यक्ष शरद पवार, तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्षा ममता बनर्जी, माकपा प्रमुख सीता राम येचुरी समेत विपक्ष के प्रमुख नेताओं ने प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री को एक संयुक्त पत्र लिखकर जम्मू-कश्मीर के तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों समेत प्रमुख राजनीतिक नेताओं की रिहाई का आग्रह किया था। यह मानना गलत होगा कि इस पत्र के आधार पर उनको रिहा किया है। कारण, इस पत्र में विपक्ष ने सरकार पर तीखे हमले भी किए थे। ये बातें उसी समय से कहीं जा रहीं हैं जब जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद वहां अनेक पाबंदियां लगाईं गईं, नेताओं को हिरासत में लिया गया, गिरफ्तार किया गया, नजरबंद किया गया तथा जेल में बंद अनेक कैदियों या हिरासतियों को प्रदेश से बाहर के जेलों में स्थानांतरित कर दिया गया। रॉ के पूर्व प्रमुख ए एस दुलत ने कहा है कि उन्होंने गृहमंत्रालय से अनुमति लेकर फारुख अब्दुल्ला से मुलाकात की थी। फारुख अब्दुल्ला ने मुझसे कहा कि मैं भारत के प्रति पूरी निष्ठा रखता हूं तथा अपने बच्चों को भी मैंने इसी तरह तैयार किया है। दुलत के दावे पर कुछ भी कहना कठिन है, पर उन्होंने मुलाकात की, गृहमंत्रालय ने उनको अनुमति दी तथा बाद में उनसे संपर्क किया यह सच है। केन्द्र की ओर से कुछ समय पहले ही बयान आया था कि अब चूंकि जम्मू कश्मीर के हालात सामान्य हो रहे हैं इसलिए नेताओं को रिहा किया जाएगा। संभव है आने वाले समय में हालात की समीक्षा के बाद उमर अब्दुल्ला एवं मेहबूबा मुफ्ती सहित पीएसए के तहत बंदी प्रमुख नौ नेताओं को भी रिहा कर दिया जाए। केंद्र सरकार पहले फारुख की रिहाई के प्रभाव का आकलन करेगी फिर ऐसा करेगी। उमर एवं मेहबूबा पर पहले पीएसए नहीं लगाया गया था। फारूक अब्दुल्ला पर पीएसए लगाने के 5 महीने बाद इन दोनों को इस कानून के तहत बंदी बनाया गया। इसका मूल कारण यही था कि इसके तहत सरकार को तीन महीने तक बिना किसी बाधा के बंदी बनाए रखने तथा दो वर्ष तक बिना मुकदमा चलाए उसे कायम रखने का कानूनी आधार मिल जाता है।

वैसे सरकार ने काफी पहले से जम्मू कश्मीर में लगी पाबंदियां खत्म करनी आरंभ कर दी थीं। गृह राज्यमंत्री जी. किशन रेड्डी ने पिछले दिनों राज्यसभा में कहा था कि 444 लोगों को हिरासत में लिया गया। उन्होंने बताया था कि सभी मामलों की एक-एक कर समीक्षा की जा रही है और एजेंसियों की रिपोर्ट के आधार पर हिरासत अवधि बढ़ाने या छोड़ने का निर्णय लिया जा रहा है। ज्यादातर नेता रिहा हो चुके हैं। हालांकि कई महीनों तक जिन नेताओं व अन्य लोगों को रिहा किया गया उन सभी से एक बांड भरवाया गया। इस बांड में संबंधित लोगों ने कानून व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने में सहयोग का पूर्ण यकीन दिलाया। जिनने बांड नहीं भरा उन्हें रिहा नहीं किया गया। सज्जाद गनी लोन को रिहा तो किया गया लेकिन उन्हें घर में नजरबंद कर दिया गया। मेहबूबा ने तो कहा था कि अगर कश्मीर से 370 हटा तो यहां भारत का झंडा उठाने वाला कोई नहीं रहेगा। उमर अब्दुल्ला से लेकर फारुख अब्दुल्ला एवं अन्य नेताओं के बयान भी आक्रामक थे।

दरअसल नरेन्द्र मोदी सरकार की नीति जम्मू कश्मीर की परंपरागत राजनीति को बदलने की है। इसलिए हर पार्टी के नेताओं से संपर्क की कोशिश हुई है। बीडीसी चुनाव में भाग लेेने के लिए लोग रिहा किए गए और चुनाव सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। आम धारणा यही है कि चाहे अब्दुल्ला परिवार हो या मुफ्ती, दोनों अलगाववाद को बढ़ावा देते रहे हैं। मुफ्ती परिवार खुलकर ऐसा करता था तो अब्दुल्ला दूसरे तरीके से। फारुख अब्दुल्ला की दिल्ली में भाषा कुछ और होती थी और घाटी में कुछ और। 25 नवंबर 2017 को तो उन्होंने एक बार कह दिया कि पाक अधिकृत कश्मीर इनके बाप का नहीं है। इससे पूरे देश में गुस्सा पैदा हुआ था। मोदी सरकार को इनको कमजोर करने में कितनी सफलता मिली है, कहना कठिन है। पीडीपी टूट चुकी है। मेहबूबा के विश्वसनीय साथी अल्ताफ बुखारी ने अपनी पार्टी बना ली है। इसी तरह मुजफ्फर हुसैन बेग को भी सरकार ने विश्वास में लिया है। उन्हें पद्म से सम्मानित किया गया है। दूसरी, तीसरी, चौथी श्रेणी के नेताओं से व्यापक संपर्क किया गया है। जम्मू में भी भाजपा की कोशिश इन दोनों पार्टियों को तोड़ने की रही है और उसमें कुछ सफलता मिली है। फारूक अब्दुल्ला को रिहा करने के पीछे इन कारकों का भी योगदान है। सरकार को वहां राजनीतिक प्रक्रिया तो शुरु करनी है। दो परिवारों के वर्चस्व वाली राजनीति वहां वापस न आए यही केंद्र की कोशिश है। फारूक को भी कुछ अहसास तो है। इसीलिए वे पहले की तरह आक्रामक नहीं हैं।

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